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Showing posts from November, 2022

चँवर वंश क देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग 12।।

चंवरवंश के देवतुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।।भाग12।। बालक रविदास का शंख बजाना:----बालक रविदास जी की आध्यात्मिकता तो जन्म से ही दिखाई देने लग पड़ी थी। चार साल की उम्र में उन्होंने पूजा पाठ आदि शुरू कर दिया था, इसी समय उन्होंने धोती, तिलक लगा कर शंख बजाना भी शुरू कर दिया था, उन के शंख बजाने का अंदाज ऐसा अद्वितीय था कि कांशी के सारे लोग हैरान होने लगे। माता पिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा:---अपने होनहार बालक की अदाओं को देख कर परिवार के सदश्यों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा था। पंडित गोपाल ने जो कहा था कि ये बालक चारों वर्णों का गुरु कहलागा और जाति-पाती, छुआछूत को खत्म कर के एक ही पंगत में सभी को खाना खिलाएगा, उस भविष्यवाणी का अनुमान लगाया जाने लगा। अपने ही घर में वे प्रतिदिन धार्मिक सत्संग करने लग पड़े थे। उन के सत्संग की धूंम चारों ओर फैलती ही जा रही थी। सभी शूद्र उन के प्रवचन सुनने के लिए उन के घर पर इकठ्ठे हो जाते थे। उन के सत्संग को सुन कर लोगों के मन में आत्म बल पैदा होने लगा। गुलामों के अंदर धार्मिक और सामाजिक ज्ञान की ज्योति जलने लगी। तिलकधारी आपा खो बैठे:----सुवह चार बजे उठ कर ...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग 11।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग 11।। गुरु रविदास और कृष्ण का तुलनात्मक चिंतन :----त्रेता युग के कृष्ण को काल्पनिक अवतार घोषित किया गया है, उस के बारे मे अनेकों कथाएँ घड़ी गई हैं जो तर्क की कसौटी पर कसने के बाद हास्यस्पद ही लगती है, उन की लीलाओं का मांसल और लौकिक वर्णन किया गया, जिस के कारण कृष्ण यादव जनता में अच्छी हैसियत नहीं रखता है मगर फिर भी हिंदू लेखकों, कवियों ने उन की कथाओं में लौकिक श्रृंगारिक चित्रण बड़े ही विशद ढंग से किया है, जिस से युवा अपना मांसिक संतुलन खो कर नारी जाति को भी राधा मान कर कटाक्ष करते आए हैं, जब कि उस का मुख आभा मंडल गुरु रविदास जी के हजारवें भाग के समान नहीं था। कृष्ण ने कोई भी ऐसा भलाई का कार्य नहीं किया है, जिस से मानव जगत का कल्याण हो, केवल विलासिता और खून खराबे के अतिरिक्त महाभारत में कुछ नजर नहीं आता है मगर गुरु रविदास जी महाराज ने अपने जीवन काल में कहीं भी हास्य रस और शृंगार रस का रसावादन नहीं किया। मनुवाद का मुकाबला:----उन्होंने मनुवाद का मुकाबला करते हुए अपना सारा जीवन मुशीबतों, दुखों में उलझ कर हैवानों को सीधे मार्ग पर डालने के ...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग दस।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग दस।। बालक रविदास का जन्म उत्सव:--- गुरु रविदास जी अलौकिक शक्ति के स्वामी हुए हैं। जब जन्म लेते समय दाई भानी ने गुरु जी को स्पर्श करते समय उन के मुख के आभा मंडल के दर्शन किये थे, तब उस की आँखों की लुप्त रोशनी वापस आ गई थी, जिस से विस्मित हो कर दाई भानी ने स्वामी ईशर दास जी महाराज के शब्दों में कहा था कि----- पैदा होया बालक रविदास जी "जोत प्रगटी आकाश"। दाई कैहंदी इह होया खास। इह तां रब दा नूर कोई आया। जोत प्रगटी अपर अपारे जी। होया चानंन जगत सारे जी।। दाई भानी ने फरमाया, कि बालक रविदास जी के प्रकाश होने से समूचे आकाश में ज्योति प्रकट हो गई। सारे संसार में रोशनी ही रोशनी हो गई। भानी दाई जो गल सुनाए। कई वाल तां मैं जमाए। ऐसा वाल ना कहाए। मैं तां अघम रूप देख पाया।। ये कोई साधारण बालक नहीं जन्मा है, ये सभी अंधों को रोशनी, गूँगों को जुबान, नंगों को वस्त्र, भूखों को भोजन और बेसहारों को सहारा और गुलामों को गुलामी से मुक्त करेगा। बाद में भानी के ये वचन सत्य सिद्ध हुए। बाबा कालू दास की खुशियाँ:----पिता संतोष दास जी, माता दिआरी जी, ब...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग न।।

चंवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग नौ।। गुरु रविदास जी का नाम:---- गुरु रविदास जी महाराज के नाम का संबंध रवि से अर्थात सूर्य से जोड़ा गया है और शायद उन का जन्म भी रविवार को ही हुआ होगा क्योंकि पूर्व में जब मूलनिवासी लोगों के घर में जो बच्चे पैदा होते थे, तो अक्सर उन का नामकरण उन के जन्म दिन के अधार पर ही कर दिया जाता था। इसी कारण गुरु जी का नाम भी रविदास रखा गया था। कुछ लोग उन के नाम के बारे में संदेहास्पद टिप्पणियां करते रहते हैं और उन में कुछ सच्चाई भी है क्योंकि गुरु रविदास जी को कहीं रैदास कहा जा रहा है, कहीं रामदास कहा जा रहा है, तो कहीं रोहिदास कहा जा रहा है, इस प्रकार ना जाने कितने शब्दों का प्रयोग गुरु रविदास जी महाराज के लिए किया जा रहा है परंतु यह शब्द स्थानीय भाषाओं से लिए गए लगते हैं क्योंकि जब हम गुजरात गए तो वहां गुरु रविदास जी को रोहिदास के नाम से पुकारते सुनें गए, जिस से अनुभव हुआ कि गुरु जी के नाम की विभिन्नता कुछ स्थानीय बोलियों के आधार पर भी हुई है। मनुवादी फितरत:--- भारत के मनुवादी लोग मूलनिवासी अर्थात भारत के आदिवासी लोगों को गुलाम बना कर के रखते आ...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग सात।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी ।।भाग 7।। गुरु रविदास आदधर्म के संरक्षक:-- गुरु रविदास जी महाराज आदधर्म के संरक्षक, पोषक और प्रचारक रहे हैं।उन्होंने आदधर्म के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है----- आद से प्रगट भयो जाको ना कोउ अंत। आदधर्म गुरु रविदास का जाने बिरला संत।। गुरुजी के इन शब्दों से स्पष्ट हो जाता है, कि गुरु रविदास जी महाराज किसी भी हिंदू, मुस्लिम, ईसाई धर्म को नहीं मानते थे क्योंकि हिंदू, मुस्लिम और ईसाई धर्मों के नियम सिद्धांत और कथाएं एक जैसी हैं, जिस प्रकार बाईबल में धरती के जीवों का विनाश करने की बात कही गई है, ठीक वैसी ही कथा मनुस्मृति और जयशंकर प्रसाद कृत कामायनी में लिखी गई हैं, इसलिए यह स्पष्ट होता है कि आर्यों ने बाईबल से कथाओं की कॉपी की हुई है और उन को अपनी मनुस्मृति में लिख लिया है। जब गुरु दास जी महाराज कहते हैं हिंदू अंधा, मुस्लिम काणा। तो फिर गुरु जी हिंदू धर्म की प्रशंसा कैसे कर सकते थे? वे वेदों के बारे में अपने विचार क्यों व्यक्त करते हैं? पुराणों के बारे में वे कहीं भी कोई जिक्र नहीं करते हैं। इस के बावजूद भी हिंदुओं ने मंघड़ंत कथा लि...

