चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा।। भाग 13।।
।।चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा भाग।।13।।
जब गुरु रविदास महाराज ने, बादशाह सिकन्दर लोधी को अपने क्रांतिकारी प्रवचन से पत्थर से मोम बना दिया, हैवान से एक अच्छा इंसान बना दिया, तब वह समझा कि ये चमार नहीं है अपितु कोई तारनहार करतार का साक्षात अवतार ही है जिस के समक्ष कोई भी पीर, पैगम्बर शून्य मात्र ही हैं। बादशाह सिकन्दर लोधी सोच रहा था कि, जिस बादशाह के सामने अपराधी थर थर काँप उठते थे, जिस के सामने लोगों की हवाईयाँ उड़ जाती थी, जिस के मुँह से निकली सजा केवल तलवार का बार ही हुआ करती है, वह आज मूक, बधिर और लाचार हो कर अजेय शक्ति के सामने अपराधी के रूप में खड़ा है। लोधी अपनी पराजय स्वीकार करने पर दया की भीख मांगता हुआ गुरु जी से फरियाद करता हुआ कहता है।
बादशाह सिकन्दर की फरियाद:---- पराजित बादशाह सिकन्दर लोधी, गुरु रविदास महाराज के चरण कमलों पर गिर गया और रहम की दात मांगता हुआ कहता है कि हे मेरे पीर! मुझे बख्श लो, आप बख्शनहार सतगुरु हो। आप चौदह तबकों के शहंशाह नजर आ रहे हो, आप ने तो अपना नाम ही रविदास चमार रख लिया है। हे मेरे गुरु महाराज जी! मैं गरीब, कंगला गँवार हूँ, मुझे अपने हाथों से आवेहयात (अमृत जल)
पिला कर पवित्र कर दो। मुझे अपने चरणों को धोने दो, उसी अमृत जल को मुझे पिला दो या जो आप का ढंग है या जिस तरीके को आप ने अपनाया हुआ है, उस से मुझे अमृत जल पिला दो।
।। शाह सिकन्दर।।
।। शब्द।।
डिगे पातशाह कदमा दे आ ऊपर मैंनूं बख्शदे बख्शनहार गुरुआ।१।
चौदाँ तबक दा दिसदा शाहिनशाह तूं नाम रख रविदास चमार गुरुआ।२।
दे आबेहयात पला सानूं मैं कंगला गरीब गुआर गुरुआ।३।
चरण धोइ के चाहे पला सानूं जिवें रीती तेरा अखतिआर गुरुआ।४।
गुरु रविदास जी महाराज के शब्द रूपी बाणों से बादशाह सिकंदर लोधी बुरी तरह टूट कर बिखर चुका था, तब गुरु जी ने अनुभव किया कि अब बादशाह पूरी तरह मेरे अधीन हो गया है अर्थात सिकंदर लोदी ने अपनी पराजय स्वीकार कर के बिल्कुल दीन हीन हो गया है, उस समय उन्होंने आंखें बंद कर के गुरु रविदास जी महाराज के पास इल्तजा की, कि हे मेरे पीर! मुझे अमृत जल पिला दो। गुरु रविदास जी महाराज ने आँखें बंद कर के आदि पुरुष के पास अरदास की, कि हे अपरम्पार निरंकार! आप आबेह्यात तैयार कर दो ताकि मैं यहाँ सभी को अमृत बाँट सकूँ। गुरु महाराज द्वारा अरदास करते ही वहाँ स्वत: ही एक कुन (एक छोटा सा पानी भरने का टैंक जिस में चर्मकार इंजीनियर चमड़े को टांग कर पक्का रंग चढ़ाते हैं और उस चमड़े के कोट, जैकटें, बैल्टें, जूते बनते हैं) में अमृत जल तैयार हो गया। वहाँ उपस्थित लाखों मुसलमानों ने एक एक चुली भर आवेहयात बाँट कर पी लिया। जब गुरु रविदास जी दाता बन गए, तब लाखों हिंदू, मुसलमानों ने, उन को गुरु अपना लिया। सभी सज्जन कह रहे थे, धन्य हैं गुरु रविदास जी महाराज! सकल संसार में कोई भी आप से श्रेष्ठ पीर, पैगम्बर, गुरु और औलिया नहीं हुआ है।
जदों देखिआ राजा अधीन होया शकल कुंन दी अमृत तिआर होया।२।
कई लखां दी तादाद इस्लाम वाले। चुली चुली बाँट अकार होया।२।
लखां हिंदू मुसलम बादशाह जो मंन लिआ गुरु दातार होया।३।
करन शिफ्तां धनं धनं गुरुआ तेरे जिहा ना कोई संसार होया।४।
गुरु रविदास जी महाराज ने, कभी भी किसी को दुखी नहीं देखा, जो भी दुखी उन की शरण में आता था, उन सभी का कल्याण किया करते थे। किसी भी अधम, नीच, पापी और अपराधी को अपने हाथों से दण्ड नहीं दिया, जब कि जिस किसी ने उन के साथ अत्याचार, अन्याय और अपमान करने का प्रयास किया, वह या तो सुधर गया या स्वयं ही अपने दुष्कर्मों के कारण मारा गया, ऐसे हुए हैं गुरुओं के *गुरु* रविदास जी महाराज।
राम सिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल।
हिमाचल प्रदेश।
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