चँवर वंश के देव तुल्य बेताज सम्राट गुरु रविदास जी।।

चँवर वंश के देव तुल्य बेताज सम्राट गुरु रविदास जी।। जब मनुस्मृति के काले कानूनों ने भारतवर्ष के मूलनिवासियों का जीना दुश्वार कर दिया था और मुस्लिम बादशाहों ने तलवार की नोक पर इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करने के लिए कत्लेआम शुरू किया हुआ था, उस समय राजपूत राजाओं ने भी अपनी बहू बेटियों को मुस्लिम बादशाहों को नजराना कर के अपनी जान बचा ली थी और जनता को परमपिता परमेश्वर के सहारे छोड़ दिया था, उसी समय भारतवासियों की रक्षार्थ गुरु रविदास जी महाराज का प्रकाश विक्रमी संवत 1433 में हुआ था, इन के पिता जी का नाम संतोष दास और माता का नाम कलसां देवी था। इन के दादा कालूराम और दादी लखपति जी हुए हैं। इन का पाणिग्रहण सुभागण देवी से हुआ था। इन के सुपुत्र संत दास और सुपुत्री संत कौर हुए हैं। शिक्षा:------ गुरु रविदास जी महाराज जन्म से ही तीव्र बुद्धि बालक हुए हैं, ब्राह्मणों ने उन को देवनागरी लिपि का प्रयोग करने नहीं दिया था, जिस के कारण उन्होंने स्वयं ही गुरुमुखी लिपि तैयार की थी और इसी लिपि में ही लिखना शुरू किया था। जब कोई ऐसा मेधावी विद्यार्थी हो तो उस को कोई भी शिक्षा देने में सक्षम नहीं होता है। गुरु जी की आलौकिक बुद्धि और विद्वता का लाभ उठाने के लिए ब्राह्मणों ने उन के गुरु का नाम ब्राह्मण शारदानंद लिखा हुआ है, जब कि गुरु रविदास जी महाराज ने 4 वर्ष की आयु में धोती, तिलक लगा कर, शंख बजा कर ब्राह्मणों का उपहास उड़ाना शुरू कर दिया था, जिस से सारे ब्राह्मण समाज में उथल-पुथल मच गई थी। जब कोई बालक इस ढंग से ब्राह्मण समाज को अपने पांडित्य की चुनौती दे कर उनके पाखण्डों, आडम्बरों की हवा निकाल कर रख दे, उस दैवी बालक को कौन ब्राह्मण शिक्षा दे सकता था, यह विचारणीय विषय है। आप इस झूठ का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं, इसलिए शारदानंद ब्राह्मण की कथा तर्कसंगत नहीं है। अभी-अभी सन् 1900 से 1963 तक स्वामी ईश्वर दास जी महाराज हुए हैं, जिन्होंने कभी भी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा था और ना ही किसी अध्यापक से अक्षर ज्ञान लिया था, केवल उन्होंने अपनी उंगली से धरती के ऊपर उड़ा, ऐडा, ईड़ी, ससा, हहा आदि गुरुमुखी लिपि के वर्णों को लिखने का अभ्यास किया था और स्वत: ही अक्षर ज्ञान प्राप्त किया था। इसी भाषा ज्ञान के द्वारा उन्होंने 1382 पृष्ठों का पवित्र ग्रंथ *गुरु आदि प्रकाश* और *अघंम वाणी* धार्मिक पुस्तक लिखी हुई है, जिस से अनुमान लगाया जा सकता है, कि गुरु रविदास महाराज ने भी किसी भी ब्राह्मण से शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। ब्राह्मणों द्वारा लिखी गई शारदानंद की कहानी झूठी और कल्पित है। यह भी तर्कपूर्ण लगता है, कि गुरु रविदास जी महाराज को कोई भी ब्राह्मण किसी भी कीमत पर शिक्षित नहीं कर सकता था, क्यों कि उन्होंने ब्राह्मणों के सारे छल प्रपंचों, कपटों को उजागर कर के उन का जीना दूभर कर दिया था, वैसे भी उस समय राजपूतों, वानियों और शूद्रों को ही शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नहीं