गुरु रविदास और करोड़पति करोड़ीमल।
।।गुरु रविदास और करोड़पति करोड़ीमल।।
पांच हजार वर्षों से, ब्राह्मण मनुस्मृतियों के काले कानूनों को शासकों से लागू करवा कर, अछूतों का खून चूसता आया है, वाणियां अपने तराजू की मार देता आ रहा है, अगर पिसता रहा और खोखला होता रहा है, तो केवल राजपूत और मूलनिवासी शूद्र समाज। राजपूतों को, युद्धों में मरवाया जाता रहा, मूलनिवासियों को, घर पर गुलाम बना कर, भूखे पेट रख कर, ओबर वर्क लेकर, दिन रात कोहलू के बैल की तरह जोड़ कर, उसकी हड्डियों का भी जूस निकाल कर पिया जाता रहा है, मगर कोई भी माई का लाल इस शोषण के खिलाफ आवाज तक बुलंद नहीं करता था। विदेशी हमलावर आते गए ब्राह्मण सिर माथे पर बैठाते गए, खुद तो ये लोग लुटे नहीं क्योंकि इन की जेब में कुछ था नहीं, केवल राजाओं की शरण में रह कर,मंत्री पद ग्रहण कर के, चमचागिरी करने का काम था जो राजाओं और महाराजाओं को छोड़ कर, फिर मुसलमान बादाशाहों का शुरू कर दिया मगर अछूतों का शोषण जारी रखा और खुद आराम से अपने पेट की पूजा करते रहे,अन्याय, अत्याचार, अनाचार, व्यभिचार, शोषण से निजात दिलाने के लिए,गुरु रविदास जी ने ही अपनी आध्यात्मिक शक्ति के बल पर अकेले ने ही मोर्चा खोला। जिस की पहली कड़ी में शिकार हुआ था, गरीबों का खून चूसने वाला, शोषक करोड़पति करोड़ीमल।
एक दिन गुरु रविदास जी, सुबह ही करोड़ीमल के, लूटखाने में पहुंच गए, जिस के सत्रह दरवाजे हुआ करते थे, सत्रह दरवाजों पर सत्रह सेल्जमैन करोड़पति करोड़ीमल के, टुकड़ों पर पलने वाले, खूंखार भेड़िये, गरीब जनता का खून निचोड़ते रहते, कम तोलना, वही खाते में अधिक लिखना उन का कार्य था। करोड़ीमल की लूट को बंद करने के लिए, गुरु रविदास जी ने, लंबी यात्रा की योजना बनाई ताकि एक ही दौरे में कई भूले भटके हुए, लोगों को सन्मार्ग पर लाया जा सके। गुरु रविदास जी के साथ केवल सन्त रैदास और जीवनदास जी ही थे।
गुरु जी ने अपनी ऐतिहासिक यात्रा भागलपुर से शुरू की। वे भागलपुर से भूटान होते हुए नेपाल, पीलीभीत, जाते समय कई योगियों, वैरागियों और गृहस्थियों को उपदेश देते हुए, उनकी छली, कपटी आत्मा को स्वच्छ करते हुए, अपने अग्नि पथ पर चले जा रहे थे। श्री बद्रीनाथ में सत्य की आरती कर के पण्डों पुजारियों को उन की पूजा की औकात बताई। चलते चलते पूर्व दिशा की ओर, सत्रह हजार छै सौ बहत्तर फुट की ऊंचाई पर हेम कुंड, जिसे सिरधार पर्वत कहते हैं, की ओर अपनी विजय यात्रा करते जा रहे थे, रास्ते में रुक रुक कर जनता को भी सोहम, सतनाम का जाप जपाते और बताते हुए यमराज के फंदों से निजात दिलाते हुए, वे आगे पंजाब की ओर बढ़ते ही जा रहे थे। लाहौर पाक पाटण होते हुए जब जैसलमेर पहुंचे तो, गुरु रविदास जी ने सत्रह सांप के काटे हुए लोगों को जिंदा किया। जोधपुर पहुँच कर वहां के धनपति दीवान को रास्ते पर लाया। बूंदी पहुँच कर, ऊँचे घोर महल रूपी मंदिर में रहने वाले मिलखीमल को भी शब्द की बख्शिश की। गुरु जी उदयपुर, जयपुर, भरतपुर होते हुए पुनः आगरा पहुँच गए, जहाँ आ कर धनी शाह के भतीजे करोड़ीमल को समझाने लगे:----