चँवर वंश के सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग छ।।

चमार वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी भाग 6।। गुरु रविदास जी एक क्रांतिकारी संत:----भारत की मूल निवासी जनता ब्राह्मणों, राजपूत राजाओं, महाराजाओं और मुसलमान बादशाहों की चक्की तले बुरी तरह पिस रही थी। गुलाम जनता को किसी भी हिंदू राजा और महाराजा का संरक्षण नहीं मिल रहा था, ऐसे हालातों में गुरु रविदास जी महाराज ने ब्राह्मणों के साथ पंगा लेना शुरू किया था। ब्राह्मण किसी को भी पढ़ना, लिखना और पूजा पाठ करने नहीं देते थे और शासक वर्ग भी ब्राह्मणों का ही साथ देते आ रहे थे, गुरु जी ने ब्राह्मणों की खिली उड़ाने के लिए धोती, तिलक लगा ऐसा शंख बजाया कि सारी जनता के होश उड़ गए, जिस से ब्राह्मणों की थोथी पूजा का गुबारा फट गया। इसीलिए कहा जा सकता है, कि गुरु रविदास जी महाराज एक क्रांतिकारी संत हुए हैं। क्रांतिकारी समाजवादी नेता :---- गुरु रविदास जी महाराज ने कहा:---- ऐसा चाहूँ राज मैं, जहां मिले सभन को अन्न। छोट बड़ सभ सम वसै, तां रविदास रहै प्रसन्न।। जिस देश में एक वर्ग भूखा नंगा रखा जाता था, कोई किसी को मालिक अधिकार नहीं थे, ब्राह्मण के मुँह से निकला फरमान ही कानून होता था, उसी देश में कोई...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग पांच।।

।। चँवर वंश के देवतुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग पांच।। गुरु रविदास जी जीव हत्या के विरोधी:--- भारत के मूलनिवासी आदर्श देवतुल्य शांतिप्रिय, दयालू, मानवता के पुजारी, बलिदानी, दानवीर, ममता के सागर होते आए हैं। यूरोप और एशिया से आने वाले दुखियों, पीड़ितों के प्रति दयाभाव रखने वाले भोलेभाले तत्कालीन भारतीय सम्राट शिवशंकर ने इन लोगों को भारत में शरण दे कर अपने लिए मुशीबत मोल ले ली थी। दानवीर राजा बलि ने नारी की बात मान कर अपने प्राण देदिए थे। महिसासुर ने मनुवादी नारी के छल में आ कर अपने प्राण दे दिये थे, मगर उन्होंने नारी के ऊपर कभी भी हाथ ना तो उठाया और ना ही कभी जान से मारने का पाप कर्म नहीं किया था, ऐसे हुए हैं हमारे पूर्वज। रविदास जीव मत मारिए, इक साहिब सब मांहि। सब जीव मांहि इकहि, आतमा दूसरहू कोउ नाहिं।। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे विश्व के मानव! किसी भी जीव की हत्या मत करो। सभी प्राणियों के भीतर एक ही अदृष्य आद पुरुष निवास करता है। संसार में जितने भी प्राणी हैं, उन के भीतर उसी परम पिता परमेश्वर की अनूठी आत्मा होती है। एक ही साहिब अर्थात भगवान की आत्मा सभी जीवों के शर...

चँवर वंश के देव तुल्य बेताज सम्राट गुरु रविदास जी।

चमार वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी ।।भाग दो।। गुरु रविदास जी की वाणी में प्रक्षिप्तांश:--- ज्यों ही गुरु रविदास जी महाराज इस संसार को अलविदा कर के चले गए तब यूरेशियन आर्यों ने गुरु रविदास जी महाराज की वाणी को नष्ट भ्रष्ट कर दिया गया था, जिस के कारण उन की मूल अर्थात पूरी मौलिक वाणी उपलब्ध नहीं होती है, जिस वाणी को गुरु नानक देव जी लिख कर ले आए थे और जो सिखों के पास थी, उस के साथ यूरेशियन आर्य छेड़छाड़ नहीं कर सके थे। सच्चे अर्थों में गुरु जी की वही मौलिक वाणी गुरु ग्रंथ साहब में सुरक्षित अंकित की गई है, उदाहरण के रूप में:-----                  ।राग मल्हार। मिलत पिआरे प्राण नाथु कवन भगति ते।। साध सँगति पाई परम गते।।रहाउ।। मैले कपरे कहां लउ धोवउ।। आवैगी नींद कहां लगु सोवउ।।१।। जोई जोई जोरिउ सोई सोई फाटिउ।। झूठे वनजि उठि ही गईं हाटिउ।।२।। कहु रविदास भइउ जब लेखिउ।। जोई जोई कीनो सोई सोई देखिउ।।३।। शब्द विन्यास में अंतर:--- इस शब्द के वर्ण विन्यास से अनुमान लगाया जा सकता है, कि जो गुरु रविदास जी महाराज के नाम से वाणी तैयार की गई है, क्या वह उपरोक्त शब्द के वर्ण विन्यास से मेल खाती ...

