गुरु रविदास और रामायण युग में आदिधर्म।।

।गुरु रविदास और रामायण युग में आदि धर्म।।
गुरु रविदास जी से पूर्व, जो धर्म भारत की धरती पर फलता फूलता था, वह आदि धर्म ही था। आदिपुरुष द्वारा स्थापित प्राकृतिक (प्रकृति धर्म) धर्म, जिसे बाद में तर्कपूर्ण ढंग से व्याख्या करके, आदिधर्म के नाम से अभिहीत किया गया है। सृष्टि के आरंभ से ही आदिधर्म ही भारत की पहचान रही है, जिसे आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व युरेशयन लोगोँ ने मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, इसीलिए सबसे पहले आदिधर्म के पैरोकार महाऋषि वाल्मीकि को अनेकों परेशानियां झेलनी पड़ी, चोर डाकू के रूप में इतिहास में चित्रित किया गया है, उनके बाद, पुनः मूलनिवासी लोगों को सत्य का मार्ग दिखाते हुए, महाऋषि शंबूक को मौत के घाट उतारते हुए, राम राजा को दर्शाया गया है, जो झूठी कथा मेरे गले में बिलकुल भी नहीं उतरती है, क्योंकि कोई भी राजा इतना मूर्ख नहीं हो सकता है, कि भगति करने वाले साधक को किसी की मौत का अपराधी मानकर किसी साधु और संत को कत्ल कर दे। वाल्मीकि रामायण के मूल रचयिता ने अपनी हस्तलिखित रामायण में अपनी कलम से, एक भी ऐसा शव्द नहीं लिखा है, जिस में राम ने महाऋषि शंबूक की हत्या का जिक्र किया हो और बौद्ध काल में उतर रामायण में ये कथा लिखी गईं हैं, जो मुझे बौद्धों और ब्राह्मणों की ही साजिश लगती है क्योंकि इन लोगों ने एक तीर से कई निशाने किये हुए हैं। भारत के मूलनिवासी ब्राह्मणवाद से दुखी हो कर, बौद्ध बन जाएं, मगर ब्राह्मणों ने वहां भी अपने लिए महायान बौद्ध धर्म बना लिया और  हीनता होने के कारण अछूतों को हीनयान शाखा बना दी। बौद्ध धर्म में भी ब्राह्मणों ने अपनी सर्वोच्चता कायम रखी। बौद्ध कालीन रामायण के उत्तर कांड के 73 से 76 तक के सर्गों में महाऋषि शंबूक वध, की कथा का वर्णन इस प्रकार हैं:----
एक दिन एक ब्राह्मण का इकलौता बेटा मर गया, जिसके शव को राम के दरबार में ले जा कर, ब्राह्मणों ने उस के पास रख कर बताया, कि आपके राज में अनिष्ट हो गया है, जिसके कारण ब्राह्मण लड़का मर गया है। ब्राह्मणों ने अपने शिकायत पत्र में राजा को बताया, कि कोई शूद्र आपके राज्य में तप कर रहा है, जिसके कारण यह ब्राह्मण लड़का मर गया। तत्काल सुनते ही रामचन्द्र जी पुष्पक विमान पर सवार होकर शंबूक ऋषि की खोज में निकल पड़ा और दक्षिण दिशा में शैवल महा पर्वत के उत्तरी भाग में एक विशाल सरोवर के तट के उपर तपस्या करता हुआ, एक तपस्वी मिल गया जो पेड़ से लटक कर तपस्या कर रहा था, जिसे देख कर, राम ने ना कोई अपील सुनी और ना ही दलील बस महाऋषि को मौत के घाट उतार दिया। एक और भी लेखक लिखता है, कि शंबूक नदी के किनारे तप कर रहा था जहां पर राम ने उसे मारा था।
अब तर्क शास्त्र की तलबार से, हम इस कथा का पोस्टमार्टम करते हैं।
जो राम भगवान का अवतार था, क्या वह इतना महामूर्ख अज्ञानी था, कि ब्राह्मणों के महाझूठ को शिरोधार्य कर लेता था और तपस्वी ही नहीं, महाऋषि शंबूक को मार देता?
क्या किसी भी शूद्र के लिए तपस्या करना अपराध था?
क्या किसी शूद्र के तपस्या करने से किसी ब्राह्मण के बालक की मृत्यु हो सकती हैं?
क्या भगवान राम शूद्रों से भेदभाव औऱ नफरत करते थे?
क्या राम ब्राह्मणों को ही श्रेष्ठ मानते थे?
क्या शूद्र तपस्या का अधिकारी नहीं है?
