चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट।। भाग, 04।।
चँवर वंश के सम्राट देव तुल्य।।भाग 04।।
विश्व के साहित्य में अगर नजर डाली जाए, तो किसी भी देश में काल विभाजन नहीं किया गया है। केवल भारतवर्ष में ही आदि काल से लेकर वर्तमान काल तक समय को चार काल खंडों में बांट कर, भारत के वास्तविक मूलनिवासी लोगों का इतिहास मिटाने का षड्यंत्र रचा गया था। ऐसा कर के सत्य के सन्मार्ग पर चलने वाली मूलनिवासी जनता को महामूर्ख बनाया गया है। सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग। यदि सारे यूरोप और एशिया में भी इस काल विभाजन के बारे में इतिहास मिलता, तो हम इन चार काल खंडों को भी मान सकते थे मगर इन चारों काल खंडों का जन्म केवल भारत में ही हुआ है।
भ्रामक काल विभाजन:--- मनुवादियों द्वारा द्वापर का एक अवतार राम बताया गया है, त्रेता युग का भी एक ही अवतार कृष्ण को बताया गया है और कलियुग का भी एक ही होने वाला, भावी अवतार *कल्कि* होगा, मगर मच्छ (मत्स्य), कूर्म (कच्छ,कछुआ) वराह (सुअर), हयग्रीव, नरसिंह को सतियुग का भी अवतार नही लिखा गया है, इन्हें केवल मात्र पहले अवतार लिखा गया है, जो भारतवर्ष की मूलनिवासी जनता को भ्रमित करने के लिए लिखा हुआ है। कुछ वर्षों से इन अतिमानवों के सिरों पर विष्णु के सिर भी दिखाए जा रहे हैं, जिन से अनुभव हो रहा है, कि यही आद पुरुष (निरंकार) को ब्राह्मा, जुगाद, नील, कैल, चंडूर, मंडल और कैलास ही हैं, जिन का अपमान करने के लिए इन के सिरों की अदला बदली की गई है। ये लोग सम्राट चानों जी महाराज का सिर परिवर्तन नही कर सके, क्यों कि चानो महाराज इन को मिट्टी में मिला सकते थे, मगर काल्पनिक कृष्ण की खोज कर के उन के साथ मल्लयुद्ध की कथा घड़ कर, कृष्ण द्वारा चानो जी महाराज की गोडी लगवा कर कम शक्तिमान सिद्ध किया है, जो तर्क की दृष्टि से कतई ठीक नहीं है और मनुवादी जलन और इर्षा का ही द्योतक है। यदि अंतिम युगों में एक एक ही अवतार हुआ है और वे भी आदमी के सिर वाले हुए हैं तो फिर हम कैसे मान सकते हैं, कि पहले अवतारों के सिर प्रमाणिक हैं।
सतयुग की प्रमाणिकता:--- आदिकाल से ही विश्व में चँवर वंश के पूर्वजों का राज चल रहा था, जिस की राजधानी मक्का मदीना था जिस का जिक्र सिद्धचानो जी महाराज के मंत्र में मिलता है, इन देव तुल्य सम्राटों का शासन सत्य पर आधारित था, इसीलिए इस युग को सतियुग कहा गया है। इस युग के बाद ही अजीव नरसिंह अवतार हुआ था, जिस से धर्मात्मा हिर्णयक्षीपु सम्राट और उन की देवतुल्य वीरांगना महादेवी राजकुमारी का कतल करवाया था। उस ने नर भक्षी नरसिंह के नाम पर युग का नाम नहीं रखा गया। राजपूतों के कातिल परसू राम और बुद्ध को भी अवतार माना गया है मगर उन के नाम पर किसी युग का वर्णन नही मिलता मगर राम को त्रेता और कृष्ण यादव को दुआपर युग का प्रतिनिधि अवतार घोषित किया गया है। बिना जन्म लिए ही कलियुग का कल्कि अवतार प्रतिनिधि होगा, जो कोरी कल्पना के अतितिक्त कुछ नहीं लगता।
मनुवादी साहित्यकारों का काल्पनिक बाङ्मय:--- मनुवादी साहित्यकारों ने तो अपने लिखे काल्पनिक साहित्य का भी परिवर्तन कर दिया था और त्रेता युग को द्वापर युग से पहले ला कर खड़ा कर दिया है, अगर तर्क से सोचा जाए तो क्या कभी तीन नंबर, दूसरे स्थान पर प्रकार पर आ सकता था? मगर इस से स्पष्ट होता है कि मंदबुद्धि यूरेशिया से आए लेखक भूल गए थे, कि जिन काल्पनिक कथाओं को पहले लिखना चाहिए था, उन को बाद में लिखा गया और जिन को बाद में लिखना चाहिए था, उन को पहले लिख दिया था। इसी प्रकार इन लोगों ने अवतारों को भी इन युगों में दर्शाया गया था, जिनको भी बदल कर के बाद में हुए अवतार को पहले और पहले को दूसरे नंबर पर सत्य सिद्ध करने के लिए इन्होंने कालों को प्रमाणिक करने के लिए महाऋषि का सहारा लिया है जो अदला बदली सत्य की कसौटी पर उचित नजर नहीं आती है और ये काल विभाजन, तत्कालीन काल विभाजन करने वालों की महामूर्खता को दर्शाता है।
रामसिंह आदिवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदधर्म मंडल।
हिमाचल प्रदेश।
Comments
Post a Comment