गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।।
।।गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।।
।।भाग दो।।
गुरु रविदास जी की बारात का मिर्जापुर पहुँचते ही बड़ी गर्मजोशी से स्वागत करके सभी बारातियों का सम्मान किया गया था, सारी बारात को दुल्हन के प्रांगण में बड़े अदब सहित बैठाई गई थी, जहाँ स्त्रियां, बारात के आने के शुभ अवसर पर सुहावने दृश्य का वर्णन अपने लयात्मक सुरीले और मनमोहक शब्दों में गा कर व्यक्त कर रही थीं:----
।।शव्द हिमाचली।।
साजन साडे बेहड़े आए,होया आंगण साडा सुहावां जी।। साजन बैठे रंग रँगीले खुशियां दे मंगल गावां जी।।वेखण आइयाँ सब सब सईयाँ, साजना नूँ कर चावां जी।। गुरमुख साजना दा मेला होया, सारे शगन मनावां जी।। जांजी लाड़ा जँज लै कर आया बैठा तंबोल लगावां जी।।दहिने कर में कँगणा बांधा दसती मेंहदी लगावां जी।।छती छती भोजन खट रस बण गए, प्यारे साजना नूँ बरतावां जी।। कपड़े कोट वा कोरे आंदे साजना हेठ बछाबां जी।। साध संगत बिच सेवा करिए कर लयो वीर भराबां जी।।सच्चा सतगुर साजन मिल जाए मोक्ष तउ तिस पावां जी।।जनम जन्मांतर की मल उतरे शवद के तीरथ न्हावाँ जी।।ईशरदास कहे होइ कारज सुफला, चा कर कर तोड़ चढ़ावां जी। साजन साडे बेहड़े आए, होया आंगण सुहाबां जी।।
स्त्रियां सुभागन की शादी के शुभ अवसर पर, सुहाग गीत गाने लगी, जिससे सारा वातावरण भी सुहावना हो गया।
।।सुहाग।।
माता गोदी बीबी लेट करतार तैंनूँ पालै हे।।बिच सखियाँ लाडो खेल कीए आमां हाकां तैंनूँ मारे हे।। बाबुल ते तैं धागा पाइ लिआ कठे चाचे ताऐ सारे हे।।कत पिंज के दाज बणाई लिआ, मामे तेरे ताये सभ प्रवारे रे।। बाबुल धर्मी गंडां फेर लँईआँ साकी नाती दूंण पहाड़े हे।।तेरा सुहाग बीबी अटल रहे सतिगुर काज सभ सुधारे हे।।
इधर आंगन में बारात बैठी हुई होती है उधर दुल्हन की साँद की रश्म मामा और मामी निभा रहे हैं, सुहागनें, रलमिल कर सुहाग गीत गा रही थीं:----
।।सांद वाणी।।
सोहं सांद सोलखिआ सरव घटि।
मिल गुर नाम लगाईयो रट्ट।।
चोंक चतर जग जान महान।
पूरन हार जगत सो प्राण।।
नानके , मापे, साक, सोहेले।
करि किरपा सतगुर प्रभ मेले।।
हथ गाना गणियो सो माल।
किया दान पुंन रचन आकाल।।
कुंभ कमाल जनम जन पाइयो।
सुरत शवद आनाज मिलाइयो।।
भर जल कुंभ कारज में धरियो।
तिस कारज सो पूरन करियो।
दीपक दिल हैं तेल बिठाई।
सुरत मिला उत्ते जोत जगाई।।
गुरु भरोसे सोउ सिन्दूर ।
नोउ दर ते नो ग्रह सभ दूर।।
गुरमुख साँद समझ सच सोई।
सभ कारज प्रभ ओट लै होई।।
खोपा कारज समगरी घिओ।
इक दर खतम सौगंधी भओ।।
अब अंब पत जगन जग जाग।
सुरत शबद मिल मंगल राग।।
सब मिल प्रण प्राण बिठाओ।
सँग गुरमति विशवास जमाओ।।
कहे रविदास भज हरि नाम।
प्रभु सों ध्यान सफल सभ काम।।
दुल्हन की शादी की सांद की रश्म पूरी होते ही उसे स्नान करबाकर, मामियां तोरण की रश्म निभाती हैं और मामे दुल्हन के सारे परिवार को कपड़े पहना कर अपना नानके का व्यवहार संपन्न करते हैं, उसके बाद दुल्हन को वेदी में ला कर, दूल्हे के साथ खारी ( दूल्हे दुल्हन को वेदी में बैठाने वाले आसन) पर विराजमान करते हैं औऱ सभी सुहागनें वेद वाणी गाती हैं:----
।।शवद तिलंग।।
इन्हां वेदां नूँ कौन करावे नी सईयो।नानके दादके मामे वीरने बाबुल चक चक धूपां नूँ पावे नी सईयो।।चाचे ताऐ आए बैठे सभ सरबन्धी बिच गुरमुख वेद पढ़ावे नी सईयो। दीवे जगा के खारे रखा के जोड़ी सलामत रखावे नी सईयो।।कनियाँ दान करन सभ मिल जुल के मां दोहां नूँ शगन दलावे नी सईयो।।
।।शवद जोग।।
अज दिन शादी दा, शादी दा, शादी दा, सुखां सुखदियाँ आया।ठाकर तेरी पैज रखावे जिसने काज रचाया।।जोड़ी तुम्हारी सलामत प्रभु वधावै, सभनां ने शुभ मंगल गाया।। सम संतोखी काज लँघावीं दाता तूँ रघुराया।।जिसने काज रचाया।। ईशरदास कहे फड़ सरन गुरां दी, सतगुरां ने भव सर ऑन लँघाआ।।
सुहागण नारियां शादी के गीत गाती हुई कहती हैं कि आज सुख देने वाला दिन, शादी का आया हुआ है। ईश्वर आप की इज्जत रखे, जिस ने ये शुभ कार्य रचाया हुआ है। सभी सुहागनों ने कल्याणकारी और शुभ गीत गाते हुए कहा कि, आप दोनों की जोड़ी सदा सलामत रहे, ईश्वर आप के वंश की बृद्धि करें। जिसने ये कारज रचाया हुआ है, हे भगवान! इस आयोजन को सब्र सन्तोष से पूर्ण करना। स्वामी ईशरदास जी फरमाते हैं कि, सच्चे गुरु का लड़ पकड़ो वही संसार रूपी सागर से पार लँघा सकता है अर्थात मंजिल तक पहुँचा सकते हैं।
रामसिंह आदिवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर 17, 2020।
Comments
Post a Comment