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Showing posts from September, 2020

गुरु रविदास जी का सेठ करोड़ीमल को उपदेश।।

।।गुरु रविदास जी का सेठ करोड़ीमल को उपदेश।। गुरु रविदास जी ने, करोड़पति करोड़ीमल की, कड़ी परीक्षा लेने के बाद जब दर्शन दिए तब, खुशी के आंसू बहाते हुए करोड़ीमल, गुरु जी के चरणकमलों पर गिर कर  कहता है कि, हे मेरे भगवान! मुझे नरक से बचाने वाले, अब मुझे अपनी शरण में ले कर, बख्श लो, मेरी इल्तजा स्वीकार कर लो, मेरे जन्म के फंदनों को काट दो। गुरु रविदास जी सेठ करोड़ीमल को कहते हैं:----                 ।। दोहा गुरु जी।। जागण दा अब पता भया, दृढ़ भरोसा राख। अब करम क्या करत हूँ, श्री रविदासजी भाख। गुरु रविदास जी महाराज करोड़ीमल को कहते हैं कि, करोड़ीमल अब जागने का पता लग गया है, अब अज्ञानता का पर्दा आंखों से हट गया है, अब मन में पक्का विश्वासः उतपन्न कर लो। गुरु रविदास जी ने शाह करोड़ीमल को पूछा, तू क्या काम करता है?                 ।। दोहा लखपति।। अन्न देंवदा जिआं नूँ, ऐह मैं करम कमाई। तुमरे दर्श को लोचदा, हुण दरशन पाई।। गुरु महाराज, जब से आप ने मेरी आंखें खोली हैं, तभी से मैं प्राणियों को अन्न जल दे रहा हूँ, मैं यही कर्म ...

गुरु रविदास जी और करोड़ीमल का पुनर्मिलन।।

।गुरु रविदास जी और करोड़ीमल का पुनर्मिलन। गुरु रविदास जी महाराज के विरह में करोड़ीमल अत्यंत दुखी रहने लगा और सिर मार मार कर, पटक पटक कर विलाप करता रहता था कि, मैं ने आजीवन लोगों को लूटा घसूटा, करोड़ों अरबों की धन दौलत इकठ्ठी की, मगर आज तक मुझे रास्ता दिखाने वाला सच्चा गुरु कोई नहीं मिला है, जब मिला तो पहचाना नहीं। होश आने पर सारा धन गरीबों को दान करने लग पड़ा ताकि किसी दिन गुरु रविदास जी महाराज लंगर खाने के लिए अवश्य आएंगे और यहाँ पंक्ति में अवश्य बैठेंगे, ऐसा चिन्तन करते हुए जब, धनदौलत का सारा खजाना खाली हो गया और केवल अंतिम सँगत की पंक्ति को भोजन बांटा जा रहा था, तब अचानक, गुरु रविदास जी भी अंतिम पंक्ति में आ कर बैठ गए, करोड़ीमल ने जब अंतिम पंक्ति को देखा तो, दौड़ता हुआ गया और गुरु रविदास जी के चरणकमलों पर गिर कर कहता है:----                       ।। शब्द।। हथ जोड़ के खड़ा लखपति किरोड़ीमल खावो भोजन गुरां दी पिआरी सँगते। तुम हैं खावत हम हैं ख़िलावत, हम हैं नौकर भंडारी सँगते। सतगुरु सागर मिल जाई, मैं मछली आयु जाई गुजारी सँगते। आज भीड़ लगी सी ब...

गुरु रविदास जी और सेठ करोड़ीमल का वैराग।।

।।गुरु रविदास जी और सेठ करोड़ीमल का वैराग।। गुरु रविदास जी, अत्याचारियों, मूर्खों, कातिलों, अन्यायियों, पाखंडियों ढोंगियों छलियों, शोषकों का हिरदय परिवर्तन करने के लिए ही, दिन रात प्रयासरत रहे जिसके कारण, उन्हें चाहे कितना भी जलील होना पड़ा, उस की उन्होंने, कभी भी चिंता नहीं की। जब गुरु जी ने, करोड़ीमल के अंतःकरण को झकझोर दिया और झकझोर कर, वहां से तुरन्त आगे चले गए, उस समय की विचित्र मनःस्थिति का चित्रण करते हुए स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 675-676 पर कहते हैं कि:----                        ।। शब्द ।। करोड़ीमल शब्दां नूँ सुण के, खियाल डूंगे सोचन लगड़ा दिल ध्यान कर के। गल धसदी धसदी अंदर धस गई, बैठ गई दिल गिआन कर के। आई अकल जां जागणे वाली शाह नूँ साहिब चले गए बिआन कर के। चढ़े टोलण मिले ना किते सतिगुरु हार फ़ार के बैठे अमान कर के। जब करोड़ीमल, गुरु रविदास जी के शब्दों को सुन कर, गहराई से और ध्यान लगा कर सोचने लगा, गुरु जी की बात उस के अंदर समाती गई और समा ही गई, जिससे उस को गुरु जी के ज्ञान का रंग चढ़ गया, ...

