चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट।। भाग 06।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट।। भाग 06।। महात्म बुध का जन्म 563 ईसवी पूर्व इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय कुल के राजा शुद्दोधन के घर, तत्कालीन विशाल भारत के नेपाल स्थित लुंबिनी गांव में हुआ था। इन की माता का नाम महामाया था जो कोलिए वंश से संबंध रखती थी, वह वच्चे को जन्म देने के सात दिन बाद मर गई थी। वच्चे का नाम सिद्धार्थ रखा गया था, जिस का पालन पोषण उस की सगी मौसी महारानी महाप्रजावती (गौतमी) ने किया था शादी:---- सोलह वर्ष की आयु में सिद्धार्थ की शादी यशोधरा से हुई थी, जिस से राहुल नामक बेटा हुआ था। सिद्धार्थ शब्द का अर्थ होता है *वह बालक जो सिद्धि प्राप्त करने के लिए जन्मा हो*। वैराग्य:---सिद्धार्थ सांसारिक दुखों को देख कर के अपना राजपाठ, पत्नी और बेटे को त्याग कर के जंगलों की ओर चला गया था और अपने गुरु अलार कलाम से शिक्षा ग्रहण कर के 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा के दिन पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानास्थ हो गए थे। उस ने बोधगया में निरंजना नदी के तट पर कठोर, तपस्या करने के बाद सुजाता नामक लड़की के हाथों से खीर खा कर अपनी साधना को समाप्त किया था। उपदेश देना:---- लूंबनी में पहला अध्यात्मिक उपदेश दिया गया, उस के बाद सारनाथ में पांच बौद्ध भिक्षुओं को उपदेश दे कर अपना धार्मिक अभियान शुरू किया था, उन्होंने कहा था कि हे भिक्षुओ! *बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय*।जिस को साहिब कांशी राम जी ने पुन: जिंदा किया मगर उस की चेली और चेलों ने फिर इस उपदेश को ब्राह्मणों के पास बेच दिया। हिंदू धर्म से पहले धर्म:---- हिंदू इतिहासकार लिखते हैं कि हिंदू धर्म से पहले सनातन (पुराना) वर्णाश्रम धर्म था, वे इस का अर्थ बताते हैं, कि इस की उत्पत्ति मानव की उत्पत्ति से पहले हुई थी, जब कि वर्णाश्रम ब्राह्मण जाति ने हीं पैदा किया हुआ है, इसलिए ये कथन निराधार और असत्य है। भारतवर्ष में केवल आदधर्म ही था क्योंकि गुरु रविदास जी महाराज ने भी कहा है--- आद से प्रगट भयो जाको ना कोउ अंत। आदधरम रविदास का जाने बिरला संत।। बौद्ध धर्म की स्थापना:--- कहा गया है कि बौद्ध धर्म की स्थापना गौतम बुद्ध ने की हुई है, मगर ये सत्य प्रतीत नहीं होता क्योंकि सभी धर्म उन के अनुयायियों ने ही अवतारों के बाद शुरू किये हुए हैं। बौद्ध धर्म की स्थापना भी ब्राह्मणों की साजिश का ही हिस्सा ज्ञात होता है। हिंदू समाज वर्ण व्यवस्था पर टिका हुआ है, जब कि बौद्ध धर्म वर्ण व्यवस्था में विश्वास नहीं करता है। बौद्ध धर्म ने समानता के आधार पर समाज का निर्माण किया है। जहां ब्राह्मण और शूद्र में कोई भेदभाव नहीं है। बौद्ध धर्म हिंदुओं के होम, यज्ञ बलिदान तथा रीति-रिवाजों को कोई स्थान नहीं देता है। बौद्ध धर्म मांस खाने को भी उचित नहीं मानता है, क्योंकि इस से हिंसा, मारकाट को बढ़ावा मिलता है। बौद्ध धर्म के लोग दूसरे किसी धर्म से नफरत नहीं करते हैं और ना ही दूसरे धर्मों के सिद्धांतों का भी खंडन नहीं करते हैं। यह धर्म जाति पाती, कर्मकांड, पाखंड, हिंसा और अनाचार का विरोध करता है। इस धर्म में कुछ बुद्धिमान ब्राह्मण भी शामिल हो गए थे, उस समय लाखों बुद्धिमान ब्राह्मण बौद्ध धर्म के साथ सहमत हो गए थे और इस धर्म के विचारों को प्रेम भी करने लग पड़े थे। बौद्ध धर्म का विभाजन:---- छ्ली ब्राह्मणों को उदारवादी ब्राह्मणों का बौद्ध धर्म से प्रेम करना अच्छा नहीं लगा और हिंदू धर्म के लिए खतरा अनुभव होने लगा। सिद्धार्थ के पिता सुद्दोधन सनातन धर्म के अनुयायी थे मगर उन के पुत्र ने बौद्ध धर्म की नींव डाल दी थी, बौद्ध धर्म को भी मूलनिवासी अपना धर्म समझ कर बौद्ध बनने लग पड़े जिस के कारण इस धर्म को भी बर्बाद करने की योजना बनाई गई। चँवर वंश के आदिधर्म को खत्म कराना:--- जब सिद्धार्थ के पिता सनातन धर्म उर्फ प्राचीन धर्म अर्थात आदधर्म के अनुयायी थे और सारे विश्व में आद धर्म चलता आ रहा था, तब फिर बौद्ध धर्म का अवतार क्यों किया गया? यह चिंतन का विषय है। भारतवर्ष में यूरेशियन लोगों ने आकर के अतीत को मिटाने का ही काम शुरू किया था इसीलिए जब महात्मा बुध