चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट।। भाग पांच।।
चमार वंश के देवतुल्य सम्राट!
जब तक भारत में यूरेशियन लोगों का आगमन नहीं हुआ था तब तक तो भारत में सतयुग था मगर ज्यों ही यूरेशिया से यूरेशियन लोग भारत में घुसे तब से ही भारत में राक्षस राज शुरू हो गया था, जिस के प्रमाण परशुराम से मिलना शुरू हो गए थे, क्योंकि परशु राम से पहले सतियुग में किसी के साथ कोई खून खराबा नहीं होता था और भारत में कातिलों और कत्ल का भी कोई नामोनिशान तक नहीं मिलता है। सारे भारतवर्ष में शांति ही शांति नजर आती है। कोई भी किसी के साथ छलकपट अन्याय, अनाचार, अत्याचार, बलात्कार व्याभिचार, बेईमानी, धोखाधड़ी, नहीं करता था। कोई भी जाति पाती, छुआछूत, रंग भेद और आदि धर्म के अतिरिक्त कोई धर्म नहीं था मगर ज्यों ही इन लोगों ने भारतवर्ष में आ कर उन्माद मचाना शुरू किया था, तब से ही भारत कतलगाह बन गई थी जो आज भी मावलिंचिंग आदि के द्वारा जारी है।
परशुराम का उदय:---- महाभारत और विष्णु पुराण में लिखा गया है, कि परशुराम का असली नाम राम था, परंतु भगवान शिव ने उसे अपना फरसा नामक हथियार इस राम को दिया था, जिस के कारण इस का नाम परशुराम पड़ा था, आगे कहा गया है कि महार्षि भृगु के पौत्र वैदिक ऋषि ऋतिक के पुत्र जमदग्नि के पुत्र महाभारत काल के वीर योद्धा द्रोणाचार्य, भीष्म और करण को अस्त्र शस्त्रों की शिक्षा देने वाले गुरु, अस्त्र एवं शास्त्र के धनी ऋषि परसु राम एक ब्राह्मण के रूप में अवतरित हुए थे, लेकिन वे कर्म के हिसाब से क्षत्रिय ही थे। परशुराम का शाब्दिक अर्थ है, *कुल्हाड़ी के साथ राम*। हिंदू परसू राम को विष्णु के अवतारों में से एक मानते हैं। यह महाभारत और पुराणों में दर्ज है, कि परशुराम का जन्म ब्राह्मण ऋषि जमदग्नि और क्षत्रिय वंश की राजकुमारी रेणुका के घर हुआ था।
महाभारत में परशुराम:---- नरसिंह के समय तक जितने भी अवतार हुए हैं, वे सब के सब ही अतिमानव ही हुए हैं, जिन को कोई भी तर्कशील और बुद्धिजीवी अवतार कतई नहीं मान सकता है कि वे अवतार थे, मगर जैसे ही परशुराम का जन्म हुआ, तब से अतिमानव अवतारों का जन्म बन्द हो गया था। सतयुग में कहीं पर भी कोई वर्ण अर्थात ब्राह्मण, राजपूत, वानियाँ और शूद्र दृष्टिगोचर नहीं होता है मगर परशुराम का वंश ही पहला ब्राह्मण परिवार इतिहास में मिलता है, जिस से स्पष्ट होता है कि परशुराम से ब्राह्मणों का भारतवर्ष में प्रचार प्रसार हुआ है और उस ने वही काम किया जो उस के पूर्वज लोगों ने सिंधु घाटी की सभ्यता को नष्ट करने के लिए किया था, क्योंकि कत्लेआम करना और भारत के मूल निवासियों को गुलाम बनाना इन्हीं जालिम लोगों का काम था।
चँवर वंश के राजपुत्र ही राजपूत:----जिन जिन मूलनिवासी राजाओं, महाराजाओं के राज पुत्रों अर्थात राजकुमारों उर्फ वीर राजपूतों ने तथाकथित ब्राह्मणों का विरोध कर के उन के साथ डट कर मुकाबला किया था, उन का ही परशुराम ने अपने कुल्हाड़ी से कत्लेआम किया था, इसलिए परशुराम युग से ही हम मान सकते हैं, कि युरेशियन लोगों को ब्राह्मण पुकारा जाने लगा था।
ब्राह्मणों ने भारत के ऊपर साम, दाम, दंड, भेद नीतियों के द्वारा देव तुल्य चँवरवंशी सम्राटों का कत्लेआम कर के आदर्श चंवर वंश का विनाश करना शुरू किया था, इस के अतिरिक्त जितनी भी परशुराम के बारे में रामायण और पुराणों में कथाएं लिखी गई हैं, वे सभी की सभी निर्मूल, निराधार और असत्य ही हैं, जिन पर आदिवासी मूलनिवासियों को विश्वास नहीं करना चाहिए।
परशुराम मृत्यु मुक्त:--- परशुराम मृत्यु से मुक्त है, वे चिरंजीवी लोगों में से एक है, जिन्हें हमेशा अमर माना गया है, परशुराम को दशावतार से संबंधित भगवान विष्णु के छठे अवतार के रूप में जाना जाता है। भगवान शिव ने परशुराम को फरसा अर्थात कुल्हाड़ा दिया था, जो तर्कसंत नहीं लगता है, यदि मृत्यु मुक्त होता तो आज भी कहीं ना कहीं वह दिखाई अवश्य देता।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आधर्म मंडल।
हिमाचल प्रदेश।
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