गुरु रवि जी का उपदेश और करोड़ीमल का क्रोध।

।।गुरु रविदास का उपदेश और करोड़ीमल का क्रोध। गुरु रविदास जी महाराज ने, शोषक करोड़ीमल को सुधारने के लिए, तीखे प्रहार किए, दिल को छूने वाले शब्द वाण छोड़े, दिल को चीरने वाले खंजर मारे मगर करोड़ीमल, सुन कर बिगड़ता ही गया और अपनी मूढ़ता, मूर्खता और अहंकार से ग्रस्त हो कर, गुरु रविदास जी के उपदेश को समझ नहीं सका और गुरु जी को कहता है, कि तूँ कौन होता हमें सोने और जागने का उपदेश देने वाला? गुरु जी मूर्खों की बुरी बात का कभी बुरा नहीं मानते थे, वे तो अपनी शब्दों की तीखीं धार वाली खंजर से, अल्सर का ऑपरेशन करते ही जाते थे। गुरु जी ने उसे कहा:----                       ।। दोहा।। जाग करोड़ी जाग तूँ, अब जागण दा वेला जो। वक्त वेला बीत जाऊ हो जाऊ वहुड़ कवेला जो। दुबारा किहा जाग शाह तूँ जाग क्रोध चढ़ जाई। बीच क्रोध दे आई के शाह ने नोकरां नूँ फ़रमाई। गुरु रविदास जी के शब्द वाणों से जख्मी हो कर शाह करोड़ीमल पागल हो गया, क्योंकि आज तक कोई भी माई का लाल उसे ऐसे कड़बे शव्द नहीं कह सका था। गुस्से की आग में धधकता हुआ करोड़ीमल अपने नौकरों को कहता है:---     ...

गुरु रविदास और करोड़पति करोड़ीमल।

।।गुरु रविदास और करोड़पति करोड़ीमल।। पांच हजार वर्षों से, ब्राह्मण मनुस्मृतियों के काले कानूनों को शासकों से लागू करवा कर, अछूतों का खून चूसता आया है, वाणियां अपने तराजू की मार देता आ रहा है, अगर पिसता रहा और खोखला होता रहा है, तो केवल राजपूत और मूलनिवासी शूद्र समाज। राजपूतों को, युद्धों में मरवाया जाता रहा, मूलनिवासियों को, घर पर गुलाम बना कर, भूखे पेट रख कर, ओबर वर्क लेकर, दिन रात कोहलू के बैल की तरह जोड़ कर, उसकी हड्डियों का भी जूस निकाल कर पिया जाता रहा है, मगर कोई भी माई का लाल इस शोषण के खिलाफ आवाज तक बुलंद नहीं करता था। विदेशी हमलावर आते गए ब्राह्मण सिर माथे पर बैठाते गए, खुद तो ये लोग लुटे नहीं क्योंकि इन की जेब में कुछ था नहीं, केवल राजाओं की शरण में रह कर,मंत्री पद ग्रहण कर के, चमचागिरी करने का काम था जो राजाओं और महाराजाओं को छोड़ कर, फिर मुसलमान बादाशाहों का शुरू कर दिया मगर अछूतों का शोषण जारी रखा और खुद आराम से अपने पेट की पूजा करते रहे,अन्याय, अत्याचार, अनाचार, व्यभिचार, शोषण से निजात दिलाने के लिए,गुरु रविदास जी ने ही अपनी आध्यात्मिक शक्ति के बल पर अकेले ने ही मोर्चा खोला। ...

