जाति वाद छुआछूत खत्म क्यों नहीं किया जाता?

 

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
सातवीं शताब्दी में मोहम्मद बिन कासिम ने भारत पर आक्रमण कर के मुसलमानों का शासन स्थापित कर दिया था, जो सन् सोलह सौ तक चलता रहा था, इसी समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी भारत में घुस कर अपने पांव पसारना शुरू कर दिए थे। सन 1857 में ब्रिटिश सरकार ने भारत को पूर्ण रूप से अपने अधीन कर लिया था। 15 अगस्त 1947 तक भारत में ब्रिटिश शासन चलता रहा। इस शासन काल में क्रूर हिंदुओं द्वारा स्थापित हैवानियत के काले कानून नर-नारी बलि प्रथा, पशु बलि प्रथा, सती प्रथा, देवदासी प्रथा, नियोग प्रथा, छुआछूत प्रथा, देव दासी प्रथा, शूद्रों की नव वर वधु शुद्धी करण प्रथा, चरक पूजा प्रथा और गंगा दान प्रथा जारी थी, जिन को ब्रिटिश सरकार ने रद्द कर के गैर कानूनी घोषित कर के अपराध करार कर दिया था।
बलि प्रथा:--- मनुस्मृति के अनुसार भारतवर्ष में देवताओं को खुश करने के लिए केवल सभी जातियों की नारियों और शूद्रों की बलि दी जाती थी। अंग्रेजों ने मनुस्मृति के इस पाश्विक कानून को सन 1830 ईस्बी में रद्द कर दिया था मगर वर्तमान कांग्रेसी और भाजपा सरकार ने इस अमानवीय कानून को पूर्णरूपेण प्रतिबंधित नहीं किया है और आजादी के बाद भी कई बार क्रूर हैबानों ने बलि दी है, कभी कभी माबलिंचिंग के द्वारा शूद्रों, मुसलमानों की बड़ी निर्मम हत्या की जा रही है, जिस के दोषियों को मनुवादी जज और सरकारें फांसी की सजा नहीं दे रही हैं। सन 1919 में अंग्रेजों ने कहा था, कि ब्राह्मणों का चरित्र न्यायप्रिय नहीं होता है, इसलिए ब्राह्मण जाति को जज बनाए जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था, परंतु वर्तमान मनुवादी कांग्रेस और भाजपा सरकार ने यह निर्णय कर रखा है कि कॉलेजियम के माध्यम से ही मनमाने ढंग से ही जज नियुक्त किए जाएंगे, जिन में अधिकतर ब्राह्मणों को ही अधिमान् दिया जा रहा है, जो न्याय का गला घोंटते आ रहे हैं।
संपत्ति का अधिकार:--- ब्रिटिश सरकार ने अधिनियम 11 के अनुसार शूद्रों को 1795 ईस्वी में संपत्ति का अधिकार दिया था, जब कि मनुवादियों ने मनुस्मृति के कानून के अनुसार शूद्रों का धन छीन कर कंगाल रखने का कानून बनाया हुआ था।
देवदासी प्रथा:--- भारतवर्ष में धर्म के ठेकेदारों और तिलकधारियों की मौज मस्ती, काम वासना की प्यास बुझाने के लिए देवदासी प्रथा शुरू की हुई थी, जिस के अनुसार लावारिस और शूद्र बच्चियों को चुरा कर के मंदिरों में रखा जाता था, जिन को देवदासी कहा जाता है, जिन का शारीरिक शोषण करने के लिए पंडित, पुजारी उन के साथ बलात्कार किया करते थे। इन लड़कियों से जो बच्चे पैदा होते थे, उन्हीं को ये लोग हरिजन कहते हैं, क्योंकि इन वच्चियों का कोई बाप नहीं बनता था, इसलिए इस अनाचार, अत्याचार और व्याभिचार को बंद करने के लिए अंग्रेजों ने देवदासी प्रथा बंद कर के शूद्र समाज की लड़कियों को स्वतंत्र किया था।
नववधू शुद्धिकरण प्रथा:--- सन् 1819 से पहले किसी भी शूद्र की शादी हुआ करती थी, तो ब्राह्मण उस का शुद्धीकरण किया करते थे और नव वधु को तीन दिन तक अपने पास रखा करते थे। उस शूद्र नव वधु के साथ ये ब्राह्मण तीन दिन तक बलात्कार किया करते थे, कई बार तो अति सुंदर लड़की होने पर उस के साथ सात दिन तक शुद्धिकरण के नाम पर अनेकों बार बलात्कार किया जाता था, उस के उपरांत ही उस दुल्हन को घर भेजा जाता था, इस प्रथा को भी अंग्रेजी सरकार ने ही बंद करवाया था।
चरक पूजा प्रथा:--- चरक पूजा के नाम पर भी मनुवादी शूद्रों की बलि देते थे, जिस के अनुसार पुल, नये भवन आदि बनाने से पहले शूद्रों को नींव के बीच जिंदा गाड़ दिया जाता था, जिस को अंग्रेजों ने 1863 ईस्वी में बंद करवाया था।
