जनरल सीटों से मूल निवासियों को क्यों चुनाव नहीं लड़ाया जाता

 

मेरे 85% मूल निवासियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
भारत में आप की आबादी 85% है मगर आप लोगों को विधानसभाओं, संसद और राज्यसभा  में केवल मात्र साढे 15% सीटों के ऊपर ही चुनाव क्यों लड़ाया जाता है? मूलनिवासियों की  आबादी के अनुसार 85% संसद और विधान सभाओं की सीटों के ऊपर अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाया जाना चाहिए और मनुवादियों की 15% आबादी के अनुसार केवल 15% विधायक और सांसद चुने जाने चाहिए। इस षड्यंत्र के पीछे क्या राज है? इस छल कपट को समझने का आप प्रयास नहीं करते हैं और आप अंधाधुंध 85% मनुवादियों को ही संसद, राज्यसभा, विधान सभाओं और लोकल सेल्फ गवर्नमेंट में चुन कर भेजते हैं।
मूलनिवासी बुद्धिजीवी:--- अधिकतर 85% मूलनिवासी बुद्धिजीवी यह सोचने का कष्ट नहीं करते हैं, कि भारत के अल्पसंख्यक लोग बहु संख्यक लोगों के ऊपर शासन क्यों करते आ रहे हैं? जो मूलनिवासी विचारक, थिंकर इन गंभीर विषयों पर चिंतन करते हैं, शोषण के खिलाफ आंदोलन करते हैं, मनुवादी सरकारों के साथ संघर्ष करते हैं, उन के साथ भी है ये सभी स्वार्थी कायर बुद्धिजीवी  सहयोग नहीं करते हैं, जिस के कारण शोषकों, अत्याचारियों मनुवादियों की सरकारें बनती रहती हैं।
बुद्धिजीवियों की परेशानी:--- केवल दुर्गम स्टेशन पर स्थानांतरण ना हो जाए, बच्चों को कहीं नौकरी मिलने में कोई परेशानी उत्पन्न ना हो जाए, कहीं उन की कोई प्रमोशन रुक ना जाए, इसी उधेड़ बुन और सोच विचार में डूब कर ये बुद्धिजीवी लोग राजनीति की बात ही नहीं करते हैं, समाज सुधार की बात नहीं करते हैं, जबकि इन्हीं लोगों ने आरक्षण आदि की सुविधाओं का लाभ उठा कर के बड़े-बड़े पदों पर आसीन हो कर मान सम्मान प्राप्त किया है, धन दौलत इकट्ठा किया है, जिस से धरती, कार, बंगले आदि खरीद कर, बड़े बड़े आलीशान महल बना कर सुखी जीवन व्यतीत कर रहे हैं मगर ये पढ़े लिखे बुद्धिजीवी लोग अपने गरीब समाज को मनुवादियों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए तनिक भी नहीं सोचते हैं, कि हम 85% होने के बावजूद भी, हमें 15% नौकरियां क्यों दी जा रही हैं? हमारे भूमिहीन मूलनिवासियों को धन धरती का 85% हिस्सा क्यों नहीं दिया जा रहा है? क्यों पचासी प्रतिशत मूलनिवासियों को सामान्य सीटों से टिकट नहीं दिए जाते हैं? क्यों इतना अन्याय किया जा रहा है? क्यों? मूलवासी बुद्धिजीवी इस अन्याय के प्रति कोई चिंतन नहीं करते हैं। केवल साहिब कांशी राम जी ने ही इस अन्याय को समझा और उस के लिए आजीवन संघर्ष कर के कुछ सफलता भी पाई, मगर उन के गद्दार स्वार्थी चेले, चांटों ने उन के क्रांतिकारी वहुजन आंदोलन को ही खत्म कर के अपने आप को 15% मनुवादियों के पास गिरवी रख दिया है। मूलनिवासी समाज को अपने निजी स्वार्थ के लिए मनुवादियों के पास बेच दिया है।
वामसेफ ही आशा की किरण:--- बामसेफ ही एक ऐसा संगठन बचा है, जो साहब कांशी राम जी के आंदोलन को जिंदा रखे हुए हैं और दिन रात उन के आंदोलन को मूर्त रूप देने के लिए प्रयास कर रहा है। हिस्सा आंदोलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विद्या प्रकाश कुरील, एडवोकेट भानु प्रताप सिंह, बामसेफ के नेता वामन मेश्राम जी, बीएल मातंग और कमल कांत कॉले आदि कुछ ही नेता निरंतर बामसेफ के झंडे को उठा कर के सारे देश में साहेब कांशी राम के अधूरे कारवां को पूरा करने के लिए, मूलनिवासी समाज को जागृत कर रहे हैं, बाकी सभी बहुजन समाज के साथ गद्दारी करने वाले गद्दार, स्वार्थी, अहंकारी, और घमंडी लोग मनुवादियों की जी हुजूरी करते हुए मूलनिवासियों को मनुवादियों के पास बेच कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं, इसलिए आप सभी को मनुवादी दलों के चमचों, समर्थकों को अलविदा कर के, केवल बहुजन मुक्ति पार्टी के साथ जुड़ जाना चाहिए। आप को मूलनिवासी राज स्थापित करने के लिए संघर्ष करना चाहिए, तभी मूलनिवासी 85% सीटों के ऊपर चुनाव लड़ सकेंगे और देश में गरीबों की सरकार बना कर गरीबी का अंत कर सकेंगे।
राम सिंह आदवंशी।
महासचिव,
बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल।

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