।।शब्द।।
कौम खत्री ते करोड़ीमल कहीऐ, धन माल बेअंत तां पास होइया। कईयां मुन्सियां दफतराँ नाल लेखा नौकर चाकरां वल किआस होइआ। लुट पुट गरीबां नूँ, शाह बनियों बिच आगरे नाम प्रकाश होइआ। कदे रव दे नाम ना लाई दमड़ी, दिल राम दे नाम तों उदास होइआ।
करोड़ीमल दिन रात जनता को लूटता जा रहा था। कभी भी साध सँगत में नहीं बैठता। सारे अबगुणों की खान उस की देह बन चुकी थी। व्याज के ऊपर भी व्याज लगाए बिना किसी को भी एक दमड़ी का भी उधार नहीं देता था। सूद के ऊपर सूद लगा कर, लोगों की जायदादों को गिरवी रखवाया करता था। एक दिन सुबह ही गुरु रविदास उसके लूट के अड्डे पर पहुँच कर, उस की कारगुजारी का आंकलन करने लगे:---
।।शब्द।।
पंज बूहे सी मकान नूँ चार बारियाँ विच दफतराँ दा ना हिसाब कोई। वेखन बालड़े नूँ भूप नदर आवे लखां टहलना नबाब कोई। करे हुकम जो मनदे लोड़ वाले अगे करदा नहीं है जवाव कोई। गुरु रविदास जी गए अंदर, गल करन लगे तिस लाभ कोई।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, सेठ करोड़ीमल के पांच तो बड़े बड़े दरवाजे थे, जिन के बीच चार खिड़कियां भी थीं, कार्यालयों का तो कोई हिसाब नहीं था। जिन के बीच बैठा क्रूर शाह करोड़ीमल राजा ही नजर आता था, जिस की सेवादारिनों का कोई हिसाब नहीं था। कोई भी उसके हुकम को मोड़ नहीं सकता था। श्री गुरु रविदास जी ने उस के दरवाजे पर अलख जगा दिया और कहने लगे:----
।।शब्द।।
कंन लाई के सुन लओ गल मेरी, छड दफ़तराँ वल्लों खयाल शाह। सुत्ता पिया तूँ जाग लै, जाग करोड़ी चोर धाड़वी तेरा लूटन माल शाहा। अगे जाग तूँ वक़्त जागणे दा कदे हो जाएगा कंगाल शाहा। लखां सुत्ते पये ऐथे, लुटे गए छेकड़ रहि गए कंगले चंडाल शाहा।
गुरु रविदास जी करोड़ीमल को समझाते हैं कि, शाह! अपने काम से ध्यान हटा कर, कान लगा कर सुन, तेरा सारा सामान चोर लूट रहे हैं, तूँ संभल जा अन्यथा एक दिन कंगाल हो जाएगा, जिन मूल्यवान शब्दों को सुन कर, धन दौलत में अंधा हुआ करोड़ीमल सुन कर गुरु रविदास जी को जबाब देता हुआ कहता है:----
।। शब्द।।
मैनूं जागदे नूँ बतलाया सोया, ऐह तां आ गया अकल दा दीवाना कोई। मेरा माल कदे ठगां ने लुटिया ना अटल पटलियाँ गलां बतलाना कोई। बैठा जागदा पलंग नोकराँ तों रिहा कंम ते काज करवाना कोई। वाह! वाह जी! वाह ऐह आ गया हुण हाकम साडा, जागण सौंण दा हुकम लगाना कोई।
गुरु रविदास जी के लक्ष्यार्थ को मूर्ख करोड़ीमल समझ नहीं सका और अहंकार भरे कटु शब्दों में प्रत्युत्तर देते हुए कहता है कि, मुझे जाग रहे को अकल का दीवाना बता रहा है, मेरा माल कभी भी किसी चोर, ठग ने नहीं लूटा है, कैसी बेकार की बातें कर के दिमाग खा रहा है? ये कौन मुझे, सोने जागने का हुकम देने आ गया है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष
विश्व आदधर्म मंडल।
सितंबर 27, 2020।
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