मूलनिवासियों के प्रति मनुवादियों की मानसिकता।
मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
मनुवादी चाहे कितने भी बड़े विद्वान बन जाएं? कितने ही बड़े राजनेता बन जाएं? कितने ही बड़े दार्शनिक बन जाएं? कितने ही बड़े धर्मात्मा बन जाएं? मगर इन लोगों की कमीनी जातिवादी मानसिकता कभी नहीं बदल सकती है, क्योंकि जब यह लोग अपने घरों में बैठ कर के अपने परिवार में, अपने मनुवादी भाईचारे के बीच बैठ कर आपस में बातचीत, विचार मंथन करते हैं, तो केवल 85% मूलनिवासियों को गुलाम बनाए रखने के लिए ही ये लोग योजनाएं बनाते हैं और उन को सिरे चढ़ाने के लिए अनेकों प्रकार के सुझावों का आपस में आदान-प्रदान करते हैं। ये सभी लोग भलीभांति जानते हैं, कि यदि 85% मूलनिवासियों को अपना गुलाम बना कर, सेवा करवानी है, तो इन को भूमिहीन और विपन्न बनाए रखना बहुत ही जरूरी है, क्योंकि यदि मूलनिवासी धन धरती के मालिक बन गए तो ये कमाऊ पूत अपने खेतों में अन्न धन पैदा कर के हमारे खेतों में काम नहीं करेंगे, इसीलिए जब 1947 में मुसलमान 400000 एकड़ भूमि छोड़ कर पाकिस्तान चले गए थे, तब हमारे नेता साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया, स्वामी अछुतानंद जी, डाक्टर भीम राव अंवेदकर आदि ने केंद्रीय सरकार पर यह दबाव बनाया गया था, कि यह 400000 एकड़ जमीन केवल पचासी प्रतिशत अछूत मूलनिवासियों को बांट दी जाए, मगर इस समाचार के फैलते ही सभी मनुवादी लोग चौकन्ने (सतर्क) हो गए और सोचने लगे, यदि ये लोग भूमि के मालिक बन गए तो हमारे खेतों में काम कौन करेगा? कौन हमारा घास और फसलें काटेगा? कौन हमारा गोवर गून्त्र उठाएगा? कौन हमारी नौकरी चाकरी और गुलामी करेगा? इसीलिए पंजाब के जाट भूमि मालिकों ने तत्कालीन जाट केंद्रीय कानून मंत्री सरदार प्रताप सिंह कैरों को गुमराह करते हुए मूलनिवासियों को भूमि मालिक बनाए जाने की चिंता व्यक्त की थी, कि यदि इन को जमीन दे दी गई तो हमारा बेड़ा गर्क हो जाएगा! इसीलिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को गुमराह कर के ही सरदार प्रताप सिंह कैरों ने चार लाख एकड़ जमीन को बांटे जाने से रोकते ही कहा था:---
चूहड़े चमारों को जमीन नहीं देनी चाहिए।
विजय कुमार, जिलेदार (सेवा मुक्त)
जहां तक पंजाब के सिखों का अछूतों को दुखी करने का सवाल है, इन्होंने भारत के दूसरे हिस्सों के हिंदू जमींदारों से किसी भी तरह अच्छा सलूक नहीं किया था, जब हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ था, तब मुसलमान भारत में लगभग चालीस लाख एकड़ जमीन छोड़ कर गए थे। डॉक्टर अंबेडकर ने भारत सरकार से अछूतों के लिए चार लाख एकड़ जमीन अलॉट करने पर जोर दिया था परंतु उस समय के कानून मंत्री सरदार प्रताप सिंह कैरों जो बाद में पंजाब के मुख्यमंत्री रहे, ने पंडित नेहरू जो उस समय के भारत के प्रधानमंत्री थे, को कहा, कि यदि आपने मुसलमानों की जमीन में से चार लाख एकड़ जमीन चूहड़े, चमारों को दे दी तो जाट सिख क्या करेंगे। वे डाके मारेंगे और चोरी करने पर तुल जाएंगे। दरअसल सिख जिमीदार अछूतों को अपने खेतों में अपनी मर्जी के अनुसार दी जाने वाली मजदूरी के ऊपर, गांव में खेत मजदूर या कामगार ही ही रहने देना चाहते थे। ये जाट बर्दाश्त नहीं कर सकते थे, कि अछूत भी जमीन के मालिक बन जाए। सरदार प्रताप सिंह कैरों एक जाट था, वह अपने जाट भाइयों के लिए पंडित नेहरू के सामने अड़ गया था, दूसरी तरफ बाबू जगजीवन राम का किरदार था, उस ने अपने भाईयों के लिए कुछ नहीं किया। कांग्रेसी हिंदुओं ने जगजीवन को डॉक्टर अंबेडकर का विरोध करने के लिए ही मंत्री बनाया था।
"भारत के इतिहास के झरोखे में से"
*(विद्रोह के चिन्ह किताब में से*)
ये पंजाबी से हिंदी में अनुवाद किया गया है। जिस से अनुमान लगाया जा सकता है, कि मनुवादियों के वच्चों से ले कर बूढ़ों तक हर व्यक्ति मूलनिवासी लोगों को गुलाम बना कर अपना उल्लू सीधा करने के लिए ही चिंतित रहते हैं। इन के मन में तनिक की इंसानियत नहीं है कि किसी का खून चूसना इंसानियत नहीं है।इसीलिए तो भारतवर्ष की आधी धरती बन्जर, बेकार रख कर मनुवादी सरकारें राष्ट्रीय नुकसान बर्दास्त कर लेती हैं मगर मूलनिवासी जनता को जमीन नहीं बांटती हैं मगर आरक्षण से जीते दल्ले दलाल मुँह के उपर ताले जड़ कर मौनी बाबे बन कर, नींद लेते रहते हैं मगर जिस का के लिए ये दलाल जाते हैं, वह नहीं करते हैं।
धन धरती को वितरित करने का काम तभी संभव होगा, जबपचासी प्रतिशत मूलनिवासी जनता की सरकार बनेगी, इसलिए मूलनिवासी जनता कभी भी मनुवादी राजनीतिक दलों को बोट ना दे कर अपने ही मूलनिवासी उम्मीदबारों को ही जिता कर वहुजन मुक्ति पार्टी की सरकार बनाएं।
राम सिंह आदवंशी।
महासचिव,
वहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।
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