जब हम ने इन सवालों के उत्तर रामायण, महाभारत और उपनिषदों में तलाशे तो बड़ी हैरत हुई कि इनके उतर इन्हीं किताबों में, अत्यंत प्रेरणा दायक रूप से दिए गए हैं।
वेदों में शूद्रों के विषय में कहा गया है:---
1 तपसे शूद्रम। यजुर्वेद 30/5
अर्थात अत्यंत परिश्रमी, कठिन कार्य करने वाला, साहसी और कर्मठ बड़े बड़े उद्योगों में काम करने वाले, कठिन तप को करने वाले आदिवासी का नाम शूद्र हैं।
यजुर्वेद कहता है कि शूद्र ही आदिपुरुष का नाम है अर्थात आदिवासी, आदिधर्म को मानने वाले, शिव की तरह कठिन तपस्या करने वाले मूलनिबासी हैं।
2 नमो निशादेभ्य। यजुर्वेद 16/27
अर्थात शिल्प-कारीगरी विद्या से युक्त जो परिश्रमी लोग हैं, वही शूद्र हैं, उन सभी को नमस्कार करके उनका सत्कार करे।
3 वारिवस्कृतायौषधिनाम पतये नमो। यजुर्वेद 16/19
अर्थात- वारिवस्कृताय अर्थात सेवा करने वाले सेवक का (नमन) सम्मान करो।
4 रुचं शुद्रेषु। यजुर्वेद 18/48
अर्थात जिस प्रकार परमेश्वर सभी ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वाणियों और शूद्रों से एक समान प्रेम करता है, वैसे ही सभी विद्वान लोग भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र से भी एक समान प्रेम करें।
5 पञ्च जना मम। ऋग्वेद
अर्थात ब्राह्मण , क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं निषाद पांचों ही मेरे यज्ञ में प्रेमपूर्वक कार्य करें। पृथ्वी पर जितने मनुष्य हैं वे सब ही यज्ञ करें।
महाऋषि वाल्मीकि जी फरमाते हैं कि, रामायण के पढ़ने के लिये चारों वर्णों के अधिकार समान हैं।
रामायण के प्रथम अध्यायके अंतिम श्लोक के अतिरिक्त अयोध्या कांड के अध्याय 63 के श्लोक 50 औऱ 51 तथा अध्याय 64 के श्लोक 32 औऱ 33 में रामायण को सुनने और वाचन करने का वैश्यों और शूद्रों को समान अधिकार वर्णित हैं।
वाल्मीकि रामायण में श्री राम वनवास के समय निषाद राज का भोजन ग्रहण करते हैं। (बाल कांड 1/37 से 40 तक) तथा शबर जाति की शबरी ( भीलनी) से बेर खाना (अरण्यक कांड 74/7) प्रमाणित करता हैं कि, शूद्र वर्ण अर्थात भारत के मूलनिवासियों के साथ राजा राम, रामायण युग में कोई भी भेदभाव नहीं करता था।
अरण्यक 74/10 के अनुसार राम, शबरी को मिलने खुद गए थे, जब राम के आने की सूचना भीलनी को मिली थी, तब वह फूली नहीं समाई थी। झोंपड़ी में राम के आते ही वह अपने मीठे मीठे जूठे बेर, राम को खाने के लिए देती हुई कहती है:----
                   ।।शव्द।।
लगदे प्यारे मैनूं बेरां नूँ खा लै वीरा। तोहफा ऐ शबरी वाला कर (हाथ) ते रखा लै वीरा।। महिमानी ना समझीं अमीरत मेवे जानीं। जन्म जन्मांतर खुथिया हटा लै वीरा।। कर प्रणाम इन्हां नूँ भाल लगा के, बेरां नूँ खा के बुर्ज अहं दा ढा लै वीर।। वाह वाह! ऐ बेर शबरी मिठे ऐ कित्थों आंदे।मेहनत वहुत कीती झोली च पा लै वीरा। भन ईशरदास रघुवर खांदे लछमण नूँ दलांदे। बाकी सब पंगती ला के सँभना नूँ वंडा लै वीरा।
शबरी ने राम को जब बेर दिए, तब राम बड़े खुश हुए कि शबरी की प्रेमा भगती कितनी अपरम्पार है,राम ने शबरी के बेर बड़े अदब औऱ प्रेम से खा लिए, मगर अज्ञानी लक्ष्मण ने फेंक दिये, जिस की सजा उसे शमशीर के जख्मों के रूप में मिली थी।
          ।।शव्द जिला।।