गुरु रविदास जी और सर्वधर्म एकता।।

।।गुरु रविदास जी औऱ सर्वधर्म एकता।। गुरु रविदास जी महाराज ने, अनुभव किया था कि, विश्व में चल रहे शासकीय, न्यायिक और प्रशानकीय आतंकवाद की जड़ है, केवल और केवल शासकों में धार्मिक भावना का ना होना ही है। ईश्वर एक है, अल्लाह एक है, गाड भी एक है, आदिपुरुष भी वही है, फिर इतने सारे धर्म कहाँ से आ गए? किस लिए, किस के लिए, और क्यों ईजाद किए गए? एक धर्म, दूसरे धर्म के खून का प्यासा क्यों बन गया है? इस्लाम धर्म के फर्माबरदारों ने भारत भूमि को क्यों लहूलुहान कर रखा है ? ईसाई धर्म ने भी सारे संसार को अपनी धरोहर क्यों बना रखा है ? सभी शासक, धर्मो के नाम पर इंसान के खून की नदियों क्यों बहाते जाते हैं? सारे शासक अपने धर्मों के प्रचार प्रसार के लिए, भारत की धरती को खून से क्यों लाल करते जा रहे ? विश्व में जहां एकता, स्नेह, समरसता, सदभावना और सम्मान, होने चाहिए, वहाँ एक दूसरे के जानी दुश्मन क्यों बने हुए हैं? गुरु रविदास जी महाराज ने, संसार में पनपती हैवानियत के कारणों की जांच बड़ी बारीकी से की थी। उन्होंने उनकी नब्जों को समझा, परखा औऱ पाया कि ये धर्म और धर्मों के ठेकेदारों ने ही, इतिहास में अपना नाम चमका...

73डाक्टर भीमराव अंवेदकर का जबाब।

 डाक्टर भीमराव अंवेदकर का जबाब:-----डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने बहस में बोलते हुए, लार्ड लोथियन और हिन्दू मैंबरों को बताया कि, पंजाब आदिधर्म मंडल के नेताओं ने जो जो किताबें बहस में पेश की हैं, ये सारी आप की ही हिन्दू यूनिवर्सिटी बनारस और इलाहाबाद द्वारा छापी हुई हैं, इसलिये जो कानून इन किताबों में लिखे हैं, वही हमने यहां बताए हैं, जिनके आधार पर हिन्दू अछूतों पर अत्याचार करते आए हैं। ये सत्य पर ही आधारित हैं। डाक्टर भीमराव अंवेदकर का लाला रामदास से सवाल:----–लाला रामदास जी आपने अपने दयानंद दलित उद्धार मंडल की ( रिपोर्ट की प्रति उछालते हुए) रिपोर्ट में ये लिखा हुआ है, कि पंजाब में करीब बाईस लाख आदमी ऐसे निवास करते हैं, जिनके साथ हिन्दू , कुत्ते बिल्ले जैसा सलूक करते हैं, वे कौन हैं? ये क्या अच्छूतों के बन्दे नहीं हैं? क्या ये किसी दूसरे देश से किराए पर लाए गए हैं? बताओ, आप की संस्था के प्रधान कौन हैं? लाला रामदास की ओर से जबाब:-----जिस रिपोर्ट के बारे में कहा गया है, वह हमारी ही संस्था है,इस संस्था के प्रेजिडेंट लाला देवी चंद हैं, जो जाति के हिन्दू हैं, मैं उस संस्था का महासचिब हूँ।ज...

गुरु रविदास जी और वासनामुक्त जीवन।।

।।गुरु रविदास जी और वासनामुक्त जीवन।। गुरु रविदास जी महाराज ने, आजीवन आदर्श जीवन जिया और जीने केलिये जीवन मूल्य भी निर्धारित किए, जिसका मुकाबला कोई कवि, लेखक आज तक करता हुआ नजर नहीं आया, कोई इश्क की पूजा करता हुआ मिलता है, कोई मुश्क का ही राग अलापता हुआ नजर आता है, कोई विरला ही साहित्यकार ऐसा हुआ है, जिस किसी ने बहुआयामी सामाजिक जीवन मूल्यों को अपने लेखन का लक्ष्य मानकर लिखा हो, जिन्होंने इन्हीं मूल्यों को दृष्टिगत रखते हुए लिखा है, वे ही आज स्मरणीय हैं, वही पूजनीय है, वही ज्योतिर्लीन होकर भी समाज को सही दिशा की ओर ले जा रहे हैं।आज हम गुरु नानकदेव जी, नामदेव जी, कबीर साहेब, सेन जी, सूरदास जी, जयदेव जी, मलिक मुहम्मद जायसी, कुंभनदास, मीराबाई, सूर्यकांत निराला आदि साहित्यकारों को इसीलिए सम्मानजनक तरीके से याद करते हैं। इन्होंने जाति, धर्म से ऊपर उठकर लेखनी चलाई, सामाजिक बुराइयों पर प्रहार किए और जनजीवन को सुधारने के लिए प्रयास किए। अधिकतर साहित्यकार पहले सामाजिक ऐश्वर्यों का भोग लगाते हुए, ये उस समय धर्म कर्म की ओर उन्मुख होते नजर आते हैं, जब उन्हें पाँव कब्रगाहों की ओर जाते नजर आते हैं म...

