चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा भाग ।।11।।

।।चंवर वंश का अंतिम वीर योद्धा।।भाग 11।। बादशाह सिकन्दर लोधी ने, सतगुरु रविदास जी महाराज को दिल्ली स्थित तुगलकाबाद जेल में अकारण ही बन्द कर दिया था, जिस में बैठ कर वे आदपुरुष का ध्यान लगा कर के अजपाजाप कर रहे थे और अंतर्ध्यान हो कर के *सोहम* का अजपाजाप करते हुए इस तरीके से बैठे हुए थे कि मानो आदि पुरुष की नाम रूपी मदिरा की सुराही पी कर ध्यान में मगन हो गए हों। ऐसा प्रतीत हो रहा था, कि वे अपने आप को भूल गए हों अर्थात आत्मविस्मृत हो गए हों। उस समय उन की अंतरात्मा में केवल अटूट अनहद ध्वनि ही सुनाई दे रही थी, जिस में उन्होंने सुनाई दिया कि वह कौन ऐसा व्यक्ति है, जो आप को अपने दीन धर्म में ला सकता है, जो भगत मुझ में समा गया है, मुझ से उस का प्रेम मछली और पानी की तरह अटूट है। सिकन्दर लोधी का जेल का निरीक्षण:--- जब गुरु रविदास जी महाराज को जेल में आठ दिन बीत गए तो बादशाह सिकंदर लोधी ने सोचा, कि चलो तुगलकाबाद में जा कर गुरु रविदास जी महाराज की दुर्दशा को देख आते हैं। बादशाह अपने दरबारियों के साथ जब जेल के बाहर पहुंचा और दरवाजे से झांक कर अंदर देखने लगा तो उस के पांवों तले मिट्टी खिसक गई। उस ने देखा कि लाखों तुर्क, मुसलमान गुरु रविदास जी महाराज के चारों ओर कलमा पढ़ रहे हैं और करोड़ों ब्राह्मण भी शांत हो कर के *सोहम सोहम* जाप कर रहे हैं। जेल में प्रत्येक मुसलमान और ब्राह्मण के बीच गुरु रविदास जी खड़े हो कर *कलमा* और *सोहम* जपते हुए नजर आ रहे थे। बादशाह और उन के साथ उमड़ी हुई भीड़ यह चमत्कारी दृश्य देख ही रहे थे, कि देखते देखते जेल के ताले टूट गए। इस घटना को देख कर के चारों तरफ से लोग इस अनूठे खेल को देखने के लिए दौड़ पड़े। बादशाह सिकंदर लोदी इस सारे खेल को देख कर, गुरु रविदास जी महाराज पास अर्ज करता हुआ गले में पल्लू डाल कर कहता है,"महाराज, आप जीत गए हैं और मैं हार गया हूं, मैं आप सच्ची सरकार का मुरीद बन गया हूं"।                       ।।शब्द।। लग गई समाधी हरि नाम की। पी बैठे सुराही हरि जाम की। भुल गई एं सुध गाँम की। बजदी मुरली धुन सुवहा साम की।। आकाशवाणी होई झीनी बीन में। कवन लिआ सके मजहब दीन में।। भगत ना बिच ईन में। मेरे में प्रेम जिवें जल मीन में। लखां मुसलम कलमा पढ़न दिसदे। कोटी ब्राह्मण सोहम जपदे दिसदे। बिच रविदास खड़न दिसदे। इक इक नाल पढ़न दिसदे। टुट गए ताले लगे जेल नूं।१। राऊ रंक वेखन इस खेल नूं। चल आए सभी जेल नूं, सभी जेल नूं।२। वेख के ते आए हैं अनूप खेल नूं। शाह सिकन्दर है अरज गुजारदा। गल पलू पाके है पुकारदा।३। जितिआ तैं ते मैं हारदा, मैं जी हारदा। बण गिआ मुरीद सच्ची सरकार दा।४।                  ।। शाह सिकन्दर।। दरुव अर्थात पवित्र हरे घास की तिलियों को मुँह में डाल कर हतास बादशाह सिकंदर लोधी अपने गले से पल्लू उतार कर, गुरु रविदास महाराज के गले में डाल कर उन के सामने गिर कर इल्तजा करता है, कि हे मेरी सच्ची सरकार रविदास जी महाराज! मैं भूल भूल गया हूं, जिस के कारण मैं ने आप को जेल शब्द का प्रयोग कर वहुत बड़ी भारी गलती की है, जिस के लिए मैं क्षमा याचना करता हूं और आप से प्रार्थना करता हूं, कि मुझे बख्श लो, यदि कोई फरजंद (बेटा) गलती से अपने माता-पिता के बालों को हाथ मार कर के खींचने का अपराध करता है, तो माता-पिता उस बेटे के अपराध को माफ कर देते हैं और भूल जाते हैं, ( बेटा माता-पिता के की गोद में बैठ कर अपना हाथ पिता की दाढ़ी को मार देता है और माता के सिर के बालों को भी खींच देता है मगर माता पिता अपने बच्चे को माफ कर देते हैं) इसी प्रकार मैं भी आप भी भूल करने वाला अबोध फर्जंद हूं, इसलिए मुझे भी माफ कर दो, माफ कर दो! गुरु रविदास जी महाराज जहां क्रांतिकारी बादशाह हुए हैं, वहां वे एक अच्छे समाज सुधारक भी हुए हैं, हमेशा उन का लक्ष्य ही बिगड़े हुए लोगों को सन्मार्ग पर ला कर के सुधारना था, इसी कड़ी में उन्होंने महाठग सेठ करोड़ीमल को सुधारने के लिए उस का सारे का सारा धन दौलत गरीब जनता को बांटने के लिए विवश कर दिया था, इसी तरह जगन्नाथपुरी के बिगड़े हुए ब्राह्मणों को सुधारने के लिए वहां खुद जा कर के जगन्नाथ के मंदिर की मूर्ति के दूसरे छोर पर खड़े हो कर आरती कर के जगन्नाथ की मूर्ति को अपने सामने बुला लिया था, जिस से अहँकारी तिलकधारियों का थोथा घमंड चूर चूर कर दिया था।                      ।। शब्द।। दंदी घाह फ़ड़ के गल पाई पलु शाह सिकन्दर अरज गुजारदा ऐ।। मैं भूलिआ बख्श लै पीर मेरे जो मैं जेल दे लफ़ज पुकारदा ऐ।। करे कोई अपराध फरजंद भुल के मादर पिदर बख्शने हारदाऐ।। बिच गोद दे बैठ फरजंद बालक किसे बकत दस्त दाड़ी मारदाऐ।। अजेय शक्ति गुरु रविदास जी:---- धर्म के ठेकेदारों ने मंसूर और ईशू मसीह को सूली के तख्ते पर चढ़ा दिया था मगर वे अपने प्राणों की रक्षा नहीं कर सके थे, परन्तु गुरु रविदास जी महाराज को निरंकुश, निर्दयी बादशाह सिकन्दर लोधी सूली पर तो क्या ही चढ़ा सका था, अपितु खुद ही उन का मुरीद बन कर गुलाम बन गया था। गुरु रविदास जी ने विश्व की सर्वोच्च शक्ति हो कर भी, कभी भी अपने आप को गुरु, भगत, पीर, पैगम्बर और अवतार नहीं कहा था। भारत के तिलकधारी मठाधीश तो संगत की कमाई खा खा कर पलते हैं, मगर जनता को स्वर्ग नर्क का हौआ दिखा कर हराम की कमाई खाते हुए मोक्ष का रास्ता दिखाते हैं, जब कि खुद परजीवी बन कर अपने लिए ही नर्क का रास्ता बनाते हैं। राम सिंह आदिवंशी। अध्यक्ष, विश्व आदि धर्म मंडल। हिमाचल प्रदेश।                                                         

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