छड कर रिखियाँ दे धाम आए शबरी दुआर। सबजा शबरी दे बैर बांटे जी राम अवतार। कुझ राम जी ने खाऐ। कुझ लछ्मण दलाऐ। सभ सँगतीं बंडाऐ। दिते जूठे समझ डार।। जिन्हां कीती ऐ कुचील।समझी सुता भील। मंदी करी जां दलील।बुरी बैठी उन्हां कार।। फल भीलणी सटाऐ।उन्हां बैर सो वणाऐ। उह सभनां ने खाऐ।खाणे पऐ हो बीमार।। जेहड़े लछमण सटाई। जगदी जड़ी बनवाई। पवन सुत जो लिआई। कहे ईशरदास कर विचार।
राम ने तो शबरी के बेर पहचान लिए मगर आज्ञानी लखमन पहचान नहीं सका और जूठे समझ कर घृणा करके फेंक दिए जिन से संजीवनी बूटी बन गई थी, फिर उसी संजीवनी बूटी को फिर बरछी लगने पर वही बैर, लक्ष्मण को खाने पड़े थे।
प्रेमां भगती की सुपर नायिका जिस की बदसूरती को देख कर मन में घृणा होती थी, उसी के बेर राम ने कुछ खुद खा लिए, कुछ अपनी संगत को दे दिए मगर लक्ष्मण ने गन्दे और झूठे समझ कर फेंक दिए थे, जिनकी सजा मेघनाथ की बरछी से मिली जिस का जख्म महाऋषि शबरी के बेरों से बनी संजीवनी बूटी से हुआ था।
अब संगत समझ सकती है, कि युरेशयन लोगों के पास कोई दैवीय शक्ति ना कभी थी, ना कभी होगी क्योंकि ये लोग छली प्रपंची लोग, मूलनिवासियों का शोषण करके घर में बैठ कर हराम की खाते हैं। जो शक्ति भीलणी के पास थी, वह राजा राम के पास भी नही थी। राम भी मात्र राजा ही था ना कि दैवीय शक्ति, अगर होती तो जो कलंक उसके जीवन पर लगे हैं वे कभी भी नहीं लगते। शबरी लक्ष्मण को कह देती है कि लक्ष्मण तुझे मेरे बेर खाने पड़ेंगे जिसके बारे में राम जान नहीं सका, राम को तब पता चला जब लक्ष्मण सँजीवनी बूटी से जिंदा हुआ था।
             ।।शव्द जिला।।
सिटे शबरी दे बेर खादे कष्ट कर वीरा।सही थी मेघनाथ चलाई कीते जख्म आ शमशीरा।सुपेन वैद ने बताऐ।जगदी बूटी लिआऐ। बेर भीलणी उगवाऐ।खाणे पै गए ओहो वीरा। पाणी बूटी मुख पाया।फूल नास को सुंघाया।ढक जखमी लगाया।मिटे जखम तां शमशीरा।।फरक भगती रखाई ऐ।अनक कसट उठाई ऐ।रेन भगतां दी पाई ऐ।सिर चक चक वीरा। सानूं जात ना पिआरी।प्रेमां भगती पिआरी। चाहे  होई
बाहमणी चमारी। भोजन खाईऐ पीऐ नीरा।
अब राम जो कुछ कहते हैं, उसमें कहीं भी उनका तनिक भी बैमनस्य दृष्टिगोचर नहीं होता है, कहीं भी छुआछूत नजर नहीं आती, कहीं भी ब्राह्मणों और चमारों में अंतर नजर नहीं आता इसीलिए वे कहते हैं, हमें तो प्यार करने बाल अच्छे लगते हैं। हमें जाति प्यारी नहीं है, हमारे लिए कोई ब्राह्मणी औऱ चमारी नहीं है।
इससे यह सिद्ध होता हैं की शूद्रों को भी, रामायण काल में तपस्या करने पर किसी भी प्रकार की कोई रोक नहीं थी, राम भी कोई छुआछूत नहीं करता था मगर ब्राह्मणों ने ही समाज को बांटने के लिए जातीयता, छुआछूत की दीवारें, आज से केवल पांच सौ साल पहले नया इतिहास लिख कर, खड़ी की हुई है जो आज भी जारी हैं, आज भी यही ब्राह्मण अछूतों को मंदिरों में घुसने नहीं दे रहे, गत वर्ष रामनाथ कोविंद जी, राष्ट्रपति होते हुए मन्दिर में नही जा सके, उन्हें पंडो ने मन्दिर में घुसने नहीं दिया।
अब पाठकगण, स्वयं विचार करें कि, श्री राम कैसा राजा हुआ है ? कैसे झूठी कथा घड़ी गई है ? किस प्रकार राजा और मूलनिवासी समाज में नफरत पैदा की गई है ? कैसे शंबूक को खुद मार कर राम के साथ लिंक किया है ?
