चँवर वंश के सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग छ।।

चमार वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी भाग 6।। गुरु रविदास जी एक क्रांतिकारी संत:----भारत की मूल निवासी जनता ब्राह्मणों, राजपूत राजाओं, महाराजाओं और मुसलमान बादशाहों की चक्की तले बुरी तरह पिस रही थी। गुलाम जनता को किसी भी हिंदू राजा और महाराजा का संरक्षण नहीं मिल रहा था, ऐसे हालातों में गुरु रविदास जी महाराज ने ब्राह्मणों के साथ पंगा लेना शुरू किया था। ब्राह्मण किसी को भी पढ़ना, लिखना और पूजा पाठ करने नहीं देते थे और शासक वर्ग भी ब्राह्मणों का ही साथ देते आ रहे थे, गुरु जी ने ब्राह्मणों की खिली उड़ाने के लिए धोती, तिलक लगा ऐसा शंख बजाया कि सारी जनता के होश उड़ गए, जिस से ब्राह्मणों की थोथी पूजा का गुबारा फट गया। इसीलिए कहा जा सकता है, कि गुरु रविदास जी महाराज एक क्रांतिकारी संत हुए हैं। क्रांतिकारी समाजवादी नेता :---- गुरु रविदास जी महाराज ने कहा:---- ऐसा चाहूँ राज मैं, जहां मिले सभन को अन्न। छोट बड़ सभ सम वसै, तां रविदास रहै प्रसन्न।। जिस देश में एक वर्ग भूखा नंगा रखा जाता था, कोई किसी को मालिक अधिकार नहीं थे, ब्राह्मण के मुँह से निकला फरमान ही कानून होता था, उसी देश में कोई उपरोक्त शब्द कहे तो आसानी से समझा जा सकता है कि कोई सिर पर कफन बांध कर घर से निकला है और दुखियों, पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान करने के लिए ब्राह्मणों और शासकों को उतेजित कर रहा है। गुरु जी ने समाजवाद की चिंगारी फेंक कर पूरी तरह से साबित कर दिया था, कि वे वहुजन समाज की गुलामी को खत्म करने वाले, क्रांतिकारी नेता हुए हैं। निडर क्रांतिकारी योद्धा :--- झूठी कथाओं को लिखने ब्राह्मणों ने अपने अस्तित्व के लिए गुरु रविदास जी महाराज को वहुत बड़ा खतरा समझ लिया, इसीलिए उन्होंने चिंतन किया कि यदि गुरु रविदास इसी तरह जनता को गुमराह करते गए, इसी तरह जनता में चेतना पैदा करते गए तो एक दिन ऐसा आ जाएगा कि हमारा ऐसा हाल और दुर्गति होगी कि भीख तक नसीब नहीं होगी इसलिए इन का मुँह बन्द करना जरूरी है, जिस के लिए इन लोगों ने राजा पीपा को उकसाया और भड़काया। पूजा पाठ ब्राह्मणों का अधिकार:--- ब्राह्मणों ने झूठे आरोप लगाते हुए एक पर्चा लिख कर, राजा पीपा को दिया और कहा महाराज! गुरु रविदास हमारी पूजा पाठ को छीन रहा है, वह सुवह उठ कर धोती, तिलक लगा कर शंख बजाता है, लोगों को उपदेश देता है, जब कि यह अधिकार हमारा है, इसीलिए उन्हें इस कानून का उल्लंघन के लिए दण्ड दो। राजा पीपा बुद्धिमान राजा था। ब्राह्मणों की फितरत को बड़ी आसानी से समझ गया मगर सामाजिक विद्रोह के भय से उसने ब्राह्मणों के पर्चे को ले लिया और अपने संदेशवाहक को आदेश किया, कि गुरु रविदास जी को राजा के सामने पेश होने का आदेश दिया जाए। गुरु रविदास जी की राजा पीपा के दरबार में पेशी:---- राजा का संदेशवाहक तुरन्त गुरु रविदास जी महाराज को राजा पीपा का फरमान जारी करने के लिए चला गया और जाते ही कहा कि कल दरबार में पेश हो जाओ। गुरु रविदास जी महाराज दूसरे दिन दरबार में पहुँच गए। राजा पीपा की कचहरी चल रही थी और उस में गुरु रविदास जी खड़े हो गए। महाराजा पीपा ने, गुरु रविदास जी को पूछा कि आप कानून का उल्लंघन कर रहे हो, आप ब्राह्मणों के अधिकार क्षेत्र में घुस कर पूजा पाठ करने की अनाधिकार चेष्टा क्यों कर रहे हो? गुरु रविदास जी महाराज ने राजा पीपा को कहा, महाराज! हम कोई कुचेष्टा नहीं कर रहे हैं, हम समूची कायनात के मालिक की बन्दना करते हैं, हम किसी का कुछ नहीं लेते। ब्राह्मणों के साथ हमारी धार्मिक ज्ञान वाद-विवाद प्रतियोगिता करवाई जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके, जो इस ज्ञान प्रतियोगिता में जीत जाएगा उस को हारने वाला पक्ष सुनहरी पालकी में बैठा कर के सारे काशी शहर के चारों ओर घुमाने की सजा भोगेगा। ये तय कर लिया जाए कि ये शोभा यात्रा अवश्य निकालनी पड़ेगी। गुरु जी के इस फरमान से ब्राह्मणों के किले में जोरदार आग भड़क गई मगर मरता क्या नहीं करता। गुरु रविदास जी महाराज और ब्राह्मणों के बीच धार्मिक वाद विवाद करवाया गया, जिस में ब्राह्मण बुरी तरह से पराजित हुए और अंत में गुरु जी को पालकी में बैठा कर के सारे शहर में उन की शोभायात्रा निकाली पड़ी, जिस से लज्जित होकर के ब्राह्मण और उग्र रूप धारण करते गए। सभी गुरु रविदास जी की ज्ञान गंगा डूब गए, उन के सामने ब्राह्मणों की एक नहीं चली। गुरु रविदास जी महाराज ने ब्राह्मणों को ज्ञान की ज्योति जला कर के एक अच्छा इंसान बनाने का प्रयास किया मगर ब्राह्मण नहीं सुधरे। पराजित ब्राह्मणों ने गुरु जी की शक्ति का लाभ उठाया:--- ब्राह्मणों ने राजा पीपा के दरबार में पराजित हो कर गुरु रविदास जी महाराज की परम शक्ति का लाभ उठाने के लिए एक विचित्र कथा घड़ी हुई है, जिस में इन लोगों ने लिख डाला है, कि राजा पीपा ने ब्राह्मणों और गुरु रविदास जी महाराज को गंगा में अपने-अपने देवताओं को तराने का फरमान जारी किया था, जो तर्कसंगत कथा नहीं है, क्योंकि पत्थर कभी नहीं तैर सकते हैं मगर इस कथा की रचना कर के ब्राह्मणों ने अपने मनुवादी लोगों को संदेश दिया कि गंगा माता है, जिस ने गुरु रविदास जी के पत्थर भी तार दिए थे। यहां भी ब्राह्मणों ने गुरु रविदास जी की धार्मिक शक्ति का लाभ उठाया और प्रमाणित किया कि उन के पत्थरों में अध्यात्मिक शक्ति होती है, परंतु भारत के आदिवासी मूलनिवासियों को ऐसी कथाओं के ऊपर कोई विश्वास नहीं करना चाहिए। गुरु रविदास जी महाराज एक निडर समाज सुधारक और क्रांतिकारी राजनेता हुए हैं। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष, विश्व आदधर्म मंडल। हिमाचल प्रदेश।

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