गुरु रविदास जी और उनका क्रांतिकारी सत्संग।
।।गुरु रविदास जी और उनका क्रांतिकारी सत्संग।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, चार वर्ष की आयु में धोती तिलक लगा कर दहिना शंख बजाना शुरू करके वहुजन धार्मिक क्रांति का बिगुल बजा दिया था, जिसकी अति अलौकिक ध्वनि को सुन कर ब्राह्मणों के कलेजे पर फणीयर लोटते थे, सारे के सारे गाँव में बिजली की गाज गिरती थी, मगर वच्चे के सामने कोई पेश नहीं चलती थी। जैसे ही गुरु रविदास जी पांच वर्ष के हो गए, उन्होंने दिव्य ध्वनि में सत्संग करना भी शुरू कर दिया। जब वे शब्द कीर्तन करते हुए, सत्संग में शव्दों की व्याख्या करते थे, उस समय वे पुराणपंथियों पर कहर बरसाते थे:----
।।शलोक।।
पंज वर्ष दे हो गए गुरु रविदास। वाणी उच्चारण अनुभव रब्बी होई जोत प्रकाश।। जा खेलन नाल बालकां जउ तुम गिरवर शव्द उच्चारा। लाए समाधी बैठ के सभनां से होत निआरा।। जीवनदास दी नार सी।भानी नाम दोहां ने लिआ। पहले पहल गुर से चरणामृत इन्हें पीआ।। बहुते जनां नूँ होया भरोसा लै गुर मन्त्र जावण। मुख होंठ बिन "सोहम" जपणा ऐ गुर आख सुनामण।चाबियां रहिआं बैकुंठ दीआं हथ बामां जाण। सुगम मारग गुरां ने बेगम घडाया आण।। किते डंडी किते पगडंडी किते सड़क इक तोड़। औरों फरलाँग गुर नाम दीआं ना सड़कां ना लोड़।।डंडी प्राण खट शास्त्र सड़कां वेद ग्रँथ। अजपा जाप गुर दे दिआ ना लोड़ शास्त्र पँथ।।
जब गुरु रविदास जी महाराज, पाँच वर्ष के हो गए, तब जिस वाणी को पढ़ कर उन्होंने सत्संग किया, उससे सारे संसार में प्रकाश हो गया। जब बालकों के साथ खेलते भी थे तब भी वे उनके साथ समाधिस्थ हो जाते थे। मामा के लड़के जीवनदास और उसकी पत्नी ने ही सबसे पहले बालक रविदास जी को अपना गुरु धारण किया और उनसे चरणामृत लिया। गुरु रविदास ने उन्हें मुख और होंठ हिलाए बिना "सोहम" का जाप सिखाया। बैकुंठ की चाबी सोहम उन दोनों को संभाल दी। गुरु जी ने सहज साधना का गुरुमंत्र देकर, बेगमपुरा शहर को जाने वाली सड़क दिखा दी, जो कहीं से कच्ची तो कहीं से टूटी हुई हैं। अति पुरानी पुराणों, वेदों, छः दर्शन शास्त्रों की कच्ची डंडियों से चलना बन्द करके, सुगम मार्ग पर चलना सिखा कर जीवनदास दंपति का कल्याण किया। वे आगे फिर संगत को भी समझाते हैं कि गुरु रविदास जी से जीवन को सुखी, सुगम, सुंदर, सुनहरा, खुशहाल बनाने के लिये चाबियां ले लो:-----
।।शव्द मेघ।।
लै ला कुंजिआं गुरां दे कोलों जा के बजर खुला लै गुपती।।लखां वेद ग्रँथ वेद पढ़ शास्त्र गुर बिन मिले ना मुकती।।सोहम शव्द कमावीं बिना मुख ते रात दिन ला लै सुरती।।फड़ अरजी राम दे नांम दी सचै दरबार भुगती।।सुरग नरकां दे सँगल तोड़ के बेगम जाई भुजती।।
गुरु रविदास जी, जीवनदास और उनकी पत्नी भानी को गुर ज्ञान देते हुए फरमाते हैं कि, नो दरबाजे तो खुले हुए हैं, मगर द्सवें दरबाजे पर ठोस कंक्रीट, जमीं हुई है जिसे तोड़ना वहुत ही कठिन है, जहां पर जा कर लोग निराश होकर वापस आ जाते हैं, उस बजर कबाड़ को खोलना वीरों का ही कार्य है, कमजोर डरपोक, मूर्ख, विलासी, बेगुरा उस दरबाजे को कदापि खोल नहीं सकता है, इसीलिये गुरु से गुप्त रूप से, चाबियां ले लो और जा कर उस बजर कबाड़ को खोल लो। लाखोँ लोग वेदों, ग्रन्थों शास्त्रों को पढ़ते रहे मगर सच्चे-सुच्चे गुरु के बिना किसी को भी इस युक्ति का पता नहीं चल पाता है। सभी ने अठाहसठ तीर्थ नहा कर भी देखे, सभी देवते भी पूजे, मगर नाम के बिना मोक्ष नहीं मिलता। रात दिन "सोहम" शब्द की कमाई करके स्वर्ग नरक के बंधन तोड़ कर, सुखी जीवन जी कर, इसी धरती पर बेगम शहर का आनंद लो।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंड
सितंबर 14, 2020।
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