चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग सात।।
चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी ।।भाग 7।।
गुरु रविदास आदधर्म के संरक्षक:-- गुरु रविदास जी महाराज आदधर्म के संरक्षक, पोषक और प्रचारक रहे हैं।उन्होंने आदधर्म के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है-----
आद से प्रगट भयो जाको ना कोउ अंत।
आदधर्म गुरु रविदास का जाने बिरला संत।।
गुरुजी के इन शब्दों से स्पष्ट हो जाता है, कि गुरु रविदास जी महाराज किसी भी हिंदू, मुस्लिम, ईसाई धर्म को नहीं मानते थे क्योंकि हिंदू, मुस्लिम और ईसाई धर्मों के नियम सिद्धांत और कथाएं एक जैसी हैं, जिस प्रकार बाईबल में धरती के जीवों का विनाश करने की बात कही गई है, ठीक वैसी ही कथा मनुस्मृति और जयशंकर प्रसाद कृत कामायनी में लिखी गई हैं, इसलिए यह स्पष्ट होता है कि आर्यों ने बाईबल से कथाओं की कॉपी की हुई है और उन को अपनी मनुस्मृति में लिख लिया है। जब गुरु दास जी महाराज कहते हैं हिंदू अंधा, मुस्लिम काणा। तो फिर गुरु जी हिंदू धर्म की प्रशंसा कैसे कर सकते थे? वे वेदों के बारे में अपने विचार क्यों व्यक्त करते हैं? पुराणों के बारे में वे कहीं भी कोई जिक्र नहीं करते हैं। इस के बावजूद भी हिंदुओं ने मंघड़ंत कथा लिखी हुई है, जिस के अनुसार हिंदू लिखते और कहते हैं वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान।
फिर मैं क्यों छोडूं इसे, पढ़ लूँ झूठ कुरान।
वेद धर्म छोडूं नहीं, कोशिश करो हजार।
तिल तिल काटो चाहे, गोदो अंग हजार।
भाषा शैली:----गुरु रविदास जी की भाषा शैली के साथ इन चार पंक्तियों की भाषा शैली का मिलान करें, तो ये चारों पंक्तियाँ गुरु रविदास जी महाराज की भाषा शैली से तनिक मेल नहीं खाती हैं क्योंकि उन की भाषा में खड़ीबोली हिंदी का प्रयोग नहीं मिलता मगर अबधि, ब्रज और गुरुमुखी के पुट देखे जा सकते हैं मगर ये चारों पंक्तियां ही उन से मेल नहीं खाती हैं।
देवनागरी:---- उपरोक्त चार पंक्तियों को देवनागरी लिपि में लिखा गया है और उन के बीच एक शब्द भी ऐसा नहीं है, जो अवधि या अन्य किसी प्रादेशिक बोली का लिया गया हो।
वेदों का खंडन:------ गुरु रविदास जी महाराज के भावों को व्यक्त करते हुए किसी ने लिखा है कि------
जीवन चारी दिवस का मेला रे,
बामण झूठा वेद भी झूठा, झूठा ब्रह्म अकेला रे।
मंदिर भीतर मूर्ति बैठी, पूजति बाहर चला रे।
लड्डू भोग चढ़ावति जनता, मूर्ति ढिग केला रे।
पत्थर मूर्ति कछु ना खाती, खाते बामण चेला रे।
जनता लुटती बामन सारे, प्रभुजी देती ना धेला रे।
विश्लेषण:---- गुरु रविदास जी महाराज के देहावसान के बाद उन की संपूर्ण वाणी को आर्यों ने नष्ट करके जला दिया था ताकि गुरु रविदास जी महाराज की क्रांतिकारी वाणी और उन का क्रांतिकारी सामाजिक, धार्मिक परिवर्तन का आंदोलन दफन किया जा सके और इस में आर्य लोग सफल भी हुए हैं, उन्होंने गुरु जी के संपूर्ण वांग्मय (वाणी) को जला दिया था मगर उन की लिखी हुई रचनाओं को उन की संगत ने कंठस्थ कर लिया था मगर जिस भाषा शैली में गुरु रविदास जी महाराज लिखते थे, उस भाषा शैली में वे नहीं लिख