मनुवादियों ने निजी करण क्यों किया

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! आजादी के बाद भारत का शासन-प्रशासन ठीक चलने लगा था, शिक्षा व्यवस्था भी सुचारु रूप से चल रही थी। अधिकतर कर्मचारी, अधिकारी भी ईमानदारी से अपनी डियूटी देते आ रहे थे मगर जब राजनीतिक पार्टियां बढ़ने लगीं, तब कुछ छल कपट शुरू हो गया। चुनावों में अथाह धन खर्च करना शुरू हो गया, डंडे-झंडे, गाड़ियों का ताम-झाम और उन की शराब का खर्च इतना होने लगा कि कोई भी पार्टी उस को वहन करने में असमर्थ हो गई हैं। जनता भी समझ गई, कि ये विधायक और सांसद जीतने के बाद केवल अपनी ही तिजोरियां भर कर करोड़पति और अरबपति बन रहे हैं, अपने ही सगे सम्ब्धियों, वाल-वच्चों की ही देखभाल कर रहे हैं, उन्हीं को ही रोजगार देने लगे हुए हैं, जिस के कारण इन लोगों से जनता का विश्वास उठता गया। कोई इन डाकुओं को चन्दा तक नहीं दे रहा था। कोई भी इन को मुँह नहीं लगा रहा था, जिस से यह लोग चुनाव लड़ने में असमर्थ होते गए, क्योंकि चुनावों के लिए इन के पास अथाह धन इकट्ठा नहीं हो पा रहा था। मनुवादी राजनेताओं को सरकारी सेक्टर से कोई मदद नहीं:---- सरकारी सेक्टर को एक एक एक पाई का भी हिसाब किताब देना पड़ता है, एक एक पैसे का सरकार को भुगतान देना पड़ता है, एक एक पैसे की कमी निकलने पर नौकरी खत्म हो जाती, जिस के कारण मनुवादी राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने के लिए धन उपलब्ध नहीं होता था, धन ना मिलने के कारण  कांग्रेस पार्टी के पाँव उखड़ने लगे और चुनावों पर अधिक खर्च कर के चुनाव जीतने का धंधा शुरू हो चुका था, इसी कारण जिन लोगों ने अपने छोटे-छोटे कल कारखाने, उद्योग और काम धंधे शुरू किए थे, अपने परिवारों का पालन पोषण करने के लिए छोटी छोटी दुकानें खोली हुईं थी, उन के ऊपर कांग्रेसियों की नजर पड़ती गई के और उन को डरा धमका कर धन दौलत इकट्ठा कर के चुनाव लड़ने का षडयंत्र रचा गया, जब इन छोटे-छोटे धंधा करने वालों से इन लोगों को धन लेने का चस्का बढ़ता गया, तो चुनाबों के लिए लाखों ही नहीं करोड़ों रुपए इकठ्ठे करने के लिए इन्होंने प्राइवेट सेक्टर का दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया, जिस से कांग्रेस पार्टी को खूब धन दौलत इकट्ठा होने लगा। सीमेंट उद्योग निजी सेक्टर में लगाए जाने लगे, जिन से खूब आमदन होने लगी। एक बोरी पर पांच पांच रुपए बढ़ाने से करोड़ों रुपए इकट्ठे होने लगे, जिस से लुटेरों को चुनाव लड़ना वहुत आसान हो गया, जब यहां पर इन को सफलता मिली जी तो फिर इन्होंने सारे देश के सरकारी सेक्टर को बेच कर के खूब धन लूटना शुरू कर दिया और टाटा, बिरला, डालिमा, अदानी और अंबानी समूहों को लाभ पहुंचाने के लालच दे कर चुनाव लड़ने के लिए खूब धन इकट्ठा करने लगे। ये लोग निरंतर निजीकरण करते ही गए। कहते हैं कि सब से पहले चुनाव लड़ने के लिए धन उगाही के लिए किसी ने जवाहरलाल नेहरू को सुझाव दिया था, कि सरसों तेल उत्पादक पी