चँवर वंश के देव तुल्य बेताज सम्राट गुरु रविदास जी।

चमार वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी ।।भाग दो।। गुरु रविदास जी की वाणी में प्रक्षिप्तांश:--- ज्यों ही गुरु रविदास जी महाराज इस संसार को अलविदा कर के चले गए तब यूरेशियन आर्यों ने गुरु रविदास जी महाराज की वाणी को नष्ट भ्रष्ट कर दिया गया था, जिस के कारण उन की मूल अर्थात पूरी मौलिक वाणी उपलब्ध नहीं होती है, जिस वाणी को गुरु नानक देव जी लिख कर ले आए थे और जो सिखों के पास थी, उस के साथ यूरेशियन आर्य छेड़छाड़ नहीं कर सके थे। सच्चे अर्थों में गुरु जी की वही मौलिक वाणी गुरु ग्रंथ साहब में सुरक्षित अंकित की गई है, उदाहरण के रूप में:-----                  ।राग मल्हार। मिलत पिआरे प्राण नाथु कवन भगति ते।। साध सँगति पाई परम गते।।रहाउ।। मैले कपरे कहां लउ धोवउ।। आवैगी नींद कहां लगु सोवउ।।१।। जोई जोई जोरिउ सोई सोई फाटिउ।। झूठे वनजि उठि ही गईं हाटिउ।।२।। कहु रविदास भइउ जब लेखिउ।। जोई जोई कीनो सोई सोई देखिउ।।३।। शब्द विन्यास में अंतर:--- इस शब्द के वर्ण विन्यास से अनुमान लगाया जा सकता है, कि जो गुरु रविदास जी महाराज के नाम से वाणी तैयार की गई है, क्या वह उपरोक्त शब्द के वर्ण विन्यास से मेल खाती है? या नहीं, इसलिए हिंदू और मुसलमान लेखकों ने हेराफेरी कर के गुरु रविदास जी महाराज के साथ अन्याय किया हुआ है, जिस को समझने की जरूरत है और जिन शब्दों के ऊपर गुरु रविदास जी महाराज के अनुयायियों को विश्वास नहीं होता है, उन शब्दों की सत्संग में व्याख्या नहीं करनी चाहिए। मिश्रित वाणी ही उपलब्ध है:--- अभी-अभी कुछ स्थानों पर भी गुरु रविदास जी महाराज की मौलिक वाणी मिली है, जो गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी के साथ मेल खा रही है मगर बाकी 90% वाणी गुरु जी की मौलिक वाणी के साथ मेल नहीं खाती है, क्योंकि जो वाणी गुरु रविदास जी महाराज के शिष्यों ने कंठस्थ कर ली थी, उस को उन्होंने अपनी भाषा शैली में लिख कर के संजोया हुआ था, जिसे उन्होंने अपनी ही शैली में लिखा हुआ है, इस वाणी के रचयिताओं ने अपनी शैली में गुरु जी के भावों को बांध कर लिखा हुआ है, इसीलिए इस को मिश्रित वाणी कहा जा सकता है। गुरु रविदास जी की वाणी से छेड़छाड़:---_ मनुवादियों ने ऐतिहासिक लिखने का प्रयास खुद तो किया नहीं है मगर जो जो मूलनिवासी महापुरुषों ने लिखा है, उस में ही अपने हित के लिए तोड़ मरोड़ कर के लिख लिया है। इसी तरह इन्होंने गुरु रविदास जी की मौलिक वाणी के साथ छेड़ छाड़ कर लिखा हुआ है जो उन की वाणी से मेल नहीं खाता है। गुरु रविदास जी महाराज के अनुयायियों को ऐसे साहित्य पर तनिक भी विश्वास नहीं करना चाहिए, जिस प्रकार उन के नाम से निम्नलिखित दोहा लिखा गया है------ हर सो हीरा छांड कै करें आन की आस। ते नर दोजक जाएंगे सत भाखै रविदास।। वास्तव में यह दोहा गुरु रविदास जी महाराज द्वारा रचित नहीं है, इस की भाषा, शैली और भाव गुरु जी की भाषा शैली से रंच मात्र भी मेल नहीं खाते हैं और इस दोहे के सभी शब्द खड़ी बोली के ही हैं। गुरु रविदास जी की वाणी का प्रचार प्रसार करने वाले अनाड़ी लोग सत्सङ्ग करने से पहले बड़े गर्व के साथ इसी दोहे का सस्वर उच्चारण शुरू करते हैं मगर वे इस दोहे की वास्तविकता के बारे में तनिक भी चिंतन और विश्लेषण नहीं करते हैं, कि क्या यह दोहा गुरु रविदास जी की मौलिक रचना है, भी ? या नहीं। बादशाह ने बचन उचारा। मत प्यारा इस्लाम हमारा।। खंडन करें उसे रविदासा।। करो प्राण को नासा।। जब तक राम नाम रट लावे। दाना पानी या नहीं पावे।। जब इस्लाम धर्म स्वीकारे। मुख से कलमा उतारे।। पढ़े नमाज जभी चित लाई। दाना पानी तब वह पाई।। उपरोक्त सभी शब्द खड़ी बोली हिंदी में ही लिखे गए शब्द हैं और जो भाव और विचार इस दोहे में व्यक्त किए गए हैं, वे भी सारे के सारे संदेहास्पद हो गए हैं, इसलिए यह दोहा भी गुरु रविदास जी महाराज के मुखारविंद से निकला हुआ नहीं है और इस से स्पष्ट होता है कि हिंदू, सिख और मुसलमानों ने गुरु जी की विचारधारा और भावों को अपने अनुरूप ढाल कर अपने ही शब्दों में लिख कर सभी वर्णों को अपनी बुतप्रस्ती और तेती करोड़ काल्पनिक वहुमुखी देवी-देवताओं के अस्तित्व को सत्य सिद्ध किया हुआ है ताकि सभी लोग यह समझ सकें कि गुरु रविदास जी महाराज ने भी वही लिखा हुआ है, जो मनुवादी चिंतकों ने लिखा हुआ है। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष, विश्व आधार मंडल। हिमाचल प्रदेश।

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