सके, इसी कारण उन लोगों को जो कुछ याद था, वह उन्होंने अपनी अपनी शैली में लिख कर भावी पीढ़ियों के लिए संजोकर रख दिया है। इसलिए उपरोक्त शब्द में गुरु रविदास जी के भावों का चित्रण करते हुए किसी ने लिखा है कि यह जीवन चार दिन का ही मेला है, गुरु महाराज फरमाते हैं कि बामण हमेशा झूठ बोलने वाला है और उस की लिखी हुई कथाएं वेदों में संग्रहित हैं, वे भी सब झूठ हैं। उन का ब्रह्म भी अकेला ही है और वह भी झूठा है। मंदिर के बीच मूर्तियां बैठी हुई हैं, जिन को उनके चेले पूजते हैं, जनता आ कर के लड्डुओं के भोग चढ़ाती हैं और कई प्रकार के फल फूल और केला आदि अर्पित करते हैं मगर पत्थर की मूर्ति कुछ नहीं खाती है, खाने वाला केवल ब्राह्मण और उसका शिष्य होता है। ये लोग सरेआम जनता को लूटते हैं और प्रभु को एक धेला भी अर्पित नहीं करते हैं अर्थात मूर्तियां कुछ खाती तो नहीं है अपितु उनके नाम पर ये निठल्ले लोग हाथ पैर हिलाए बिना ही मौज मस्ती से खाते हैं।
स्पष्टिकरण:----इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि गुरु रविदास जी महाराज वेद, पुराणों की ना तो प्रशंसा करते हैं और ना ही समर्थन। बल्कि कड़े शब्दों में आलोचना जरूर करते हैं फिर गुरु रविदास जी के लिए यह कहना सरासर गलत है कि वे वेदों और हिंदू धर्म को अनुपम मानते थे, उन के ज्ञान को अनुपम मानते थे। यह भी कहना बिल्कुल गलत है कि वे इस को छोड़ना नहीं चाहते थे और वे यह भी नहीं कहते थे कि कुरान झूठी है। गुरु जी कभी नहीं लिख सकते थे, कि हिंदू धर्म और वेदों को नहीं छोडूंगा, चाहे मेरा अंग अंग काट दो, उस के हजारों टुकड़े कर दो, यह बिल्कुल मनुवादियों के लिखी हुई छल प्रपंच से भरी हुई पंक्तियां हैं, जिन पर रविदास जी के सेवकों और अनुयायियों को तर्क के आधार पर विश्लेषण करके विश्वास करना चाहिए। यदि ब्राह्मणों की लिखी हुई इस प्रकार की अनर्गल बातों पर हम विश्वास करने लगे तो गुरु जी की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक परिवर्तन की महाक्रांति रुक जाएगी, जिस प्रकार हम पांच हजार वर्षों से ब्राह्मणों के गुलाम हैं, इसी तरह भविष्य में भी ये गुलामी बनी रहेगी और सामाजिक परिवर्तन नहीं होगा और ना ही भारत के मूलनिवासियों का दोबारा शासन कभी आ सकेगा, इसलिए भारत के सभी राजनेताओं, धार्मिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक मंच पर इकट्ठा हो कर के ब्राह्मणों के लिखे हुए कथन का विश्लेषण करना होगा और उस के नकारात्मक भावों विचारों को खंडित कर के जनता के लिए मार्गदर्शन करना चाहिए, ताकि 85% मूलनिवासी एक मंच पर इकट्ठा हो सकें और धार्मिक, राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में ले सकें अन्यथा जिस प्रकार आज मूलनिवासी भूमिहीन रखे हुए हैं, बेरोजगार रखे हुए हैं, मनुवादी इसी तरह रखते रहेंगे और मूलनिवासी घुट घुट कर जिंदगी जीते रहेंगे। मूलनिवासी मनुवादियों के मजदूर बन कर के ही पशुओं की तरह मरते रहेंगे।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आद धर्म मंडल। हिमाचल प्रदेश।
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