गुरु रविदास के वंशज ही आध्यात्मिक शक्ति संपन्न हुए हैं।।

।।गुरु रविदास के वंशज ही आध्यात्मिक शक्ति संपन्न  हुए हैं।। गुरु रविदास जी की वंशावली, पर नजर डाली जाए तो ज्ञात होता है कि, यही ऐसा वंश हुआ है, जो आदिकाल से आध्यात्मिक शक्ति संपन्न हुआ है। भारत देश में जब से यूरेशियन आए हैं, तब से कहीं कोई यूरेशियन, ऐसा नजर नहीं आता है जिसमें गुरु रविदास जी के पूर्वजों, वंशजों की तरह आध्यात्मिक शक्ति नजर आती हो, मगर भारत के मनुवादी लोगों ने, जोरासीनी कर के, गुरु जी रविदास जी के वंशजों के मंदिरों पर, हेराफेरी और छलबल से अपना आधिपत्य जमा लिया है। चौरासी सिद्ध, अज्ञात समय से भारत की धरती पर अपनी दिव्य शक्ति के केंद्र बने हुए हैं, जिन के मालिक मनुवादी बन बैठे हैं, ये लोग चार पाँच हजार वर्ष पहले भारत आए थे, फिर ये सभी सिद्धों के पुजारी किस प्रकार बन बैठे हैं, पुजारी तो आदिकाल से ही मन्दिरों के थे, फिर चार पांच हजार वर्ष पहले आने वाले यूरेशियन किस प्रकार, गुरु रविदास जी के पूर्वजों के धर्म स्थलों पर जमे हुए हैं? इस विषय पर वहुत कम चिन्तकों ने, आज तक गहराई से चिंतन किया है। मैं वचपन में अपने कुलदेवता लखमन सिद्ध को मत्था टेकने जब पहली बार गया था तो, मेरे प...

गुरु रविदास और आत्मा की परमात्मा से दूरी।।

।। गुरु रविदास और आत्मा की परमात्मा से दूरी। गुरु रविदास जी महाराज ने अपनी भक्ति की शक्ति से आत्मा और परमात्मा के अंतर, रहस्य और दूरी को जान लिया था। आत्मा परमात्मा की दूरी धरती और आकाश, धरती और सूर्य, धरती और चांद की दूरी के समान है, जिसका अनुमान केवल सच्चे साधकों को ही होता है, जो आज की डेट में, एक भी नहीं मिलता है। साधु सन्त केवल अपने पूर्वज गुरुओं, पीरों के डेरों का निर्माण करके, उनके नाम से अपने पेट और परिवार का पालन करते जा रहे हैं, कुछ उनके ड्रामों का लाभ उठाने वाले, उनकी टांगों की मालिस करके, केवल अपना उल्लू सीधा करते जा रहे। कुछ गुरुओं के मंदिरों में तो ब्राह्मण ही, पुजारी बन कर, गुरु जी का झूठा यशोगान करते हुए, चमारों की गुप्तचरी का काम करके, भेड़ की खाल पहन कर भेड़िये बने हुए हैं और पूरी सी आई डी ब्राह्मणवाद को देते आ रहे, कुछ तो चमार साधु सन्त ब्राह्मणवाद के दुमछुल्ले बनकर उनसे धन ऐंठ कर, गुरु रविदास जी के समाज को धोखा देते आ रहे हैं, मगर गुरू जी की टेढ़ी आंख उन पर पूरी नजर बनाए हुए है, ज्यों ही उनका बुरा समय आता जाएगा, उनका भांडा फूटता जाएगा और उनका सर्वनाश भी होता ही जाए गा।...