चँवर वंश के देव तुल्य बेताज सम्राट गुरु रविदास जी।।

चँवर वंश के देव तुल्य बेताज सम्राट गुरु रविदास जी।। जब मनुस्मृति के काले कानूनों ने भारतवर्ष के मूलनिवासियों का जीना दुश्वार कर दिया था और मुस्लिम बादशाहों ने तलवार की नोक पर इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करने के लिए कत्लेआम शुरू किया हुआ था, उस समय राजपूत राजाओं ने भी अपनी बहू बेटियों को मुस्लिम बादशाहों को नजराना कर के अपनी जान बचा ली थी और जनता को परमपिता परमेश्वर के सहारे छोड़ दिया था, उसी समय भारतवासियों की रक्षार्थ गुरु रविदास जी महाराज का प्रकाश विक्रमी संवत 1433 में हुआ था, इन के पिता जी का नाम संतोष दास और माता का नाम कलसां देवी था। इन के दादा कालूराम और दादी लखपति जी हुए हैं। इन का पाणिग्रहण सुभागण देवी से हुआ था। इन के सुपुत्र संत दास और सुपुत्री संत कौर हुए हैं। शिक्षा:------ गुरु रविदास जी महाराज जन्म से ही तीव्र बुद्धि बालक हुए हैं, ब्राह्मणों ने उन को देवनागरी लिपि का प्रयोग करने नहीं दिया था, जिस के कारण उन्होंने स्वयं ही गुरुमुखी लिपि तैयार की थी और इसी लिपि में ही लिखना शुरू किया था। जब कोई ऐसा मेधावी विद्यार्थी हो तो उस को कोई भी शिक्षा द...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट।। भाग 06।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट।। भाग 06।। महात्म बुध का जन्म 563 ईसवी पूर्व इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय कुल के राजा शुद्दोधन के घर, तत्कालीन विशाल भारत के नेपाल स्थित लुंबिनी गांव में हुआ था। इन की माता का नाम महामाया था जो कोलिए वंश से संबंध रखती थी, वह वच्चे को जन्म देने के सात दिन बाद मर गई थी। वच्चे का नाम सिद्धार्थ रखा गया था, जिस का पालन पोषण उस की सगी मौसी महारानी महाप्रजावती (गौतमी) ने किया था शादी:---- सोलह वर्ष की आयु में सिद्धार्थ की शादी यशोधरा से हुई थी, जिस से राहुल नामक बेटा हुआ था। सिद्धार्थ शब्द का अर्थ होता है *वह बालक जो सिद्धि प्राप्त करने के लिए जन्मा हो*। वैराग्य:---सिद्धार्थ सांसारिक दुखों को देख कर के अपना राजपाठ, पत्नी और बेटे को त्याग कर के जंगलों की ओर चला गया था और अपने गुरु अलार कलाम से शिक्षा ग्रहण कर के 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा के दिन पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानास्थ हो गए थे। उस ने बोधगया में निरंजना नदी के तट पर कठोर, तपस्या करने के बाद सुजाता नामक लड़की के हाथों से खीर खा कर अपनी साधना को समाप्त किया था। उपदेश देना:---- लूंबनी में पहला अध्यात्मिक ...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट।। भाग पांच।।

