गुरु रविदास जी और पंडित परमानंद का आत्मसमर्पण।

।।गुरु रविदास जी और पंडित परमानंद का आत्मसमर्पण।।
गुरु रविदास जी के समय में, रामानंद और परमानंद नामक दो प्रकांड ब्राह्मण प्रसिद्ध थे, वे इतने अहंकारी और वर्ण समर्थक थे कि दोनों ही अछूतों की परछाईं से अपवित्र हो जाते थे। अछूतों को इंसान नहीं समझते थे, पशुओं से भी अति बदतर समझते और उनसे  व्यवहार किया करते थे, रामानंद की दन्तकथा तो सभी जानते थे, कि सतगुरु  कबीर साहिब को भी अपना शिष्य बनाने से इन्कार कर दिया था मगर जब कबीर साहिब ने गुरु रविदास जी से दीक्षा ले कर अलौकिक दृष्टि प्राप्त कर ली और ब्राह्मणों की ऐसी तैसी फेर कर रख दी, तब रामानंद ने एक दन्त कथा घड़ी, कि एक दिन सुबह रात के अंधेरे में कबीर साहिब रामानंद के रास्ते पर लेट गए थे और जब प्रातः काल वह नहाने निकला तो अंधेरे में उसे पता ना चलने के कारण उसके पाँव, कबीर साहिब से छू गए जिससे उसके मुंह से निकल गया राम राम। वस इसे ही कबीर साहिब ने गुर मन्त्र स्वीकार करके रामानांद को अपना काल्पनिक गुरु बना लिया। वास्तव में ये ब्राह्मण नीति ही ऐसी है कि जो शूद्र शक्ति विश्व विख्यात हो जाती है, तो ये प्रपंची लोग शूद्रों को अपनी जाति से निम्न स्तरीय ढंग से अपने साथ लिंक कर लेते हैं और अपनी सुपरमेशी को कायम रखने का ढोंग रचते आए हैं। गुरु रविदास जी महाराज ने जब अपनी करामात की धाक चार वर्ष की आयु में ही जमा ली थी, तो ये दोनों अधूरे विद्वान, बड़े परेशान हो गए थे, जो ब्राह्मण, शूद्रों की परछाईं तक नहीं लेते थी, उनके घर तो आना ही क्या था, मगर जब कौम की आबरू खतरे में हो, और ब्राह्मण का पाखण्ड जगजाहिर हो रहा हो, तो ये लोग वहां गिर जाते जहाँ कोई अति गन्दा बन्दा जा भी नहीं सकता। जब परमानंद को बालक की विलक्षण बुद्धि, मस्तिष्क और करिश्मों की जानकारी मिली तो वह  भागा भागा, हांफता हुआ बाबा कालू दास जी के राजमहल में आ धमका और आते ही रौब छांटता हुआ कहता है:----
                  ।।शलोक।।
कई शक्तियां वखांवदे रविदास होए मशहूर।दरशन नूँ उह आमदे लोकी दूरों दूर।वाल उमरे गुरु बनामन जो जो रमज्ज नूँ पाऐ। सुरत शव्द नूँ मेल कर बेगम शहर वखाऐ। सुण के करामात गुर की परमानंद चल आया। वेखां जा के करामात नूँ कि ऐमें शोर मचाया।। केहन्दे सेवकां नूँ, मैं जा तिस निज सेवक बनामां। करामातां वेखां उस दियाँ अपनी शक्ति वखामाँ। परमानंद दा जनम बिकर्मी तेरह सौ अठानबे होया।जात ब्राह्मण मत वैरागी सी महंत जमात बनोया।।
गुरु रविदास जी के परोपकारों की धूम चार चुफेरे फैल गई थी, जिसे सुन कर सँगत उनके दर्शन करने केलिये दूर दूर से आने लगे। बचपन में ही लोग उन्हें गुरु बनाते जा रहे थे, गुरु जी शव्द सुरत का मेल मिला कर बेगमपुरा का रास्ता बता रहे थे। गुरु रविदास जी की ख्याति सुन कर ब्राह्मणों में तरथल मच गया था। सभी प्रकांड पंडित अपने प्रधान परमानंद के पास अपने दुखड़े रोने लगे, औऱ बताने लगें कि ये तो कोई हमारे लिए आफत आ गई है। हे प्रधान जी इस बालक को रोको नहीं तो हमारी झूठी पंडिताई की पोल खुल जाएगी, जिससे हमें तो रोटी के भी लाले पड़ जाएंगे। ज्ञान के अहंकार में डूबा हुआ परमानंद बड़े घमंड से उन्हें कहता कि मैं तो उसे अपने छोटे मोटे चमत्कार दिखा कर अपने मगर लगा लूंगा। वह तत्काल उठा और चमार माजरे की ओर चल पड़ा:----
