चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग पांच।।
।। चँवर वंश के देवतुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग पांच।।
गुरु रविदास जी जीव हत्या के विरोधी:--- भारत के मूलनिवासी आदर्श देवतुल्य शांतिप्रिय, दयालू, मानवता के पुजारी, बलिदानी, दानवीर, ममता के सागर होते आए हैं। यूरोप और एशिया से आने वाले दुखियों, पीड़ितों के प्रति दयाभाव रखने वाले भोलेभाले तत्कालीन भारतीय सम्राट शिवशंकर ने इन लोगों को भारत में शरण दे कर अपने लिए मुशीबत मोल ले ली थी। दानवीर राजा बलि ने नारी की बात मान कर अपने प्राण देदिए थे। महिसासुर ने मनुवादी नारी के छल में आ कर अपने प्राण दे दिये थे, मगर उन्होंने नारी के ऊपर कभी भी हाथ ना तो उठाया और ना ही कभी जान से मारने का पाप कर्म नहीं किया था, ऐसे हुए हैं हमारे पूर्वज।
रविदास जीव मत मारिए, इक साहिब सब मांहि।
सब जीव मांहि इकहि, आतमा दूसरहू कोउ नाहिं।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे विश्व के मानव! किसी भी जीव की हत्या मत करो। सभी प्राणियों के भीतर एक ही अदृष्य आद पुरुष निवास करता है। संसार में जितने भी प्राणी हैं, उन के भीतर उसी परम पिता परमेश्वर की अनूठी आत्मा होती है। एक ही साहिब अर्थात भगवान की आत्मा सभी जीवों के शरीर में निवास करती है।
दया भाव रिधै नाहिं जउ भखसै पराया मांस।
ते नर नरक मँह जानहि सत भाखै रविदास।।
गुरु रविदास जी महाराज आगे फरमाते हैं, कि मन में दया के भाव होने चाहिए अर्थात मनुष्य को दयालु होना चाहिए। जो लोग दूसरे जीवों का माँस खाते हैं, गुरु रविदास जी उनके बारे में सच बोल रहे हैं, कि वही लोग नर्क में रहते हैं अर्थात वही धरती पर रहते हुए शारीरिक और मानसिक यातनाएं सहन करते हैं।
पूजा पाठ, नमाज से पाप कर्म खत्म नहीं होते :--- रविदास जउ पोषण हेत, गऊ बकरी नितिहिं खाय।
पढ़ई नमाज रात दिन कभूहूँ मिटत ना पाप जाय।।
रविदास जिउ को मारि कर कैसो मिलिहि खुदाय।
पीर पैगंबर औलिया कोउ कस ना कहई समझाय।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि जो लोग दिन रात अपना पेट भरने के लिए निरीह गाय और बकरी का मांस खाते हैं और उसके बाद भी पूजा-पाठ और नवाज पढ़ते हैं, उनके पाप किस प्रकार समाप्त हो सकते हैं? गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि जो लोग दूसरे जीवों का कत्ल करते हैं, उन्हें ईश्वर कैसे मिल सकता है? पीर, पैगंबर और औलिया, ऐसे लोगों को कैसे समझा सकते हैं।
जउ वश राखै इंद्रियां, सुख-दुख समझि समान।
सोउ अमिरत पद पाइगो, कहि रविदास बखान। सच्चा सुख सत धरम माहिं, धन संचय सुख नाहिं।
धन संचय दुख खान है रविदास समझहिं मन माहिं।
इंदरजीत ही सुखी रहते हैं:--- गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि जो लोग अपनी इंद्रियों को वश में रखते हैं अर्थात नियंत्रण में रखते हैं, सुख-दुख को एक समान समझते हैं, वही श्रेष्ठ पद को प्राप्त करते हैं। सच्चा सुख सच्चे धर्म में हीं है। धन इकट्ठा करने से सुख प्राप्त नहीं होता है। धन संग्रह करना दुखों को मुसीबत मोल लेना है। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि हे साध संगत! इन विकारों के बारे में समझो और जान लो।
सति संतोष अरू सदाचार, जहि जीवन का आधार।
रविदास भये नर देवते, जिन तिआगे पंच विकार।
सदाचार ही जीवन का आधार है:-----गुरु रविदास जी महाराज संगत को फरमाते हैं, कि सत्य, संतोष और अच्छा व्यवहार ही जीवन का आधार होता है। वे समझाते हैं, कि जिन जिन लोगों ने पांचों विकारों को त्याग दिया है अर्थात असीम काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार से मुक्ति प्राप्त कर ली है, उन्हीं सत्य के पुजारियों को देवता कहा जाता है, इसलिए मनुष्य को पाप कर्म ना करते हुए, आदर्श जीवन जीने के लिए सदाचार को अपनाना चाहिए अन्यथा मनुष्य और जानवर में कोई अंतर नहीं होता है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदधर्म मंडल।
हिमाचल प्रदेश।
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