था, तो फिर अछूतों को तो ये लोग स्पर्श तक नहीं करते थे, इसलिए गुरु रविदास जी महाराज की शिक्षा घर पर ही हुई थी। ब्राह्मणों की फितरत :---- ब्राह्मण जाति की फितरत रही है, कि यदि कोई भी मूलनिवासी, अछूत महापुरुष उन्नति की ऊंचाइयों को छू जाता है, तो उस की प्रसिद्धि का लाभ उठाने के लिए, उस के साथ अपना संबंध जोड़ ही लेता है जिस प्रकार स्वतन्त्रता से पूर्व सन 1946 में जब कोई भी ब्राह्मण, राजपूत और बानिया स्वतन्त्र भारत के लिए संविधान लिखने में असमर्थ था, तो फिर चँवर वंश उर्फ चमार जाति के डॉक्टर भीमराव अंबेडकर से संविधान लिखने का काम लिया गया और बाद में यह भी कहा गया कि डॉ भीमराव अंबेडकर आधुनिक मनु हुए हैं, इस से स्पष्ट होता है की मनुवादी लोग अपने स्वार्थ के लिए कहीं भी, किसी भी व्यक्ति के पास झुक जाते हैं और उस को अपना लेते हैं, इसलिए गुरु रविदास जी महाराज की विद्वता को देख कर के इन लोगों ने गुरु रविदास जी का गुरु, शारदानंद ब्राह्मण को लिख डाला है, क्योंकि गुरु जी के समय तक कोई भी मूलनिवासी पढ़ा लिखा नहीं था और जो कुछ लिखा गया है, वह सारे का सारा ब्राह्मणों ने लिखा हुआ है, जिस पर किसी को भी विश्वास नहीं करना चाहिए और भविष्य में किसी को भी गुरु रविदास जी का अध्यापक या गुरु शारदानंद को नहीं लिखना चाहिए। सिकन्दर लोधी का प्रतिशोध:---- सिकंदर लोदी ने भारत में 1489 से 1517 तक शासन किया था, मगर इस समय तक विश्व में कोई भी चमार जाति नहीं थी और ना ही किसी शब्दकोष में ये शब्द था मगर जब ब्राह्मणों ने बादशाह सिकंदर लोधी को गुरु रविदास जी महाराज के खिलाफ उकसाया और भड़काया, कि वे नित सुवह उठ कर पूजा पाठ करने के बाद, शंख बजाता है, जो कि ब्राह्मणों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर के ब्राह्मणों का उपहास भी उड़ाता है, जनता को ब्राह्मणों के खिलाफ भड़काता है, तब बादशाह सिकंदर लोदी ने गुरु रविदास जी महाराज को अपने दिल्ली दरबार में बुला कर मुसलमान बनने का षड्यंत्र रचाया था। बादशाह सिकंदर लोदी ने गुरु रविदास जी महाराज को बड़े अदब से अपने सिंहासन पर बैठा कर के खूब सेवा की और गुरु जी से आग्रह किया था कि आप विश्व के सब से बड़े गुरु, पीर, पैगम्बर, औलिया हो, इसलिए आप इस्लाम धर्म को स्वीकार कर के इस्लाम धर्म के पीर, पैगंबर बन जाइए। गुरु रविदास जी महाराज ने बादशाह सिकंदर लोदी के वचनों को ठुकरा दिया और कहां *हिंदू अंधा मुस्लिम काणा* जिस को सुन कर के बादशाह सिकंदर लोधी उत्तेजित हो गया, मगर विवश लोधी की गुरु रविदास जी महाराज के सामने एक भी नहीं चल सकी और पुन: गुरु जी की प्रशंसा करता हुआ कहता है कि महाराज आप के अतिरिक्त विश्व में की भी पीर, पैगम्बर नहीं है, इसलिए आप इस वैश्विक धर्म के पैगम्बर बनने के लिए हमारी इल्तजा स्वीकार कर लो। गुरु जी को लालच देते हुए लोधी कहता है, हे गुरु रविदास जी महाराज! हम आप को पंजाब का सूबेदार बना देते हैं और आप को जितनी हूरें, परियां चाहिएं, वे भी हम आप को दे देते हैं मगर इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लो। गुरु रविदास जी महाराज ने सिकन्दर लोधी को कहा, बादशाह हम फकीर हैं! हमें तेरे धनदौलत, राजपाठ और सुंदरियों से क्या लेना देना, ये सब कुछ हमारे लिए मिट्टी समान हैं। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि----- रविदास उपजि इक नूर ते बामन मुल्ला शेख। सभ का करता एक सभ कू एक ही पेख।। चमार शब्द की उत्पति:---- गुरुओं के गुरु, गुरु रविदास जी महाराज की जली कटी बातों को सुन कर सिकन्दर तंदूर की तरह लाल पीला गया और परेशान हो कर गुस्से में आ कर, उस ने गुरु रविदास जी महाराज को कहा, *तू रहा चमार का चमार ही*! ये शब्द उस के मुँह से इसीलिए निकला, क्योंकि सोने का काम करने वाले को सुनार कहते थे, लोहे का काम करने वाले को लोहार कहते थे। चर्मकर्म और कपड़े का उद्योग चलाने वाले बाबा कालू दास जी के व्यवसाय को ध्यान में रख कर, सिकन्दर ने गुरु रविदास जी महाराज को चमार कहा। उसी दिन से भारतवर्ष में यशस्वी चँवर वंश के राजपूतों को चमार जाति के नाम से पुकारा जाने लगा। गुरु रविदास जी महाराज ने चमार शब्द को बड़े गर्व, स्वाभिमान से  स्वीकार कर लिया और अपनी रचनाओं में बड़े स्वाभिमान से लिखा है, *कह रविदास खलास चमारा* ऐसा कह कर गुरु रविदास जी महाराज ने बादशाह सिकंदर लोदी की खिल्ली तो उड़ाई ही है मगर ब्राह्मणों को भी उन की औकात दिखा दी है। रविदास जी की बेबाकी का लाभ:--- ब्राह्मणों ने गुरु जी की क्रांतिकारी कार्यवाही का भी हिंदू धर्म की रक्षा के लिए लाभ उठाने के लिए फरजी दोहा लिखा डाला है, जो गुरु जी की भाषा शैली से तनिक भी मेल नहीं खाता ---- वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान। फिर मैं क्यों छोडूं इसे पढ़ लूं झट कुरान।। वेद धर्म छोडूं नहीं कोशिश करो हजार। तिल तिल काटो चाहे गोदो अंग कटार।। यह शब्द पूरी तरह देवनागरी लिपि के शब्दों की तरह लिखे गए हैं, जबकि ब्राह्मणों ने गुरु जी को देवनागरी लिपि का प्रयोग ही करने नहीं दिया था और विवश हो कर के गुरु जी ने गुरुमुखी लिपि का अविष्कार कर के अपनी वाणी लिखी थी। इन पंक्तियों में गुरु जी की ना तो शैली है और ना ही उनकी अवधि या ब्रज भाषा का पुट है, इसलिए यह दोहा ब्राह्मणों ने अपने धर्म की रक्षार्थ लिख कर गुरु जी को हिंदू साबित करने का प्रयास किया है, जब कि गुरु रविदास जी महाराज आदधर्मी थे और आद धर्म को मानने वाले थे, क्योंकि उन्होंने फरमाया है--- आद से परगट भयो जाकू ना कोउ अंत। आद धरम रविदास का जाने बिरला संत।। गुरु रविदास जी आदधर्म के पैगम्बर:--- उपरोक्त दोहे से पूर्णरूपेण ज्ञात हो जाता है कि गुरु रविदास जी महाराज आदधर्म के अनुयायी हुए हैं। ब्राह्मण जाति में कोई भी उच्च स्तर का वीर, क्रांतिकारी, विचारक आज तक जन्मा ही नहीं है मगर ये लोग चँवर वंश के महापुरुषों के कार्यों का लाभ उठाते आए हैं, जिस के प्रमाण वेदव्यास द्वारा लिखित वेद और पुराण, महार्षि वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण और डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का लिखा हुआ भारत का संविधान हैं। राम सिंह आदवंशी। अध्यक्ष, विश्व आदि धर्म मंडल। हिमाचल प्रदेश।

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