चमार वंश के देवतुल्य सम्राट! जब तक भारत में यूरेशियन लोगों का आगमन नहीं हुआ था तब तक तो भारत में सतयुग था मगर ज्यों ही यूरेशिया से यूरेशियन लोग भारत में घुसे तब से ही भारत में राक्षस राज शुरू हो गया था, जिस के प्रमाण परशुराम से मिलना शुरू हो गए थे, क्योंकि परशु राम से पहले सतियुग में किसी के साथ कोई खून खराबा नहीं होता था और भारत में कातिलों और कत्ल का भी कोई नामोनिशान तक नहीं मिलता है। सारे भारतवर्ष में शांति ही शांति नजर आती है। कोई भी किसी के साथ छलकपट अन्याय, अनाचार, अत्याचार, बलात्कार व्याभिचार, बेईमानी, धोखाधड़ी, नहीं करता था। कोई भी जाति पाती, छुआछूत, रंग भेद और आदि धर्म के अतिरिक्त कोई धर्म नहीं था मगर ज्यों ही इन लोगों ने भारतवर्ष में आ कर उन्माद मचाना शुरू किया था, तब से ही भारत कतलगाह बन गई थी जो आज भी मावलिंचिंग आदि के द्वारा जारी है। परशुराम का उदय:---- महाभारत और विष्णु पुराण में लिखा गया है, कि परशुराम का असली नाम राम था, परंतु भगवान शिव ने उसे अपना फरसा नामक हथियार इस राम को दिया था, जिस के कारण इस का नाम परशुराम पड़ा था, आगे कहा गया है कि महार्षि भृगु के पौत्र वैदिक ...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट।। भाग, 04।।

चँवर वंश के सम्राट देव तुल्य।।भाग 04।। विश्व के साहित्य में अगर नजर डाली जाए, तो किसी भी देश में काल विभाजन नहीं किया गया है। केवल भारतवर्ष में ही आदि काल से लेकर वर्तमान काल तक समय को चार काल खंडों में बांट कर, भारत के वास्तविक मूलनिवासी लोगों का इतिहास मिटाने का षड्यंत्र रचा गया था। ऐसा कर के सत्य के सन्मार्ग पर चलने वाली मूलनिवासी जनता को महामूर्ख बनाया गया है। सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग। यदि सारे यूरोप और एशिया में भी इस काल विभाजन के बारे में इतिहास मिलता, तो हम इन चार काल खंडों को भी मान सकते थे मगर इन चारों काल खंडों का जन्म केवल भारत में ही हुआ है। भ्रामक काल विभाजन:--- मनुवादियों द्वारा द्वापर का एक अवतार राम बताया गया है, त्रेता युग का भी एक ही अवतार कृष्ण को बताया गया है और कलियुग का भी एक ही होने वाला, भावी अवतार *कल्कि* होगा, मगर मच्छ (मत्स्य), कूर्म (कच्छ,कछुआ) वराह (सुअर), हयग्रीव, नरसिंह को सतियुग का भी अवतार नही लिखा गया है, इन्हें केवल मात्र पहले अवतार लिखा गया है, जो भारतवर्ष की मूलनिवासी जनता को भ्रमित करने के लिए लिखा हुआ है। कुछ वर्षों से इन अतिमानवों के सिरो...

चँवर वंश के देवतुल्य सम्राट।। भाग 02।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट।।भाग 02।। पिछले अंक में यह बताया गया था कि यूरेशिया से आए हुए लोगों ने भारत की देवतुल्य जनता को 33 करोड़ देवता घोषित कर रखा है और उन के शासकों को यूरेशियन के अवतार लिख डाला है मगर इन के इतिहास को भले ही बदल दिया गया है मगर उन की मौलिकता को कोई बदल नहीं सका है और ना ही कोई कभी बदल सकेगा क्योंकि भारतवर्ष के सभी मूल मंत्रों में आद और जुगाद का नाम सब से पहले आता है, जो आज तक नहीं बदल सका है और शायद यूरेशियन लेखकों को यह ध्यान में नहीं आया है, कि यह आद और जुगाद कल को हमारे झूठ के लिए, हमारे ही गले में फास बन जाएगी। आद और जुगाद सत्य ही हैं और सत्य ही रहेगा, तो फिर उन के भावी वंशज और शासकों के नाम भी सत्य ही हैं। मच्छ अवतार:--- चार हजार छ: सौ वर्ष पूर्व भारत के मूलनिवासियों को यूरेशियन आर्यों ने गुलाम बना कर शिक्षा के अधिकार से वंचित कर के सोचने, समझने की शक्ति पूरी तरह से समाप्त कर दी थी, जिस के कारण इन मनुवादी लेखकों की तर्कहीन कथाओं को पूर्ण रूप से सत्य और प्रमाणिक मानने लग पड़े थे। आर्य लोगों ने जनता को मूर्ख और अंधविश्वासी बनाने के लिए देवी देवताओं की खोज कर...

चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा।। भाग 15।।

।।चँवरवंश का अंतिम वीर योद्धा ।।भाग 15।।                      गुरुओं के गुरु रविदास जी महाराज केवल साधु संत, फकीर और अवतार ही नहीं थे, वे सशक्त क्रांतिकारी वीर और निडर योद्धा हुए हैं, उन की रचनाओं में यह देखा जा सकता है, कि गुरु जी  सामाजिक परिवर्तन के साथ साथ धर्म को भी स्थापित करने के लिए संगत को आबाह्न करते थे, जिस के लिए वे मर मिटने के लिए भी संगत को प्रेरित किया करते थे। गुरु महाराज फरमाते हैं कि धर्म की रक्षा के लिए के लिए यदि जिंद- जान भी चली जाए तो कुर्बान कर देनी चाहिए! वे फरमाते हैं, कि संसार में प्राणी बार-बार नहीं आता है, इसलिए इस जन्म में अच्छे कार्य कर के लाभ उठा लेना चाहिए। मनुष्य को सम्बोधित करते हुए गुरु जी फरमाते हैं कि तेरे कई हम उम्र मर चुके हैं और वे कभी वापस नहीं आ सके हैं, जिन लोगों ने धर्म को बचाने के लिए प्राणों की आहुति दी है, वे सभी शहीद कहलाए हैं और अमर हो गए हैं, जब कि जो लोग केवल खाना खा कर के सोते ही रहते हैं, उन का धरती के ऊपर कोई नामोनिशान नहीं रहा है, इसलिए हे मानव! तू अपना जीना-मरना एक समान कर ले अर्थात जीते जी मर कर के अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिख...

वंश का अंतिम वीर योद्धा।। भाग 14।।

  चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा भाग।।14।। पराजित बादशाह सिकन्दर लोधी और उपस्थित लाखों लोगों ने गुरु रविदास जी महाराज द्वारा तैयार आवेहयात (अमृत जल) को बड़ी श्रद्धा से ग्रहण कर लिया, जिस से उन की आँखों में दिव्य ज्योति प्रकट हो गई। सभी गुरु महाराज की जय जयकार करते हुए बोल रहे थे, रविदास शक्ति जिंदावाद, जिंदावाद, रविदास शक्ति जिंदावाद, जिंदावाद। सारी संगत के मुख पर अलौकिक नूर नजर आ रहा था।                    ।। शब्द।। बेगम शहर को दर्श दिखाया। जित्थे मखलूकात उपजाया। खुल गईयाँ दिव अखियाँ अमीरत पी पी के।१। हिंदू मुसलम लखाँ तारे। जावाँ सतगुरु दे बलिहारे। कीते शत्रु ते उपकारे *सोहम* शब्द दृड़ाया बेगम ही ही के।२। करोपि कार जे डारदे। रंक भूप छिन में मारदे। आई पुन तारदे। करोपि डी डी के।३। बादशाह की दिव्य दृष्टि खुल गई:---जब गुरु रविदास जी महाराज, बादशाह सिकंदर लोधी पर मेहरबान हो गए तब उन्होंने साध संगत के साथ उन को भी बेगमपुरा शहर के दर्शन करवा कर आवेहयात उत्पन्न कर के वहाँ लाखों हिंदूओं मुसलमानों को पिलाया, जिस से सब की आँखों में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो गई, जिस से प्रभावित हो कर बादशाह सिकन्...

चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा।। भाग 14.।।

  चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा भाग।।14।। पराजित बादशाह सिकन्दर लोधी और उपस्थित लाखों लोगों ने गुरु रविदास जी महाराज द्वारा तैयार आवेहयात् को बड़ी श्रद्धा से ग्रहण कर लिया, सभी गुरु जी की जय जयकर करते हुए बोल रहे थे, रविदास शक्ति जिंदावाद जिंदावाद, गरीबों के मसीहा जिंदावाद जिंदावाद। सारा ज्योतिरमंडल गुरु जी की जय जयकार से गूँज रहा था। सारी संगत के मुख पर अलौकिक नूर नजर आ रहा था।                    ।। दोहा।। बेगम शहर को दर्श दिखाया। जित्थे मखलूकाटत उपजाया। खुल गईयाँ दिवअखियाँ अमीरात पी पी के।। बेगम शहर दर्श दिखाया। जित्थे माखलूकात तब उपजाया। खुल गईआं जी दिव अखिया अमृत पी पी के। हिंदू मुसलम लखाँ तारे। जावाँ सतगुरु दे बलिहारे। कीते शत्रु ते उपकारे शब्द दृड़ाया बेगम ही ही के।। करोपि कार कर जे डारदे। रंक भूप नूं छिन बिच मारदे। आई पुन तारदे। करोपि डी डी के।। बादशाह की दिव्य दृष्टि खुल गई:---जब गुरु रविदास जी महाराज, बादशाह सिकंदर लोधी पर मेहरबान हो गए तब उन्होंने साध संगत के साथ उन को बेगमपुरा के दर्शन करवाएं जहां पर आवे आयात उत्पन्न हुआ था, वहाँ लाखों हिंदू, मुसलमानों को अपने ज्ञान की...

चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा।। भाग 13।।

।।चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा भाग।।13।। जब गुरु रविदास महाराज ने, बादशाह सिकन्दर लोधी को अपने क्रांतिकारी प्रवचन से पत्थर से मोम बना दिया, हैवान से एक अच्छा इंसान बना दिया, तब वह समझा कि ये चमार नहीं है अपितु कोई तारनहार करतार का साक्षात अवतार ही है जिस के समक्ष कोई भी पीर, पैगम्बर शून्य मात्र ही हैं। बादशाह सिकन्दर लोधी सोच रहा था कि, जिस बादशाह के सामने अपराधी थर थर काँप उठते थे, जिस के सामने लोगों की हवाईयाँ उड़ जाती थी, जिस के मुँह से निकली सजा केवल तलवार का बार ही हुआ करती है, वह आज मूक, बधिर और लाचार हो कर अजेय शक्ति के सामने अपराधी के रूप में खड़ा है। लोधी अपनी पराजय स्वीकार करने पर दया की भीख मांगता हुआ गुरु जी से फरियाद करता हुआ कहता है। बादशाह सिकन्दर की फरियाद:---- पराजित बादशाह सिकन्दर लोधी, गुरु रविदास महाराज के चरण कमलों पर गिर गया और रहम की दात मांगता हुआ कहता है कि हे मेरे पीर! मुझे बख्श लो, आप बख्शनहार सतगुरु हो। आप चौदह तबकों के शहंशाह नजर आ रहे हो, आप ने तो अपना नाम ही रविदास चमार रख लिया है। हे मेरे गुरु महाराज जी! मैं गरीब, कंगला गँवार हूँ, मुझे अपने हाथों से आव...

चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा भाग 12।।

।। चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा।।भाग12।। बादशाह सिकन्दर लोधी, जेल में गुरु रविदास जी महाराज के विराट स्वरूप को देख कर के चकित और भयाक्रांत हो गया था। उस को इन दृश्यों को देख कर सिहरन हो रही थी मगर फिर भी गुरु रविदास जी महाराज, बादशाह सिकन्दर लोधी का हिरदय परिवर्तन करने के लिए अपने  शब्द रूपी बाणों से लोधी को घायल करते ही जा रहे थे, गुरु जी ने फरमाया कि, हे सिकन्दर! आप तो बादशाह हो और हम गरीब आदमी हैं, आप के सामने हमारा कोई जोर नहीं चलता अर्थात हम गरीब लोग आप के साथ कोई भी किसी प्रकार कर लोहा नहीं ले सकते हैं। आप के हाथ में देश की बागडोर है, आप चाहे जिंदा रखो, चाहे देश से बाहर निकाल दो। आप के पास चौदह हजार गुना शक्ति है, जिस के आगे हम कंगाल गरीबों की पुकार कौन सुनेगा? आप हमें चाहे जेल में डाल दो, चाहे फांसी के फंदे पर लटका दो, चाहे तलवार से घायल कर दो। ।                             ।।श्री रविदास जी।। तुसीं पातशाह असीं गरीब बन्दे की जोर है तुसां दे नाल राजा।१। तेरे हथ है हुकूमत डोर मुल्की चाहे रख तां चाहे निकाल राजा।२। सती बीहीं सौ जोरावरां दा ऐ की उजर गरीब कंगाल राजा।३। चाहे जेल ...

चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा भाग ।।11।।

।।चंवर वंश का अंतिम वीर योद्धा।।भाग 11।। बादशाह सिकन्दर लोधी ने, सतगुरु रविदास जी महाराज को दिल्ली स्थित तुगलकाबाद जेल में अकारण ही बन्द कर दिया था, जिस में बैठ कर वे आदपुरुष का ध्यान लगा कर के अजपाजाप कर रहे थे और अंतर्ध्यान हो कर के *सोहम* का अजपाजाप करते हुए इस तरीके से बैठे हुए थे कि मानो आदि पुरुष की नाम रूपी मदिरा की सुराही पी कर ध्यान में मगन हो गए हों। ऐसा प्रतीत हो रहा था, कि वे अपने आप को भूल गए हों अर्थात आत्मविस्मृत हो गए हों। उस समय उन की अंतरात्मा में केवल अटूट अनहद ध्वनि ही सुनाई दे रही थी, जिस में उन्होंने सुनाई दिया कि वह कौन ऐसा व्यक्ति है, जो आप को अपने दीन धर्म में ला सकता है, जो भगत मुझ में समा गया है, मुझ से उस का प्रेम मछली और पानी की तरह अटूट है। सिकन्दर लोधी का जेल का निरीक्षण:--- जब गुरु रविदास जी महाराज को जेल में आठ दिन बीत गए तो बादशाह सिकंदर लोधी ने सोचा, कि चलो तुगलकाबाद में जा कर गुरु रविदास जी महाराज की दुर्दशा को देख आते हैं। बादशाह अपने दरबारियों के साथ जब जेल के बाहर पहुंचा और दरवाजे से झांक कर अंदर देखने लगा तो उस के पांवों तले मिट्टी खिसक गई। उस न...

चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा bhaag10।।

  ।।चमार वंश का अंतिम योद्धा ।।भाग10।। बादशाह सिकंदर लोदी अत्यन्त क्रूर, अत्याचारी, निर्दयी और पापी बादशाह था। उस ने अत्यन्त घोर अपराधियों, कालितों को दण्ड देने के लिए दिल्ली स्थित तुगलकाबाद के वियाबान जंगल के बीच कारागार बनाई हुई थी। इसी कारागार में गुरु रविदास जी महाराज को बन्द करवाया गया था। जेठ महीने की भीष्ण गर्मी में यह कारागार अग्नि की भट्ठी बनी हुई थी, जिस में किसी भी प्राणी को एक क्षण के लिए भी समय बिताना और रहना मुश्किल था।                 ।। दोहा।। मुशक बंध रविदास को दीना जेल पुंचाई। काल कोठड़ी बंद कर कुल्फ दिए लगाई।।१।।  बादशाह सिकंदर लोदी ने, गुरु रविदास महाराज के हाथों में हथकड़ियां और पैरों में बेड़ियां डलवा कर तुग़लकाबाद काल कोठरी में बंद करवा कर उस को ताला लगवा दिया।                       ।।दोहा।। बिच कैद दे कुझ कु दिन निकल जाई अरमान। दीन इस्लाम कबूल तब ऐह भूलन होर गिआन।।१।। वेखूँ तेरा शहर भी बेगम जिस का नाम। लख असमान उपरे कीता जो बसराम।।२।। बादशाह सिकंदर लोदी ने सोचा था, कि कुछ एक दिन तपती हुई कारागार में रहने के बाद गुरु रविदास जी महाराज को सारे अरमान और ज्ञा...