चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग 11।।
चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग 11।।
गुरु रविदास और कृष्ण का तुलनात्मक चिंतन :----त्रेता युग के कृष्ण को काल्पनिक अवतार घोषित किया गया है, उस के बारे मे अनेकों कथाएँ घड़ी गई हैं जो तर्क की कसौटी पर कसने के बाद हास्यस्पद ही लगती है, उन की लीलाओं का मांसल और लौकिक वर्णन किया गया, जिस के कारण कृष्ण यादव जनता में अच्छी हैसियत नहीं रखता है मगर फिर भी हिंदू लेखकों, कवियों ने उन की कथाओं में लौकिक श्रृंगारिक चित्रण बड़े ही विशद ढंग से किया है, जिस से युवा अपना मांसिक संतुलन खो कर नारी जाति को भी राधा मान कर कटाक्ष करते आए हैं, जब कि उस का मुख आभा मंडल गुरु रविदास जी के हजारवें भाग के समान नहीं था। कृष्ण ने कोई भी ऐसा भलाई का कार्य नहीं किया है, जिस से मानव जगत का कल्याण हो, केवल विलासिता और खून खराबे के अतिरिक्त महाभारत में कुछ नजर नहीं आता है मगर गुरु रविदास जी महाराज ने अपने जीवन काल में कहीं भी हास्य रस और शृंगार रस का रसावादन नहीं किया।
मनुवाद का मुकाबला:----उन्होंने मनुवाद का मुकाबला करते हुए अपना सारा जीवन मुशीबतों, दुखों में उलझ कर हैवानों को सीधे मार्ग पर डालने के लिए ही गुजार दिया। वे जन्म से ही जन कल्याण करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। दाई भानी के स्पर्श मात्र से ही उस का अंधापन दूर करने के कारण वे अवतार पुरुष नजर आने लग पड़े थे जब कि कृष्ण अपने सात भाई वाहनों को जन्म से पूर्व ही निगल चुका था, जन्म से पहले भी अनिष्ट ही किया था और जन्म के बाद भी ब्राह्मणों के झांसे में फंस कर भाईयों को भाईयों से लड़ा लड़ा कर मार दिया और अंततः खुद भी उसी तरह मौत के मुँह गया था मगर गुरु रविदास जी भारतीय लोगों में समरसता पैदा करते करते परेशान ही रहे। बालक के रूप में ही ब्राह्मणों को आपस में छुआछूत को मिटा कर सद्भाभावना से जीने का रास्ता बताया जिस के कारण उन का पहला जन्म का उत्सव स्वामी ईशर दास जी महाराज के शब्दों में निम्नलिखित ढंग से मनाया गया था------
।। दोहा।।
सुंदर खिलौने कपड़ों दा प्रसंग दिया सुणावे।
संतोष दा भनोआ मितू सुंदर खिलौने बनावे।
रतनी मितु झग्गा दुपट्टा खिलौना लिआए।
श्री गुरु रविदास दे भुआ ते फुफड़ सदाए।
भागलपुर पिंड ते बाबा कालू दास जी माजरे आमण।
झगगा चुन्नी कंगण खिलौना रविदास दे अंग लामण।
बालक रविदास जी की पंजाप की रश्म:----स्वामी ईश्वरदास जी महाराज ने बालक रविदास जी के तत्कालीन रीति-रिवाजों के अनुसार बच्चे के जन्म के समय पर जो उत्सव मनाया जाता था, उस का वर्णन अत्यंत मौलिक और वास्तविक ढंग से किया है। भारत के मूलनिवासी मनुवादियों की गुलामी की बेड़ियों से जकड़े हुए थे, जिस के कारण वे अपने मन की खुशियों को जिस रूप से प्रकट करना चाहते थे, कर नहीं पाते थे मगर फिर भी जितने उन के संसाधन थे, उन के अनुसार ही वे अपने मन की खुशियों को आपस में बांटते आए हैं। गुलाम मूलनिवासियों के रीति रिवाजों का वर्णन करते हुए स्वामी जी फरमाते