गंगादान प्रथा:--- 85% मूलनिवासी परिवारों में जब पहला लड़का जन्म लेता था, तो ब्राह्मण उस बच्चे को गंगा में डुबो कर मार देते थे और इसे गंगा दान कहा जाता था, क्योंकि किसी भी नव दंपति का पहला बच्चा हृष्ट पुष्ट, स्वस्थ और ताकतवर होता है, इसलिए मूलनिवासियों के घर में कोई सुंदर हष्ट पुष्ट और शक्तिशाली बुद्धिमान जीनियस वच्चा ही ना बचे, उस को मारने के लिए गंगादान प्रथा शुरू की हुई थी, इस प्रथा को रोकने के लिए भी अंग्रेजी हुकूमत ने 1835 में कानून बना कर के बंद करवाया था।
कुर्सी पर बैठने का अधिकार:--- मनुवादियों ने यह कानून बनाया हुआ था, कि कोई भी शूद्र मनुवादियों के सामने उस स्थान पर नहीं बैठ सकता था, किसी को भी कुर्सी के ऊपर बैठने का अधिकार नहीं था, अगर कोई बैठने का प्रयास करता था, तो उसको अमानवीय दंड दिये जाते थे, जिन को अंग्रेजों ने 1835 में खत्म कर के कुर्सी पर बैठने का अधिकार सुनिश्चित किया था।
शिक्षा का अधिकार:--- मनुस्मृति के अनुसार 85% शूद्रों को कोई मौलिक अधिकार नहीं थे, पढ़ने लिखने का तो प्रश्न ही पैदा नहीं हो सकता था, यदि कोई शूद्र धार्मिक प्रवचन सुन लेता तो बड़ी क्रूरता से उस के कान में सिक्का डाल दिया जाता था, जीव तक काट दी जाती थी, इस घोर अत्याचार को रोकने के लिए भी विदेशी अंग्रेजों ने शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित कर के शूद्रों के लिए शिक्षा के दरवाजे खोले थे। मनुस्मृति के अनुसार सभी जातियों की महिलाओं को पढ़ने का अधिकार नहीं था, जिस को भी अंग्रेजों ने हीं बहाल किया था।
भूमालिक अंग्रेजों ने बनाया:--- मनुस्मृति के काले कानून के अनुसार भूमि के मालिक केवल मनुवादी ही थे मगर सन 1932 में, साहिबे कला मंगू राम मुगोवालिया जी ने रक्त क्रांति का बिगुल बजा कर, लॉर्ड लोथियन  को लाहौर असेंबली हॉल मे हुए अधिवेशन में विवश कर दिया था, कि सभी शूद्रों को भी भूमि मालिक बनने और भूमि खरीदने का अधिकार दिया जाए, जिस के परिणाम स्वरुप ही शूद्रों को भूमि का मालिक बनाया गया था, उसी दिन उन्होंने अंग्रेजों से सभी क्षेत्रों में आरक्षण का अधिकार प्राप्त किया था, जिस के परिणाम स्वरूप गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के माध्यम से सभी को प्रतिनिधित्व दिया गया है।
सामाजिक सुधार:--- अंग्रेजों ने शूद्र और अति शूद्र जातियों के हितों और उज्जवल भविष्य के लिए अनेकों सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सुधार किए थे। प्रथम इंडिया एक्ट और द्वितीय इंडिया एक्ट राजनीतिक सुधारों के दस्तावेज हैं, इन सुधारों के कारण ही ब्राह्मणों को, अंग्रेज आंखों में तिनके की तरह खटकने लगे थे, जिस के कारण वाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी एंड कंपनी ने अंग्रेजों के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन शुरू कर के शूद्रों और अति शूद्रों को दोबारा अपने सेवक और गुलाम बनाने के लिए 1920 में ब्राह्मण सभा, 1922 में हिंदू महासभा और 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। इन हिंदू संगठनों के लोग मनुस्मृति को पुन:लागू कर के मूलनिवासी लोगों का शोषण करना चाहते हैं।
85% मूलनिवासियों के धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आंदोलनों के कारण मनुवादियों की काल्पनिक मान्यताओं, परंपराओं, संस्कारों, त्योहारों, पर्वों और धर्म ग्रंथों को ठेस लगी है, जिस के कारण आज  मनुस्मृति के कानूनों का भारतीय समाज पर उतना प्रभाव नहीं रहा है, जितना पहले हुआ करता था। संवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था सवर्ण लोगों को रास नहीं आ रहा है, जिस के कारण मनुवादी कांग्रेस और भाजपा सरकारें शत प्रतिशत निजीकरण कर के 85% मूलनिवासियों को नौकरियों से वंचित करते जा रहे हैं, जिस के कारण भारत खूनी क्रांति की ओर बढ़ता जा रहा है, यदि समय पर भारत के राजनेता नहीं समझ पाए तो यह उन के भविष्य के लिए खतरे की घंटी होगी।
राम सिंह आदवंशी।
महासचिव,
वहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।

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