मूलनिवासियों शेरनी का दूध सोने के बर्तन में टिकता है भैंस का नहीं क्यों
मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
कहा जाता है कि शेरनी का दूध सोने के बर्तन में ही ठहरता है। यह कहां तक सत्य है, इस के बारे में तो हम पूर्णरूपेण जानते नहीं हैं मगर यदि इस कथन को सत्य भी मान लें, तो यह समझा जा सकता है कि शेर और शेरनी अत्यंत ही खूंखार निर्दयी और कुरूर जानवर हैं, जिन के सामने कोई आ जाए, उस के गले को दवा कर उस के खून को पी जाते हैं और यही खून शेरनी के दूध को इतना ताकतवर बना देता है कि वह सोने के बर्तन के सिवाय किसी बर्तन में ठहरता ही नहीं है, भले ही यह कहावत भी हो सकती है मगर इस कहावत से भी एक लैशन अवश्य मिलता है, कि ये जानवर प्राणियों का खून पीता है। ताजा मांस खाता है। तभी ये जानवर अन्य जानवरों से अधिक शक्तिशाली और अजेय होता है, मगर इस के विपरीत यदि देखा जाए तो जो जानवर घास ही घास खाते हैं, वे भी कितने हृष्ट पुष्ट, हटे कटे, मोटे शक्तिशाली और विशालकाय बन जाते हैं, परंतु इतने शक्तिशाली होने के बावजूद भी वे शेर और शेरनी का मुकाबला नहीं कर पाते हैं।सभी एक-एक करके शेर और शेरनी का शिकार होते ही जाते हैं और सभी असहाय हो कर मारे जाते हैं। भय के मारे अपने साथी को बचाने के लिए आगे नहीं आ पाते हैं अगर आ भी जाएं तो भी मुंह की खा कर भाग जाते हैं। खून पीने वाले मांसाहारी और शाकाहारी के जीवन में दिन रात का अंतर होता है। मांसाहारी शेर और शेरनी इतने विशालकाय नहीं होते हैं, जितने भैंस भैंसा हाथी, जिराफ ,जेबरा, होते हैं मगर फिर भी शेर और शेरनी इन का शिकार कर के इन का खून पी कर शक्तिशाली बन जाते हैं।
मांसाहारी जानवरों से अनुभव:-- अब इन मांसाहारी जानवरों के जीवन से अगर मनुष्य कुछ सीखें, तो उस की जीवन शैली में परिवर्तन आ सकता है। मनुष्य को मांस और घास खाने का पूर्ण रूप से प्रबंध किया गया है। मनुष्य के के कुछ दांत शेर के दांतों की तरह होते हैं, जो मांस को खींचकर, उधेड़ कर खा सकते हैं और कुछ दांत शाकाहारी जानवरों के दांतों की तरह चपटे होते हैं, जिन से वे घास से निकला अनाज, साग, सब्जियां और फल आदि खा सकते हैं। प्रकृति ने मनुष्य को मांसाहारी और शाकाहारी बनाया हुआ है। मांस और घास दोनों ही खा सकता है। और साइंटिफिक ढंग से देखा भी जाए तो प्रकृति की यह अत्यंत विस्मयकारी रचना है, कि मनुष्य दोनों ही प्रकार के भोजन खा सकता है, यदि मनुष्य शाकाहारी बना रहे, तो उस के शरीर में मांस के तत्वों की कमी आ जाती है, जिस से मनुष्य के शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है और अकाल ही काल क्वलित हो जाता है, अगर मांस ही मांस खाता रहे, तो भी मानव के शरीर में शाकाहारी भोजन के तत्वों की कमी आ जाती है और उन तत्वों की कमी के कारण कई प्रकार की बीमारियों का शिकार हो जाता है, और अंततः असमय ही काल का ग्रास हो जाते हैं। जो जो केवल शाकाहारी बने रहते हैं, वे शारीरिक, मानसिक रूप से इतने निर्बल और कमजोर हो जाते हैं, कि वे माबलिंचरों, अत्याचारियों, व्यभिचारियों, बलात्कारियों और कातिलों का मुकाबला नहीं कर पाते हैं और इन के शिकार हो कर मारे जाते हैं।
शाकाहारी खून पीने वाले जानवरों से सबक नहीं देते हैं:--- शाकाहारी लोग शेर और शेरनी से तनिक भी नहीं सीख पाते हैं, कि जो दूसरों का खून पी कर इतने ताकतवर हो जाते हैं, जिस से उन के साथ कोई भी पंगा नहीं लेता है और अगर कोई पंगा या दंगा करे भी तो मांसाहारी मनुष्य स्त्री और अत्याचारी, बलात्कारी आदमी का पोस्टमार्टम उसी तरह कर सकते हैं, जिस प्रकार शेर और शेरनी जिंदा जानवरों को चीर फाड़ कर खा जाते हैं, इस से स्पष्ट होता है कि मावलिचिंग, बलात्कार, अत्याचार उन्हीं लोगों के साथ होते हैं, जो हिंदुओं के काल्पनिक भगवानों से डर कर, शालीन बन कर के कायरों की जिंदगी जीते हैं, जो लोग अपने दुश्मन का खून पी जाते हैं और पीने के लिए तैयार रहते हैं, उन के साथ कोई भी अत्याचारी, अत्याचार नहीं करता है, जिस प्रकार कोई जानवर भी शेर और शेरनी के साथ पंगा नहीं लेते हैं और उन से भयभीत हो कर के, भाग कर अपनी अपनी कुंद्राओं में छुप जाते हैं, इसलिए जरूरत है कि सभी को आत्म रक्षा करने के लिए मांसाहारी और शाकाहारी होना अति आवश्यक है, तभी वे अत्याचारी, अनाचारी, बलात्कारी, व्याभिचारी, कातिल, माबलिंचर का मुकाबला कर सकते हैं, अन्यथा बड़े-बड़े विशालकाय शाकाहारी जानवरों की तरह ही मौत के मुँह में जाते रहेंगे, इसलिए सभी मूलनिवासियों को शेर और शेरनी से सीखना चाहिए कि अपने शरीर को सुदृढ़, मजबूत और शक्तिशाली बनाने के लिए मांस आदि ताकतवर वस्तुओं का भी सेवन करना चाहिए, शाकाहारी बन कर जीवन नहीं जीना चाहिए अन्यथा ये लोग मॉबलिंचिंग के शिकार होते रहेंगे, हैवान बलात्कारियों के शिकार होते रहेंगे, गुंडों की गुंडागर्दी को सहन करते ही रहेंगे।
राम सिंह आदवंशी।
महासचिव,
बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।
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