गुरु रविदास जी महाराज का बैकुंठ प्रस्थान।।

।।गुरु रविदास जी महाराज का बैकुंठ प्रस्थान।। गुरु रविदास जी महाराज ने अपने महाप्रयाण से पूर्व ही, भारतीय समाज में सूतक (अपवित्र दिन) की फैलाई गई, आडंबरोंपूर्ण अफवाहों को बुरी तरह, अपनी धारदार वाणी से खंडित कर दिया था, ताकि उनके महाप्रयाण के उपरान्त सूतक का झूठा नाटक ना रचा जाए। ब्राह्मणों ने कई प्रकार के सूतकों की बेतुके ही नहीं तर्कहीन अविष्कार कर रखे हैं, जिनका पोस्टमार्टम गुरु रविदास जी ने अपनी वाणी में बड़े ही तर्कपूर्ण ढंग से किया हुआ है:----                      ।।सूतक।। मरन जमणा दोवैं सूतक, पांडे पूजा करावण। कहे रविदास करम कांड मुड़ जून फ़सावण।। प्रसूतका उपजे जीव जनां तिसे सूतक आख। चुरासी लख चारों खाणी सभ में सूतक भाख।। अपवित्र आखण सूतक पाछे शुद्ध करावण।प्रसूतक हरनी बौर लगी थी, आन हरि जी तास बचावण।। जेते जल मध जीव हैं ऊपजै निपजै बिनसै असंख। संहस जल माहे सूतक घणा सभ अंभ बरते बेअंत।। जितने धरन माहिं अनाज भऐ प्रसूता मध में जीण। फल फलियों मेवियों जीव घने कहिंण।। सथावर माहे जीव सूवत गडिआँ मध प्रसूत। अगन माह जीव जले रसोई सूतक सबूत।। थ...

गुरु रविदास जी और मंगलाचरण।।

       ।।गुरु रविदास जी और मंगलाचरण।। गुरु रविदास जी महाराज ने, समाज को सत्य की नींव पर असत्य, झूठ, फरेब, प्रपंच अन्याय, छलकपट, अत्याचार, अनाचार, व्याभिचार और बलात्कार से टक्कर लेने केलिये ही वहुमुखी क्रांति का शंखनाद किया था। देवी देवताओं के नाम पर मानव बलि, पशु-पक्षी बलि, नारी बलि देकर जो हिंसा की जाती थी, उन्हीं देवताओं की निस्सारता और उन के अर्थहीन प्रचार से जनता को मुक्त कराने के लिए, सांस्कृतिक क्रांति की भी शुरुआत की थी।                ।।मंगलाचरण पहला।। हरि, हरि नाम धिआइयों, सदा मन प्रेम कर। लोभ, मोह, हंकार, दूत, जँम दूर हर।। संग, शील, संतोख, सदा, दृढ़ कीजीए।। अमरत हरि का नाम, प्रेम करि पीजीए।। संतां सँग निवास, सदा चित लोड़िए। मनमुख दुषटां संगत, तौं मन मोड़िए।। मनमुख चित कठोर, पत्थर सम जानिए।। भीजत नाहन कभी, रहे सदा विच पानीए।। तजि कठोर का सँग, सदा गुर शरण गहु।। गुर चरनन में ध्यान,सदा मुख राम कहु।। निज पति साथ प्रीत, सदा मन किजीए।। तिन में अरपे तांह, सदा सुख लीजिए।। जिन धनपति परमेशर,...

गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।।

        ।।गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।।                   ।।भाग पाँच।। गुरु रविदास जी महाराज की शुभ बारात वापस मिर्जापुर से अपने गाँव चमार माजरे वापस पहुँच गई। बुआ रतनी और माता दियारी ने बड़े चाब के साथ नव दंपति की, दरबाजे पर आरती उतारी और सहेलियों के साथ गीत गाती हुई वे दूल्हे और दुल्हन, को गृह प्रवेश करवाया। परिवार और सभी सगे संबधियों ने अपने सारे सामाजिक दायित्वों को पूरी मान मर्यादा में रह कर ही पूर्ण किया और अपने दायित्वों को निष्ठा से निभाया ताकि कहीं कोई जीवन चरित्र पर उंगली ना उठा सके, उसी ढंग से सारे कार्य कलापों को समय समय पर किया गया, गुरु रविदास जी हमेशा ही अपने पूज्य मातापिता के सदा आज्ञाकारी रहे और उनके साथ संयुक्त परिवार में ही जीवन यापन किया, स्वामी ईशरदास जी ने गुरु रविदास जी के पवित्र पाणिग्रहण का वर्णन अपनी कलम से बड़े ही सुंदर ढंग से किया है:----                   ।।शलोक।। ,चौदह सौ पचास बिकर्मी सँग्रांद जेठ की आई।श्री गुरु रविदास जी की इस दिन होई सगाई।। मिर्जाप...

गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।

         ।।गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।।                     ।।भाग तीन।। गुरु रविदास जी वेदी में बैठ हुए थे, वहां ऐसा कोई भी पंडित नहीं था जो सतगुरु की शादी में वेद पढ़ सके, ऐसी परिस्थिति में स्वयं दूल्हा होते हुए ही उन्होंने ही अपनी वेदी की रश्म खुद ही पूर्ण की थी। स्वयं वेदी में बैठते हुए लांवां पढ़ने के साथ, अलौकिक सत्संग करते हुए, वे गाते हैं:----                    ।।पहली लांव।। पहिलड़ी लांव हरि दर्शन गुरां दा, जावै दूर बुलाई।। दीआ मेल हरि दया धार के, गुरां गुझि रँमज चलाई।। अनहद शवद सुणे मन थिर कर, मिट गए सरव अंधेरे।। किरपा सियों गुर मिलिआ पूरा, लिव लागि हरि सवेरे।। पूरे गुर ते शवद सच पाइए, रतन अमोलक मीता।। सुणदियाँ ही मन मस्त दीवाना, शवद गुरां ने कीता।। महां वाक सुण, सुण के गुरु दे, श्रद्धा प्रीत बन आवै।। कहि रविदास एह है लांव पहिलड़ी,चौसठ तीरथ नहावै।।                 ।।दूजड़ी लांव।। दूजड़ी लांव प्रेम प्रीती, सुरत शवद संग मि...

गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।।

।।गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।।                ।।भाग दो।। गुरु रविदास जी की बारात का मिर्जापुर पहुँचते ही बड़ी गर्मजोशी से स्वागत करके सभी बारातियों का सम्मान किया गया था, सारी बारात को दुल्हन के प्रांगण में बड़े अदब सहित बैठाई गई थी, जहाँ स्त्रियां, बारात के आने के शुभ अवसर पर सुहावने दृश्य का वर्णन अपने लयात्मक सुरीले और मनमोहक शब्दों में गा कर व्यक्त कर रही थीं:----            ।।शव्द हिमाचली।। साजन साडे बेहड़े आए,होया आंगण साडा सुहावां जी।। साजन बैठे रंग रँगीले खुशियां दे मंगल गावां जी।।वेखण आइयाँ सब सब सईयाँ, साजना नूँ कर चावां जी।। गुरमुख साजना दा मेला होया, सारे शगन मनावां जी।। जांजी लाड़ा जँज लै कर आया बैठा तंबोल लगावां जी।।दहिने कर में कँगणा बांधा दसती मेंहदी लगावां जी।।छती छती भोजन खट रस बण गए, प्यारे साजना नूँ बरतावां जी।। कपड़े कोट वा कोरे आंदे साजना हेठ बछाबां जी।। साध संगत बिच सेवा करिए कर लयो वीर भराबां जी।।सच्चा सतगुर साजन मिल जाए मोक्ष तउ तिस पावां जी।।जनम जन्मांतर की मल उतरे शवद के तीरथ न्हावाँ जी।।ईशरदास ...

गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।।

   ।।गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।।               ।।भाग एक।। गुरु रविदास जी महाराज, ने अपने सारे सामाजिक दायित्वों को पूरे मान मर्यादा में रह कर निभाया। कहीं कोई जीवन चरित्र पर उंगली ना उठा सके, उसी ढंग से सारे कार्य कलापों को समय समय पर किया, अपने माता-पिता के सदा आज्ञाकारी रहे और उनके साथ संयुक्त परिवार में जीवन यापन किया, जब गुरु रविदास जी सत्रह वर्ष के हो गए तब बाबा कालू जी ने अपने सन्तोषदास जी से सलाह मशबरा करके, सगाई और शादी एक ही दिन में करना सुनिश्चित कर लिया, जिसे गुरु रविदास जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। स्वामी ईशर दास जी ने गुरु रविदास महाराज के पवित्र पाणि ग्रहण का वर्णन अपनी कलम से बड़े सुंदर ढंग से किया है:----               ।।शलोक।। चौदह सौ पचास बिकर्मी सँग्रांद जेठ की आई। श्री गुरु रविदास की इस दिन होई सगाई।। मिर्जापुर सुजाने की सुंदर सुता सुभागण तिस का नाम। तिस सँग शादी गुरां दी, सँगतां मिल आइयाँ शाम।। गुरु रविदास जी शादी सत्रह साल की आयु में, गाँव मिर्जापुर के सुजान नामक व्यक्ति की लड़की सुभागन...