हैं, कि हम बालक रविदास जी के जन्म के उत्सव का वृतांत सुना रहे हैं। गुरु रविदास जी के पिता संतोष दास जी थे और उन की बहन का नाम रतनी और बहनोंईया जी का नाम मितु था। भारतवर्ष के मूलनिवासियों के रीति-रिवाजों में बहनों और बुआओं को सब से अधिक खुशी होती है। जब उन के मायके में किसी बच्चे का जन्म या विवाह होता है, तो उन की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता है और बढ़ चढ़ कर बच्चों को खिलौने और कपड़े ला कर के अपनी प्रसन्नता व्यक्त करती हैं, ठीक इसी तरह ही बालक रविदास जी के बुआ और फूफड़ ने भी बालक रविदास जी के लिए अपने हाथ से बनाए हुए खिलौने और कपड़े ला कर के अपनी प्रसन्नता का इजहार किया था। वे भी बालक रविदास को कुर्ता, पजामा, दुपट्टा और खिलौने लाए थे। उस दिन बाबा कालू दास जी भी भागलपुर स्थित गांव माजरा में गए हुए थे, वे भी बालक के जन्म के शुभ अवसर पर घर आ गए थे और आ कर के अपने हाथों से बालक रविदास जी को कपड़े पहनाए थे।
जीवन दास और रैदास:--- पिता संतोष दास जी के घर जन्में बालक रविदास जी महाराज के बारे में सुन कर के चारों तरफ रिश्तेदार भी जशन मना रहे थे। बालक रविदास जी के मामा के बड़े लड़के जीवनदास और बुआ के लड़के रैदास बालक रविदास के पास ही रहने लग पड़े थे। वे दोनों ही भाई बालक रविदास के सुरक्षा प्रहरी के रूप में रहने लगे थे। दोनों ही भाई रविदास जी के साथ ही उठते बैठते और खेलते थे। स्वामी ईशर दास जी महाराज उन के बारे में लिखते हुए फरमाते हैं, कि-------
जेहड़े श्री गुरु रविदास हैं, पुत्र मामे दा जीवंन दास है। रिहा सदा गुरां दे तां इह पास है। सेवक गुरां दा सदाया एह जी खास है। दुआ भुआ दा पुत रैदास है। रहे रात दिन गुरां दे ऐह दास है। पास रहे दोनों भाई। नाले सेवक सदाई। मैंहमा गुरां दी कराई। धन धन रविदास नूं सुनाई।
बुआ के बेटे रैदास को ही रविदास लिखा गया:---छ: सौ साल पहले लिखने पढ़ने का काम केवल ब्राह्मण ही किया करते थे, दूसरे तीनों वर्णो को लिखने का अधिकार नहीं था। मनुस्मृति के अनुसार राजपूत केवल सुरक्षा गार्ड हुआ करते थे और वैश्य केवल तराजू का प्रयोग कर के सामान बेचने का काम करते थे। शूद्र केवल तीनों वर्णों की नौकरी-चाकरी और सेवा करते थे जिस के कारण केवल ब्राह्मण ही लिखने, पढ़ने का अधिकार रखते थे, इसी कारण इन लोगों ने शूद्रों के परिवार में जन्मे महापुरुषों को मनमाने ढंग से इतिहास में दर्ज किया है और उन के जीवन को संदेहास्पद बनाने के लिए कई प्रकार के निम्न से निम्न स्तर के हथकंडे अपनाए हैं, इसी प्रकार गुरु रविदास जी महाराज के नाम को *रैदास* के रूप में प्रचारित और प्रसारित किया है, जब कि *रैदास* गुरु रविदास जी महाराज के फूफा और बुआ के सपुत्र साधु, संत और फकीर ही थे। उन के मामा के लड़के जीवन दास बालक रविदास के अनुचर और सेवक हुए हैं। वे दिन रात बालक रविदास की सुरक्षा में लगे रहते थे, मगर इन दोनों ही संत महापुरुषों का ब्राह्मणों ने इतिहास में कोई वर्णन नहीं किया है।
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