क्या कोई राजा तपस्या में लीन किसी को भी मार सकता है ? फिर राम मूलनिवासी कुल में जन्मे शम्बूक की हत्या कैसे कर सकते हैं?
जब वेद , रामायण, महाभारत, उपनिषद्, गीता आदि सभी धर्म शास्त्र शूद्र समाज को तपस्या करने, विद्या ग्रहण करने, बांटने एवं व्यवहार औऱ आचरण से ब्राह्मण के समान व्यवहार करने का सन्देश देते हैं तो यह वेद विरोधी कथन, तर्कशास्त्र के शिकंजे में कसा नहीं जाता और ना ही तर्क शास्त्र की कसौटी पर सत्य सिद्ध होता हैं। राम का पुष्पक विमान में बैठ कर और ब्राह्मणों को लेकर शम्बूक को खोजना भी असत्य ही  हैं। ब्राह्मण बौद्धों ने शूद्रों को राजपूतों के साथ लड़ाने  के लिये राजा राम चन्द्र को, हथियार के रूप में प्रयोग किया है, ब्राह्मणों ने, राजा राम चन्द्र के माध्यम से काल्पनिक कथा जोड़ कर, रामायण में प्रक्षिप्तांश जोड़े हुए ही प्रतीत होते हैं, जिनसे आज सारे राजपूत और मूलनिबासी आपस में खून के प्यासे बने हुए हैं, जबकि षडयंत्र तत्कालीन बौद्ध ब्राह्मणों का ही लगता है। क्योंकि पुष्पक विमान की कल्पना भी मात्र कल्पना ही लगती है, क्योंकि अगर सचमुच ये विमान होता तो उसके अवशेष आज भी होते क्योकि राम चन्द्र का युग आज से तीन हजार वर्ष पूर्व का ही प्रतीत होता है। युद्ध कांड 127/62।
शंबूक की हत्या हुई है अथवा की गई है, ये सर्वस्व सन्देहास्पद ही लगता है, क्योंकि, आज गुरु रविदास जी के बारे में भी यही ब्राह्मणों ने भ्रांतियां पैदा कर रखी हैं, कि गुरु जी ने 151 वर्ष की आयु में हत्या कर ली थी, जिस का अनुमोदन कुछ गुरु जी के गद्दार, महामूर्ख मूलनिबासी लेखक बिना सोचे विचारे ही करते फिर रहे हैं, कुछ कहते फिरते हैं कि गुरु रविदास जी की हत्या के आंचलिक गीत मिलते हैं मगर ये गीत भी ब्राह्मणों ने ही लिखे हुए हैं क्योंकि उस समय अछूत तो शिक्षित नहीं थे। अभी अभी गुरु रविदास जी महाराज के साथ, ईर्षावश सुप्रीमकोर्ट के अन्यायी ब्राह्मण जजों ने, दस अगस्त बीस सौ उनीस ईस्वी को दिल्ली स्थित, गुरु रविदास महाराज का मंदिर तुगलकाबाद, मोदी सरकार ने लाखों पुलिस कर्मचारियों के द्वारा गिरवा दिया, जिसके लिए शूद्रों, मुसलमानों ने जी जान की लड़ाई लड़ी मग़र मूलनिवासी दल्लों ने मात्र दो सौ गज जमीन देने की सिफारिश की और सुप्रीमकोर्ट ने भी केवल चार सौ गज ही जमीन की स्वीकृति दी  है, जबकि बादशाह सिकन्दर लोदी ने, गुरु रविदास आश्रम के निर्माण के लिए सात सौ कनाल जमीन दी थी, जिसे भ्रष्ट मोदी सरकार ने छीन लिया। 28 जून 2020 को पुनः चार सौ गज भूमि का कब्जा देकर हमें जलील किया गया है, मग़र मूलनिवासियों की केंद्र में जब सरकार बनेगी तब पुनः सारी सात सौ कनाल भूमि खाली करबा कर, गुरू रविदास महाराज जी की अमर धरोहर को बहाल किया जाएगा। गुरु रविदास जी ने जो आदिधर्म कि बात की है, रामायण युग के इतिहास में वर्णित आदिपुरुष शब्द से प्रमाणित हो जाती है, कि रामायण युग में केवल आदिधर्म ही रहा है, जिसे ब्राह्मणों ने वैसे ही खत्म किया था, जिस प्रकार आज से पाँच सौ वर्ष पूर्व गुरु रविदास जी का संपूर्ण क्रांतिकारी साहित्य, और बनारस में गुरु रविदास जी का गोल्डन टेंपल ध्वस्त किया था और देश विदेश में बने, सभी गुरु घर, पवित्र अमृत जल के कुंड भी ध्वस्त किए थे।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर 12, 2020।





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