गुरु रविदास जी और पंडित परमानंद का आत्मसमर्पण।

।।गुरु रविदास जी और पंडित परमानंद का आत्मसमर्पण।। गुरु रविदास जी के समय में, रामानंद और परमानंद नामक दो प्रकांड ब्राह्मण प्रसिद्ध थे, वे इतने अहंकारी और वर्ण समर्थक थे कि दोनों ही अछूतों की परछाईं से अपवित्र हो जाते थे। अछूतों को इंसान नहीं समझते थे, पशुओं से भी अति बदतर समझते और उनसे  व्यवहार किया करते थे, रामानंद की दन्तकथा तो सभी जानते थे, कि सतगुरु  कबीर साहिब को भी अपना शिष्य बनाने से इन्कार कर दिया था मगर जब कबीर साहिब ने गुरु रविदास जी से दीक्षा ले कर अलौकिक दृष्टि प्राप्त कर ली और ब्राह्मणों की ऐसी तैसी फेर कर रख दी, तब रामानंद ने एक दन्त कथा घड़ी, कि एक दिन सुबह रात के अंधेरे में कबीर साहिब रामानंद के रास्ते पर लेट गए थे और जब प्रातः काल वह नहाने निकला तो अंधेरे में उसे पता ना चलने के कारण उसके पाँव, कबीर साहिब से छू गए जिससे उसके मुंह से निकल गया राम राम। वस इसे ही कबीर साहिब ने गुर मन्त्र स्वीकार करके रामानांद को अपना काल्पनिक गुरु बना लिया। वास्तव में ये ब्राह्मण नीति ही ऐसी है कि जो शूद्र शक्ति विश्व विख्यात हो जाती है, तो ये प्रपंची लोग शूद्रों को अपनी जाति से निम...

गुरु रविदास जी और उनका क्रांतिकारी सत्संग।

।।गुरु रविदास जी और उनका क्रांतिकारी सत्संग।। गुरु रविदास जी महाराज ने, चार वर्ष की आयु में धोती तिलक लगा कर दहिना शंख बजाना शुरू करके वहुजन धार्मिक क्रांति का बिगुल बजा दिया था, जिसकी अति अलौकिक ध्वनि को सुन कर ब्राह्मणों के कलेजे पर फणीयर लोटते थे, सारे के सारे गाँव में बिजली की गाज गिरती थी, मगर वच्चे के सामने कोई पेश नहीं चलती थी। जैसे ही गुरु रविदास जी पांच वर्ष के हो गए, उन्होंने दिव्य ध्वनि में सत्संग करना भी शुरू कर दिया। जब वे शब्द कीर्तन करते हुए, सत्संग में शव्दों की व्याख्या करते थे, उस समय वे पुराणपंथियों पर कहर बरसाते थे:----                ।।शलोक।। पंज वर्ष दे हो गए गुरु रविदास। वाणी उच्चारण अनुभव रब्बी होई जोत प्रकाश।। जा खेलन नाल बालकां जउ तुम गिरवर शव्द उच्चारा। लाए समाधी बैठ के सभनां से होत निआरा।। जीवनदास दी नार सी।भानी नाम दोहां ने लिआ। पहले पहल गुर से चरणामृत इन्हें पीआ।। बहुते जनां नूँ होया भरोसा लै गुर मन्त्र जावण। मुख होंठ बिन "सोहम" जपणा ऐ गुर आख सुनामण।चाबियां रहिआं बैकुंठ दीआं हथ बामां जाण। सुगम मारग गुरां ने बेगम घडाया...

