गुरु रविदास जी और मंगलाचरण।।

       ।।गुरु रविदास जी और मंगलाचरण।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, समाज को सत्य की नींव पर असत्य, झूठ, फरेब, प्रपंच अन्याय, छलकपट, अत्याचार, अनाचार, व्याभिचार और बलात्कार से टक्कर लेने केलिये ही वहुमुखी क्रांति का शंखनाद किया था। देवी देवताओं के नाम पर मानव बलि, पशु-पक्षी बलि, नारी बलि देकर जो हिंसा की जाती थी, उन्हीं देवताओं की निस्सारता और उन के अर्थहीन प्रचार से जनता को मुक्त कराने के लिए, सांस्कृतिक क्रांति की भी शुरुआत की थी।
               ।।मंगलाचरण पहला।।
हरि, हरि नाम धिआइयों, सदा मन प्रेम कर।
लोभ, मोह, हंकार, दूत, जँम दूर हर।।
संग, शील, संतोख, सदा, दृढ़ कीजीए।।
अमरत हरि का नाम, प्रेम करि पीजीए।।
संतां सँग निवास, सदा चित लोड़िए।
मनमुख दुषटां संगत, तौं मन मोड़िए।।
मनमुख चित कठोर, पत्थर सम जानिए।।
भीजत नाहन कभी, रहे सदा विच पानीए।।
तजि कठोर का सँग, सदा गुर शरण गहु।।
गुर चरनन में ध्यान,सदा मुख राम कहु।।
निज पति साथ प्रीत, सदा मन किजीए।।
तिन में अरपे तांह, सदा सुख लीजिए।।
जिन धनपति परमेशर, जानियो है सही।।
सदा सुहागन नार, पाए ना दुख है कही।।
कहि रविदास पुकारे, जपियो नाम दोए।।
हरि कारज सो एक, सदा पायो सुख होए।।
              ।।मंगलाचरण दूसरा।।
दूजा भय मटाओ,यही मंगल दूसरा।
वण तृण परवत पूर रिहो प्रभु हूँसरा।।
घटी गटी एको,अलख पसारा पसरिया।।
गुरमुख जाने गिआन,ना जाने असरिया।।
सब घटि पूरण ब्रह्म,जान गुर पाए के।
रहे सदा आनंद,तास गुण गुआए के।।
जो हरि से थे बेमुख,सदा दुख पाई।
मानस जनम अमोल, बिअरथ गुआई।।
गुरु विन लहे ना धीर,पीर वहु पाई है।
लहे अनादर सरब, ठउर जहाँ जाई है।।
जब गुर भए दियाल, सो करनी लाया।
सतिगुरु काटे बंधन, जे नाम जपाया।।
साध संगत प्रताप, सदा सुख पाईऐ।।
सन्तन के प्रताप,नाम हरि ध्याईऐ।।
संतन के प्रताप सँग, पति प्रभ पाईऐ।।
मिलिया अटल सुहाग, वियोग गवाईए।।
संगत तों आशीर्वाद, इस मुख जोड़िए।।
कहि रविदास इन सँग,सदा सुख लोड़िए।।
              ।।मंगलाचरण तीसरा।।
रलमिल सब सखियाँ,मंगल गाया तिसरा।
सदा जपो हरि नाम,ना जउ कबहूँ बिसरा।।
सतिगुरु के लग चरणा,सदा हरि हर गाईऐ।
रिद्धसिद्ध नो निद्ध, सवहि कुछहूँ पाईऐ।।
सतिगुरु के परसाद, अटल है सुहाग ।।
सतिगुर भए दियाल, तां जागियो भाग।।
सतिगुर दर्शन पाये, अघ मिटहिं सर्व।
पायो शील निधान, सभ कटहिं गर्व।।
रहिया ना शंसा मूल, जिनहिं गुर पाया।।
हिरदै भया परकास,सर्व गिआन मटाया।।
बिन हरि नाम ना सार,कछुहूँ है संसार।।
हरि नाम ना व्यापार,भव सागर है पार।।
मंगल महा सो मंगल,हरि हरि हर नाम।।
आठ पहर मुख जपियो,एहि शुभ काम।
सब रविदास बतावै, नामु ना छोड़िए।।
गुर चरनन में ध्यान,सदा मन जोड़िए।।
              ।।मंगलाचरण चौथा।।
मंगल चार आनंद, सुखी मुख गाया।।
कारज भया सुहेला, हरि हरि ध्याया।।
धन और पीयर की,प्रीत बणी इक सार है।।
घटा छटा सभ मिली,मीन जिम बार है।।
पीयर सँग पाए आनंद, ना दुख की लेस है।
पति की आगिआ में, जोऊ फ़ी हमेश है।।
पति परमेशर करके, जिन धन जाणिआ।।
सदा सुखी वहु नार है, सरव सुख मणिआ।
जिन पर सतिगुर दयाल,सुखी बहु गाइऐ।।
महिमा अपर अपार, ना कीमत पाईऐ।।
सतिगुर के संग सब तरे, अबर बी कतड़े।।
कर के दृढ़ प्रीत, सभी प्रेम करो जेतड़े।।
कारज सब ही पूरे, सतगुर कर दिए।।
पूर्व पुत्र अनेक फल,तिस अब लिऐ।।
जन रविदास प्यास, सदा गुर धाम की।।
हरि सँग रहे प्रीत, ओट इक नाम की।
गुरु रविदास जी महाराज ने जीवन को किस प्रकार मंगलमय बनाया जा सकता है, जीवन किस प्रकार सुखी रह सकता है, किस प्रकार जीवन यापन करना चाहिए विस्तार से समझाया है। मानव के जीवन में कार्य किस प्रकार पूर्ण होते हैं, सफल होते हैं विस्तार पूर्वक समझाया है। ईश्वर की दयादृष्टि के बिना कुछ भी संभव नहीं, जब ईश्वर प्राणी पर दयावान हो भाग्य भी तभी सफल देता अन्यथा हमेशा हाथ खाली ही रहता है, चाहे आदमी कितना ही श्रम करे।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर 21, 2020।

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