चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा।। भाग 15।।

।।चँवरवंश का अंतिम वीर योद्धा ।।भाग 15।।                      गुरुओं के गुरु रविदास जी महाराज केवल साधु संत, फकीर और अवतार ही नहीं थे, वे सशक्त क्रांतिकारी वीर और निडर योद्धा हुए हैं, उन की रचनाओं में यह देखा जा सकता है, कि गुरु जी  सामाजिक परिवर्तन के साथ साथ धर्म को भी स्थापित करने के लिए संगत को आबाह्न करते थे, जिस के लिए वे मर मिटने के लिए भी संगत को प्रेरित किया करते थे। गुरु महाराज फरमाते हैं कि धर्म की रक्षा के लिए के लिए यदि जिंद- जान भी चली जाए तो कुर्बान कर देनी चाहिए! वे फरमाते हैं, कि संसार में प्राणी बार-बार नहीं आता है, इसलिए इस जन्म में अच्छे कार्य कर के लाभ उठा लेना चाहिए। मनुष्य को सम्बोधित करते हुए गुरु जी फरमाते हैं कि तेरे कई हम उम्र मर चुके हैं और वे कभी वापस नहीं आ सके हैं, जिन लोगों ने धर्म को बचाने के लिए प्राणों की आहुति दी है, वे सभी शहीद कहलाए हैं और अमर हो गए हैं, जब कि जो लोग केवल खाना खा कर के सोते ही रहते हैं, उन का धरती के ऊपर कोई नामोनिशान नहीं रहा है, इसलिए हे मानव! तू अपना जीना-मरना एक समान कर ले अर्थात जीते जी मर कर के अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखवा कर ही अमृत्व को प्राप्त कर। गुरु रविदास जी महाराज संगत को समझाते हुए फरमाते हैं, कि जो लोग धर्म की रक्षार्थ सीने के ऊपर शब्द रूपी गोली नहीं मारते हैं, वे सभी संसार में धर्मभीरू और कायर कहलाते हैं। गुरु रविदास जी महाराज के शब्दों से स्पष्ट होता है कि वे धर्म के सात्विक नियमों के लिए किसी से कोई समझौता न करने की अपील करते हैं और आदि पुरुष के बनाए हुए मानवीय सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए अपने प्राणों को बलिदान करने के लिए आह्वान करते हैं।                     ।।शब्द पीलो।। मर जा धर्म दे कारने जिंद जाँदी ताँ जाण दे। बार बार ना आणा भव कहां जाई तेरे हाण दे।। धर्म दी खातिर पाई शहीदी सो दरगाह मध ना हाण दे।। मरना जीवणा इक कर जावण जवाल लोध ना माण दे।। रविदास सोई कायर कहावण शब्द गोली तन ना ताण दे।। गुरु रविदास जी महाराज वीर, बहादुर, शूरवीर की पहचान बताते हुए फरमाते हैं, कि शूरवीर अर्थात बहादुर वही समझना चाहिए, जो समर भूमि में निडर होकर के दुश्मन की सेना के साथ युद्ध करते हैं। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि जो रणभूमि से भाग जाता है, वह शूरवीर नहीं होता है। शूरवीर वही होता है, जो खुद भी शहीद हो जाए और दुश्मन को भी मार दे मगर वह कभी भी वह रणभूमि को नहीं छोड़ता है। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि जो व्यक्ति धर्म की रक्षा के लिए चौकन्ना हो कर के दुश्मन के सिर काटता है, वही सचमुच में असली शूरवीर होता है। शूरवीर अपना कर्म करते समय टुकड़े टुकड़े हो जाता है। दुश्मन को कत्ल करते हुए स्वयं भी शहीद हो कर कभी भी मन में दुख महसूस नहीं करते हैं। गुरु जी फरमाते हैं कि ऐसे व्यक्ति को ही अच्छे लोग *शूरवीर* कहते आए हैं, ऐसा व्यक्ति सभी को सूरमा लगता है। जो व्यक्ति युद्ध करते करते दुश्मन का सिर काट कर अपने अत्याचारों का बदला लेता है, उस का उसे कोई दोष नहीं लगता है।                  ।। शब्द।। शूरवीर सोई जाणिऐ जो लड़हूं दल माहे। भन रविदास जो भाग गिआ सो तो सूरा नाहे।१। आप मरे तउ मार लऐ छाडे कबहूं ना खेत। भन रविदास काटे कर रहै सुचेत।२। सूरा तिल तिल कट हो जाए निज मरे मन करे ना शोक। सुन रविदास सोई शूरवीर हैं भले कहेंगे सभ लोक।३। निज मूऐ तउ मुकत है दल काटे तां भी मोख। सुन रविदास सो सूरमा लागे काहू ना दोख।४। गुरु रविदास जी की इस रचना से अनुभव होता है कि वे स्वयं भी शूरवीर थे और लोगों को भी शूरवीर बनने का उपदेश देते थे क्योंकि यदि धर्म की रक्षा होगी तभी मानवता की रक्षा हो सकती है और सभी मनुष्य सुखी रह सकते हैं अन्यथा धरती के ऊपर अराजकता फैल जाएगी। मनुष्य को मनुष्य का दुश्मन बन कर दिन-रात आपस में ही लड़ाई झगड़े के कारण एक दूसरे का सिर काटता हुआ जीवन बिताएगा मगर यदि धर्म के नियमों के अनुसार अपना जीवन बिताए तो खुद भी सुखी रहते हैं और दूसरों को भी सुखी रहने देते हैं। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष, विश्व आद मंडल। हिमाचल प्रदेश।

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