गुरु रविदास जी महाराज का बैकुंठ प्रस्थान।।
।।गुरु रविदास जी महाराज का बैकुंठ प्रस्थान।।
गुरु रविदास जी महाराज ने अपने महाप्रयाण से पूर्व ही, भारतीय समाज में सूतक (अपवित्र दिन) की फैलाई गई, आडंबरोंपूर्ण अफवाहों को बुरी तरह, अपनी धारदार वाणी से खंडित कर दिया था, ताकि उनके महाप्रयाण के उपरान्त सूतक का झूठा नाटक ना रचा जाए। ब्राह्मणों ने कई प्रकार के सूतकों की बेतुके ही नहीं तर्कहीन अविष्कार कर रखे हैं, जिनका पोस्टमार्टम गुरु रविदास जी ने अपनी वाणी में बड़े ही तर्कपूर्ण ढंग से किया हुआ है:----
।।सूतक।।
मरन जमणा दोवैं सूतक, पांडे पूजा करावण। कहे रविदास करम कांड मुड़ जून फ़सावण।। प्रसूतका उपजे जीव जनां तिसे सूतक आख। चुरासी लख चारों खाणी सभ में सूतक भाख।। अपवित्र आखण सूतक पाछे शुद्ध करावण।प्रसूतक हरनी बौर लगी थी, आन हरि जी तास बचावण।। जेते जल मध जीव हैं ऊपजै निपजै बिनसै असंख। संहस जल माहे सूतक घणा सभ अंभ बरते बेअंत।। जितने धरन माहिं अनाज भऐ प्रसूता मध में जीण। फल फलियों मेवियों जीव घने कहिंण।। सथावर माहे जीव सूवत गडिआँ मध प्रसूत। अगन माह जीव जले रसोई सूतक सबूत।। थां थां सूतक नित हो रिहा सूतक बिना ना कोई। हरेक दे सँग सूतक रहे किरम जो होई।। नार ना सूतक मानत पशु भी सूतक होई।स्वान मझार भी सूतक घर घर माहे जा खलोई।।नहाई धोइ बिंजन छका कर इयों ना सूतक जाई। आदिपुरुष का सोहम जाप जपा रविदास सूतक धुआई।। नभ, धर, जल त्रिलोकी मध में सूतक कूंटक चार। कहे रविदास सूतक जाई गुर ढिग करत विचार।।
।।शवद जिला।।
तन मन सूतक नारी जान हे। काम क्रोध मोह लोभ हंकार। मन का सूतक कलेश भंडार। परविरती विकलप सिंघान हे।। मृखा सूतक रसना बोले। दृग सूतक प्रवाम तकोले। अपवाद सूतक सुने कान हे।। छल छिद्र बखीली दंभ करावै। मुहाके करम जो सूतक रहावै। चरासी सूतक फिरांन हे।। ऐसे सूतक का उपाव ना कराया। मानस जनम जो संखणा गुआया। रविदास सूतक चके गुर गिआन हे।।
।।शवद मेघ।।
बिना जीभा जपा जपा के सूतक चकदे तन मन का। दसवें दर दी लग जाइ समाधी। इस विध चकियो कूड़ अपाधी। मानसरोवर नहाते सूतक नर नारी जाइ जन का।। सुरत सूतक काल हथ आनी। मिल जाइ सतिगुर शवद समानी। मलीन चेतन माया चका के दियाल करतव फन का।।शंख घँटा मृदंग बजदे। सारंगी, किंगरी, मुरली सजदे। बीन नूँ भी बजा के सूतक धोइ गणका।।कबीर कोई कोई सूतक चकदा। गुर वाक मूरत ते जो जन पकदा। धनैहया में धिआन लगा के। सैंसा उर ना माया धन का।।
।।शवद मालव।।
सूतक कदे ना जावे गुरां बिन, सूतक कदे वी ना जाऐ। मन के सूतक शुभ अशुभ तन इन्द्रे सूतक बनाऐ।। इंद्री सूतक परनार गमना नैनी नदर मंद गऐ।। मंद मारग चल जो, कदमी सूतक कर दान बिना सूतकाऐ। सकंधर भाल सूतक बिन निवना दर्ज संगत कहाऐ।। अठ सठ तीरथ सूत कोई ना धोइऐ, धो शील सरोवर नहाऐ।। कहे रविदास सूतक ऐंऊँ जावे गुर का शवद कमाऐ।।
गुरु रविदास जी महाराज,151 वर्ष का बहुत ही लंबा समय, बिताकर बिकर्मी सम्मत 1584 की जेठ मास की पुण्य संग्राणद को परम् ज्योति में ज्योतिर्लीन हो गए। स्वामी ईशरदास महाराज ने गुरु रविदास जी के मोक्षधाम का वर्णन करके उन्हें अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए:----
।।शवद राग विहागड़ा।।
सुर सागर तट आसन लाए, श्री रविदास आऐ जी।। गढ़ाघाट भी तिस नूँ कहिन्दे बैठे समाधी लगाऐ जी।। लख करोड़ी सँग आई सभनी दर्शन पाऐ जी।। विलाप करदे सब सेवक आवन पुष्प वारिश कराऐ जी।। हिमाले परवत उरद कहिन्दे सिरधर परवत चढाऐ जी।। खसट चक्र को लंघ कर जांदे सुन सरोवर नहाऐ जी।। भँवर गुफा लंघ जप सोहम सोहम सचखंड सतिनाम गाऐ जी।। अलख अघम, अगंम अनामी बेगम शहर समाऐ जी।। पंज भूतक का पता नाहिं लगियो कहाँ गयो छपवाऐ जी।। बेअंत सँगतां राजे रईअतां हैरान हो जाऐ जी।। जहाँ ते आवत वहाँ ही जावत सनदेही बैकुंठ पुचाऐ जी।। ईशरदास कहे धंन धंन है गुर जी जोति जोत समाऐ जी।
गुरु रविदास जी ने ज्योतिर्लीन होने के समय, गड़ाघाट आ कर आसन लगा लिया था। गुरु जी के ज्योतिर्लीन के दुखद समाचारों ने समूची सँगत को, मातम में लीन कर दिया था। असँख्य सँगत दुःखद समाचार को सुन कर, गड़ाघाट पर पहुँच गई थी। गुरु जी के अन्तिम दर्शन करते समय सभी ने, गुरु जी को फूल अर्पित करते हुए उन पर फूलों का वर्षा की। जब गुरु रविदास जी ने समाधि ली, तब पांच भूतक पार्थिव शरीर का किसी को पत्ता नहीं चला कि, कहाँ विलुप्त हो गया। सारी ग़मगीन सँगत इस चमत्कार को देख कर, हैरान थी। गुरु जी की सशरीर ज्योतिर्लीन होना, सँगत के लिए रहस्य बन गया था।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
सितंबर 22, 2020।
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