ने बौद्ध धर्म की नींव रख दी तब ब्राह्मणों ने भी बौद्ध धर्म को उभारने में सहयोग दिया ताकि आदधर्म की एकता को छिन्न-भिन्न किया जाए। बौद्ध धर्म की स्थापना में मनुवादी हाथ:--- बौद्ध धर्म की स्थापना के पीछे केवल ब्राह्मणों का ही हाथ था, जिस का वर्तमान उदाहरण रविदासिया मत है, 11/12 जून 1926 को गद्दरी बाबा बाबू मंगू राम मुगोवालिया द्वारा आद धर्म को जिंदा करने के बाद भारत का मनुवाद हिल गया था, जिस को मिटाने के लिए बाबू मंगू राम जी द्वारा स्थापित आदि धर्म को खत्म करने के लिए उन के आद धर्म मंडल के विधायकों को खरीद कर कांग्रेस पार्टी ने अपने सांसद और विधायक बना लिया मगर साठ साल के अंतराल के बाद जब मैंने आदधर्म को पुनः जिंदा करने के लिए देश-विदेश, गाँव गाँव में प्रचार प्रसार करना शुरू किया और श्री अमरजीत गुरु, जीत राम, बीएस माधोबलवीरा, हरबंश हीरा, रीना जी, निर्मल महे सागरपुरिया कांशी रेडियो इंग्लेंड, आदि धर्म गुरु आर एन आदिवंशी दिल्ली, तरसेम सहोता, मदन लाल बैंस, राम मूर्ति, संत सतविंदर हीरा खुराल गढ़ ने आदधर्म को आगे बढ़ाने के लिए काम करना शुरू किया तो फिर मनुवाद की जड़ें हिल गई, जिस के कारण मनुवादियों ने रविदासिया धर्म को उभारने के लिए पंजाब में स्थित बल्लां डेरे के लोगों को प्रयोग किया और आदधर्म से चमार जाति को दूर करने का षड्यंत्र रचा गया। बौद्ध धर्म चँवर वंश से ही जन्मा था:--- यदि ब्राह्मणों की कूटनीति का अध्ययन किया जाए तो बौद्ध धर्म की स्थापना के पीछे भी ब्राह्मणों का ही हाथ था क्योंकि सिद्धार्थ का संबंध कोली वंश से था, कोली वंश भी चमार जाति का ही नाम है, कुछ स्थानों पर चर्म कर्म करने वालों की जाति का नाम चमार है और कुछ स्थानों पर कोली, चंबार, महाड़, मोची, जाटव, ढोर आदि नन्हें, इसलिए बौद्ध धर्म भी चमार वंश का ही एक हिस्सा है, जिस के झंडे तले लोग भारतवर्ष के मूलनिवासी लोग एकजुट हो गए थे मगर बौद्ध धर्म को भी बर्बाद करने के लिए इन्होंने फिर साजिश रची और ब्राह्मण लोग बौद्ध धर्म में शामिल हो गए और शामिल हो कर के इन के दो नेता आपस में लड़े ताकि नूराकुश्ती शुरू कर के मूलनिवासी लोगों मूर्ख बना कर फूट डाली जाए दो बड़े ब्राह्मण नेता लड़े, जिस के कारण इन्होंने बौद्ध धर्म के भी दो टुकड़े कर दिए *महायान और हीनयान*! महायान का अर्थ है, बड़े लोगों की उच्च जातियों के लिए बौद्ध धर्म, हीनयान का तात्पर्य हीन अर्थात अछूत, शूद्रों के लिए हीन धर्म। दो खंड करने के बाद भी शूद्रों की एकता बनी रही, उस के बाद फिर ब्राह्मणों ने नूराकुश्ती की और उस के भी आगे दो और खंड कर दिए वज्रयान और संखयान, इस प्रकार बौद्ध धर्म के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए और इस धर्म की भी एकता को खत्म कर दिया गया। इकीसबीं शताब्दी में आदि धर्म:---- 21सवीं शताब्दी में हम ने आदधर्म को फिर सारे संसार में फैलाने का काम शुरू किया तब फिर ब्राह्मणों ने एक नया रविदासिया धर्म स्थापित करने का षड्यंत्र रचा हुआ है, जिस के बारे में भारत के आदिवासी, मूलनिवासियों को समझना चाहिए और गुरु रविदास जी महाराज द्वारा स्थापित आदधर्म में शामिल हो कर प्चासी प्रतिशत मूलनिवासियों की एकता स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए ताकि भारत में आदिवासी, मूलनिवासियों का शासन स्थापित किया जा सके। जब तक भारत के 85% मूलनिवासी आद धर्म के झंडे के नीचे इकट्ठे नहीं होंगे, तब तक राजसत्ता भी प्राप्त करना मुश्किल ही होगी। ब्राह्मणों ने राजसत्ता से दूर रखने के लिए ही चँवरवंश उर्फ चमार जाति को बांटने के लिए रविदासिया धर्म की स्थापना करवाई है, जिस के लिए ये लोग करोड़ों रुपए खर्च कर चुके हैं और धन दौलत बांट बाँट कर के क्रांतिकारी मार्शल लड़ाका कौम चमार जाति को टुकड़े टुकड़े करते जा रहे हैं, इसलिए 85% मूल निवासियों के लिए एक ही ऐसा धर्म है जो एकता के सूत्र में बांध सकता है, इसलिए सभी मूलनिवासियों को तत्काल सभी धर्मों को त्याग कर के आदधर्म के झंडे तले इकट्ठे हो जाना चाहिए, तभी साहिब कांशी राम जी का अधूरा मिशन पूरा होगा और मूलनिवासी सुशासन स्थापित हो सकेगा। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष, विश्व आदधर्म मंडल। हिमाचल प्रदेश।

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