             ।।त्रिभंगी छंद।।
जोड़ के सुणामा त्रिभंगी छंद जी। वेखण गुरां नूँ आया परमानंद जी।। सीता राम कह के बैठ गया आई के। दसो रविदास केहड़ा जी आई के।। गुरु रविदास आया साधुआँ पास सी। वाल उमर सत साल रविदास सी।रविदास जी ने सी आदेश बोलिया।परमानंद अपणा पोल सी खोलिआ।। दस करामात शकती वखाई के। तांही चल आए सुण तां सुनाई के।। शक्ति वेखण आए दे गल खास सी।। राम नाम बिन होर केहड़ी शकती। श्री गुरु रविदास दसो सच्ची भगती। परमानंद हसे लोकी दुहाई पाई आ। झूठ मूठ खंभ ते डार बनाई आ।। ऐह की जाणें शकती ते करामात आ। तूंबी च वणावे परमा हीरे ते लाल जी।। आ लै रविदास किते कम आवै काल जी।। ऋद्धि सिद्धि दे मैं मगर ला लमां।। श्री रविदास नूँ शागिर्द वणा लवां।। सोहणा रंग ढंग सदा रहू दास जी।। जीवनदास दी कुंडी पई साहमणे। सारा ब्रह्मण्ड गुर जी, दिखाया बाहमणे ।। माण ते हंकार उहदा कीता चूर जी। होया शर्मिन्दा ना रही कसूर जी। हरि हीरा छड ना रख होर आस सी।। परमानंद डिगिआ गुर करनी आई के। वणिआँ गुर का सेवक भेटा नूँ रखाई के।।सच्चा नाम दसिआ गुरां ने जब जी। पहुंच गया बेगम शहर तब जी।। बिन मुख जपणा सी नाम आ गया। सची ते समाधी दा बी भेद पा गया।। गुरां दा उपदेश करे दिन रात सी। मिरग जीन बसा शव्द सुणाई के। कीता सी ज्ञान गुरां समझाई के।। भगत जन भै हरन परमानंद है। करहूँ निदान अखीरदा छंद है।। उसतत करे परमानंद दास सी।।परमानंद बाबा कालू जी के राजमहल में आ कर बैठ गया और बोलने लगा, दसो जी कौन है रविदास ? छोटा सा सात साल का बालक रविदास पास ही खड़ा था। ज्यों ही बालक रविदास ने आदेश बोला, त्यों ही परमानंद ने अपने चमत्कार दिखाने शुरू कर दिए, मन में सोचा बालक तो सुंदर है, ऋद्धियों, सिद्धियों से मैं अपने पीछे लगा लूंगा औऱ ये बालक सदा मेरा गुलाम बन कर रहेगा। परमानंद ने मन्त्र तंत्र पढ़ कर, हीरे लाल बना कर, बालक रविदास को दे दिए और बोला, रख लो, आपके के कभी काम आएंगे। बालक रविदास जी ने उसके बनाबटी हीरे और लाल लेने से मना कर दिया और जीवनदास जिस कुंडी के पानी से जूतों को भिगोया करता था, उसी के गन्दे पानी में पत्थर फेंक दिया, जिस को परमानंद ने कुंडी के गन्दे पानी में गिरते हुए देखा तो, उसे वहां सारा ब्रह्मण्ड ही घूमता हुआ नजर आया, जिसे देखते ही परमानंद बेहोश हो कर धरती पर, गिर पड़ा। जब परमानंद को होश आई तब गुरु रविदास जी ने उसे कहा:-- 
""हरि सों हीरा छाँड़ि कर करै आन की आस।
ते नर दोजख जाएंगे, सत भाखै रविदास"" जिसे सुन कर पंडित परमानंद गुरु रविदास जी के चरणों कमलों पर गिर पड़ा और उनका शिष्य बन गया।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर 15, 2020।

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