चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा bhaag10।।
।।चमार वंश का अंतिम योद्धा ।।भाग10।।
बादशाह सिकंदर लोदी अत्यन्त क्रूर, अत्याचारी, निर्दयी और पापी बादशाह था। उस ने अत्यन्त घोर अपराधियों, कालितों को दण्ड देने के लिए दिल्ली स्थित तुगलकाबाद के वियाबान जंगल के बीच कारागार बनाई हुई थी। इसी कारागार में गुरु रविदास जी महाराज को बन्द करवाया गया था। जेठ महीने की भीष्ण गर्मी में यह कारागार अग्नि की भट्ठी बनी हुई थी, जिस में किसी भी प्राणी को एक क्षण के लिए भी समय बिताना और रहना मुश्किल था।
।। दोहा।।
मुशक बंध रविदास को दीना जेल पुंचाई।
काल कोठड़ी बंद कर कुल्फ दिए लगाई।।१।। बादशाह सिकंदर लोदी ने, गुरु रविदास महाराज के हाथों में हथकड़ियां और पैरों में बेड़ियां डलवा कर तुग़लकाबाद काल कोठरी में बंद करवा कर उस को ताला लगवा दिया।
।।दोहा।।
बिच कैद दे कुझ कु दिन निकल जाई अरमान। दीन इस्लाम कबूल तब ऐह भूलन होर गिआन।।१।।
वेखूँ तेरा शहर भी बेगम जिस का नाम।
लख असमान उपरे कीता जो बसराम।।२।।
बादशाह सिकंदर लोदी ने सोचा था, कि कुछ एक दिन तपती हुई कारागार में रहने के बाद गुरु रविदास जी महाराज को सारे अरमान और ज्ञान भूल जाएंगे। इस्लाम धर्म को स्वीकार करने के लिए विवश हो जाएंगे। बादशाह सिकंदर लोदी मन ही मन में सोच रहा था, कि ये डाढा पीर जिस बेगमपुरा शहर का नाम बार-बार लेता है, जिस के बारे में कहता फिरता है, कि आदि पुरुष लाखों आसमान से ऊपर विश्राम करता है, उस अनूठे बेगमपुरा शहर के दर्शन मैं भी कर लेता हूँ। वास्तव में इस पंक्ति में बादशाह सिकन्दर लोधी व्यंग्य करता हुआ गुरु रविदास महाराज के बारे में अपने हाली मुहालियों से कह रहा था, कि देखते हैं, ये फकीर कितने कु दिन नारकीय जेल में रहता है? मगर मूर्ख बादशाह ये नहीं जानता था, कि जो मुझ जैसे क्रूर व्यक्ति को अकेला ही ललकार रहा है, वह कोई छोटी मोटी हस्ती नहीं हो सकती है।
।। शब्द।।
बिच जेल दे गुरु अडोल बैठे ना हिरख ना सोग वियोग कोई।१।
आदि देवते फूल गल पावने नूं आध व्याध उपाध ना रोग कोई।२।
नरकां सुरगाँ दी जिवें ना चाह हुंदी सखत जेल दा नहीं सोग कोई।३।
त्रै बंद नूं लाईके बैठ जाँदे बिना मुख कमांवदे योग कोई।४।
गुरु रविदास भक्ति में लीन:---गुरु रविदास जी महाराज तपती जेल के भीतर चुपचाप स्थिरावस्था में बैठ कर *सोहम* जाप करने में व्यस्त थे। उन्हें मन में कोई भी किसी प्रकार का हर्ष-द्वेष, शोक-अशोक, संयोग-वियोग नहीं था। इस मुद्रा को देख कर आदि देवते, आद, जुगाद, नील, कैल, चंडूर, मंडल, कैलास, त्रिकाल दर्शी मातेश्वरी लोना देवी जी उर्फ कामाख्या देवी और बाबा सिद्धचानो ने, गुरु जी के गले में हार डाल कर उन के ऊपर पुष्प वर्षा की, जिस के कारण उन्हें कोई भी दैहिक, दैविक और भौतिक संताप सता नहीं रहे थे। गुरु रविदास जी महाराज को कोई किसी प्रकार के स्वर्ग-नर्क की चिंता नहीं थी और ना ही कठोर कारागार के दुखों का कोई भी भय नहीं था। वे तो ध्यानस्थ मुद्रा में त्रिबन्ध लगा कर अजपाजाप करते हुए योग करते जा रहे थे।
राम सिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल।
हिमाचल प्रदेश।
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