ब्रांड कंपनी से आप चुनावों के लिए धन की उगाही कर लो। जब नेहरू ने पी ब्रांड कंपनी से इस विषय में बात की तो उन्होंने अपने टीन के ढक्कन के स्थान पर घटिया किस्म का ढक्कन लगा कर के जो धन बचाया उसे ही कांग्रेस पार्टी को चुनावी फंड के रूप में भीख डाली थी, मगर ईमानदार पी ब्रांड कंपनी ने तेल के रेट नहीं बढ़ाए थे। आज जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं वैसे ही सीमेंट, सरिया, इस्पात, तेल ही नहीं सभी वस्तुओं के रेट आसमान छूने लगते हैं। सभी वस्तुओं की कीमतें छह-सात महीने के लिए आसमान छूने लगती हैं। छोटे बड़े उद्योगपतियों और दुकानदारों का घाटा पूर्ण कर दिया जाता है, जैसे घाटा पूर्ण हो जाता है, वैसे ही वे 50% वस्तुओं के रेट कम करते जाते। वर्तमान मोदी सरकार ने सारे रिकार्ड तोड़ दिए:-- मोदी सरकार ने तो कांग्रेस पार्टी के सारे रिकॉर्ड ही तोड़ दिए और सब कुछ कौड़ियों के भाव अडानी, अंबानी के स्टोर में भेज कर के जनता को थोक में लूटने के लिए वस्तुओं के रेट इतने बढ़ा दिए कि जनता त्राहि-त्राहि कर रही है, एक छोटी सी दियासलाई जो पहले एक रुपए में बिकती थी, उस की कीमत 100% बढ़ा कर के दो रुपए कर दी, क्योंकि दियासलाई हर घर में जलाई जाती है और प्रतिदिन करोड़ों की संख्या मे दियासलाईयां जलाई जाती हैं, जिन से अरबों रुपए इकट्ठा किया जा रहा है। जी एस टी पर जी एस टी:--मजदूरों, किसानों को लूटने के लिए खाद्यानों पर तो टैक्स लगे हुए हैं, मगर खाना खाने पर भी दोबारा जीएसटी टैक्स लगा दिया गया। जी एस टी के ऊपर पुन: जीएसटी वसूलने के लिए, जनता को लूटने के लिए फरमान जारी किया गया है, ताकि सभी होटल बंद हो जाएं, काम करने वाले अधिकारी, कर्मचारी बेकार हो जाएं। लोग होटलों में भोजन खाना बंद कर दें। मनुवादी सरकारों ने पूर्णतया ये आंतरिक समझौता कर रखा है, कि 85% मूलनिवासियों को बुरी तरह लूट लिया जाए, इन का जूस बना कर पी लिया जाए। वे अपने बच्चों को भरपेट खाना ही ना खिला सकें। स्कूलों में बच्चों को भेज ही ना सकें, जिस से मूलनिवासी गरीब लोग मनुवादियों की केवल सेवा करते रहें मगर ये लोग अंधेरे में हैं, इन की फितरत अब बड़ी देर तक नहीं चलेगी। मूलनिवासी समझ चुके हैं:---- मूलनिवासी मनुवादियों की कुचाल को समझ चुके हैं और बामसेफ और बहुजन मुक्ति पार्टी को मजबूत करने में लगे हुए हैं, अब वह दिन दूर नहीं है, जब भारत में हुक्मरान पार्टी केवल और केवल बहुजन मुक्ति पार्टी ही होगी और यही सभी अवर्ण और सवर्ण जातियों को समान कर के आपस में भेदभाव खत्म करेगी, इसलिए 85% मूलनिवासियों को तत्काल सभी मनुवादी दलों, और राजनीतिक पार्टियों से किनारा कर के केवल और केवल बहुजन मुक्ति पार्टी को सत्ता में लाने का प्रयास करना चाहिए, तभी सभी गरीबों को मनुवादियों की गुलामी और लूट से बचाया जा सकता है। राम सिंह आदवंशी। महासचिव, बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।

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