गुरु रविदास और जीवनदास।।

।।गुरु रविदास और जीवनदास।। गुरु रविदास जी अभी चार कु वर्ष के हुए थे कि, उनकी आध्यात्मिकता के चर्चे कांशी शहर में चारों ओर फैलने शुरू हो गए। धोती तिलक ने ही ब्राह्मण समाज में हाहाकार मचा रखी थी। जब दहिना शंख बजाया तब तो मानो ब्राह्मणवाद के क़िले में ही दावानल भड़क उठी हो। जीवनदास के मन में बालक रविदास के प्रति श्रद्धा तो बहुत हो गई थी मगर कहीं थोड़ा बहुत मन में खोट होगा। एक दिन वह समीप की नदी पर नहाने गया हुआ था। जब वह वापस आती बार, पहाड़ी की चढ़ाई पर चढ़ने लगा तो अचानक घटना घटी:-----              ।।शलोक।। कालू माजरे तउ थोड़ी दूर हाजीपुर पिंड जाण। धारू नाना गुर रविदास दा सवर्ण घड़े आधाण। धारू दा पुत दिआला तिस। का जीवनदास। जनम चौदह सौ चौबी बिकर्मी रिहा गुरां दे पास।।जीवन खिलावै गुरां नूँ नेहचा लई एह धार। दृढ़ जकीना खड़ाऊँणे तउ रविदास गुरु अवतार।। गुरु रविदास जी के मामे, गाँव हाजीपुर में थे, जो चमार माजरे से थोड़ी ही दूरी पर है।वहां नाना धारू जी ने, उनके लिए सोने के कंगन बनवाए हुए थे, जिन्हें लाने केलिये उनके बेटे दियाला का सपुत्र जीवनदास, वहां गया हुआ था। जीवनदास क...

गुरु रविदास और रामायण युग में आदिधर्म।।

।गुरु रविदास और रामायण युग में आदि धर्म।। गुरु रविदास जी से पूर्व, जो धर्म भारत की धरती पर फलता फूलता था, वह आदि धर्म ही था। आदिपुरुष द्वारा स्थापित प्राकृतिक (प्रकृति धर्म) धर्म, जिसे बाद में तर्कपूर्ण ढंग से व्याख्या करके, आदिधर्म के नाम से अभिहीत किया गया है। सृष्टि के आरंभ से ही आदिधर्म ही भारत की पहचान रही है, जिसे आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व युरेशयन लोगोँ ने मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, इसीलिए सबसे पहले आदिधर्म के पैरोकार महाऋषि वाल्मीकि को अनेकों परेशानियां झेलनी पड़ी, चोर डाकू के रूप में इतिहास में चित्रित किया गया है, उनके बाद, पुनः मूलनिवासी लोगों को सत्य का मार्ग दिखाते हुए, महाऋषि शंबूक को मौत के घाट उतारते हुए, राम राजा को दर्शाया गया है, जो झूठी कथा मेरे गले में बिलकुल भी नहीं उतरती है, क्योंकि कोई भी राजा इतना मूर्ख नहीं हो सकता है, कि भगति करने वाले साधक को किसी की मौत का अपराधी मानकर किसी साधु और संत को कत्ल कर दे। वाल्मीकि रामायण के मूल रचयिता ने अपनी हस्तलिखित रामायण में अपनी कलम से, एक भी ऐसा शव्द नहीं लिखा है, जिस में राम ने महाऋषि शंबूक की हत्या का जिक्र किया हो...

गुरु रविदास का विश्व धर्मग्रंथ पोथी साहिब।।

।।गुरु रविदास का विश्व धर्मग्रँथ पोथीसाहिब ।। गुरु रविदास जी ने, विश्व में भूमण्डलीय सरकार, भूमंडलीय धर्म (विश्वधर्म), भूमंडलीय धर्मग्रँथ, और विश्वभाषा, की गवेषणा ही नहीं की थी, अपितु इस योजना पर कड़ा परिश्रम भी किया था। संसार में, ऐसा कोई भी विचारक नहीं हुआ, जिसने सभी देशों का भूमंडलीकरण करके, वैश्विक सरकार बनाने केलिये, विशाल भूमण्डल को ही, बेगमपुरा बनाने की दिशा में कार्य किया हो, केवल गुरु रविदास जी ही एक ऐसे सन्त महापुरुष हुए, जिन्होंने संकीर्ण दिवारों को तोड़कर, रास्ते में आई रुकाबटों, मुशीबतों को ठोकर मारते हुए, मस्त हाथी की चाल चलते हुए, अपने ही लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, जीवन का अथाह सफर तय किया हो। आदिपुरुष ने, शान्ति के अवतार के रूप में, गुरु रविदास जी को, भारत में भेजा था, जिसका लाभ भारत के ब्राह्मणों ने ना लिया औऱ ना ही दूसरों को लेने दिया। खुद भी उनके प्राणों के प्यासे रहे और राजाओँ, महाराजाओं और बादशाहों को भी, उनके पीछे तलबारें लेकर दौड़ाए रखा, मगर वे थे ही दिव्य पुरूष, जिसके कारण, सभी मुंह की खाकर धरती पर धड़ाम से गिरते रहे और समाज में जलील भी होते रहे। जो लोग शान्ति से...