गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।

         ।।गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।।
                    ।।भाग तीन।।
गुरु रविदास जी वेदी में बैठ हुए थे, वहां ऐसा कोई भी पंडित नहीं था जो सतगुरु की शादी में वेद पढ़ सके, ऐसी परिस्थिति में स्वयं दूल्हा होते हुए ही उन्होंने ही अपनी वेदी की रश्म खुद ही पूर्ण की थी। स्वयं वेदी में बैठते हुए लांवां पढ़ने के साथ, अलौकिक सत्संग करते हुए, वे गाते हैं:----
                   ।।पहली लांव।।
पहिलड़ी लांव हरि दर्शन गुरां दा, जावै दूर बुलाई।।
दीआ मेल हरि दया धार के, गुरां गुझि रँमज चलाई।।
अनहद शवद सुणे मन थिर कर, मिट गए सरव अंधेरे।।
किरपा सियों गुर मिलिआ पूरा, लिव लागि हरि सवेरे।।
पूरे गुर ते शवद सच पाइए, रतन अमोलक मीता।।
सुणदियाँ ही मन मस्त दीवाना, शवद गुरां ने कीता।।
महां वाक सुण, सुण के गुरु दे, श्रद्धा प्रीत बन आवै।।
कहि रविदास एह है लांव पहिलड़ी,चौसठ तीरथ नहावै।।
                ।।दूजड़ी लांव।।
दूजड़ी लांव प्रेम प्रीती, सुरत शवद संग मिलाई।
सतगुर कीती परम प्रीती, दरगाह में सुख पाई।।
सरब मनोरथ तिस दर ते पाउ, शरण परै कोउ तारै।।
हुकम अंदर है चार पदार्थ, तन मन जेकर कोई बारै।।
सतगुर शरण रहि बडभागी, तिन सहिंसे  सगल गुआए।।
सतगुर दाता प्रभ सँग राता, निस दिन हरि लिव लाए।।
भरम भुलावा मिथिया दावा, चाल गुरां दी चाली।।
कहि रविदास इह लांव दूजड़ी, वचन गुरां दे पाली।।
                ।।तीजड़ी लांव।।
तीजड़ी लांव अवरन दोष ते, रहित भया मन मेरा।।
हरि घट दे विच एक सर्व समाना, सो घर पाया डेरा।।
परम प्रभु परमेशर जाना, तां सुख मिले उपारै।।
मन में सच मंगल सुख होए,जो लोचा मन धारै।।
मंगल दे मंगल नित गावां, इहो अमरत धारा।।
हरि सँग लिव जुड़ी जुडेंदी, सचा इह सहारा।।
सुंदर शवद अमोलक दर्शन, जौऊ सतगुर दर आवै।।
कहि रविदास सोऊ लांव तीसरी, सुरत गगन चढ़ जावै।।
                  ।।चौथड़ी लांव।।
चौथड़ी लांव रतन हरि जाना, सुख संपति घर आवै।
आसा मनसा सतगुर पूरे, मन माहिं जै जै शवद गावै।।
सति संतोख भया मन मेरे, सतगुर सत वचन सुनावै।।
आया विराग मिलिआ अविनाशी, जुड़ी जोड़ी सुहावै।।
मन मन्दिर माहे चौ उपजिया, प्रीत प्रभु सँग लाई।।
कहि रविदास सति लांव चौथड़ी, पुरखे पुरख मिलाई।।
                    ।।पाणिग्रहण।।
श्री रविदास ने माला उठाई। सुभागण दे गल पाई।।सब सखियाँ मिल कर आईआँ।तात सुजाने नूँ देणं बधाइयाँ। वापू तूँ हुण सुभागण नूँ दे परणाई। ऐसा वर सुभागण ने जी है पाया। जिन्हा ने सुर नर मुनि जन ध्याया। हुन वेदां दियो करवाई। वेदीं करहि मन्त्र पढ़हि। सुभागण रविदास जी खारीं चढ़हि। फेर धागा पाई होई पराई। संतोख नूँ सुजाना जे उचारे। भले भाग आए साडे दुआरे। कहे दास शरण रघुराई।
             ।।शवद सिखआ दा।।
जे तुसीं साजनो रव नूँ मिलना, गुर की संगत जावो जी।।साध संगत के जोड़े झाड़ो गुरु की टहल कमावो जी।।समझौता सतगुर तुहांनूँ जो कीता तिस ते अमल कमावो जी।।सोहं शबद का सिमरन करके द्सवें द्वारे चढ़ावो जी।।सचा मारग राम मिलन का सुरति सुन्न लगावो जी।।उत्थे अनहद नाद बाजे बजदे अगम देश सुण आवो जी।।मिरदंग मचंग सतार मध्य बजदी मुरली की धुंन पावो जी।।भँवर गुफा विच डेरा ला लओ सोहं सोहं धियावो जी।सच खंड दा खिड़का खुल जाऊ पूंजी सतनाम लावो जी।।ऊहां सब का बैठा सच्चा तख्त बनावो जी।।सुखमन सेजां दी मौज माणो सुरत शवद को वियावो जी।।रविदास प्यारा भेदी मिल के वहुड़ जनम ना आवो जी।।
स्वामी ईशरदास जी महाराज  फरमाते हैं कि, यदि सत्पुरुषो आपको परमात्मा से मिलना है तो गुरु रविदास जी की सँगत करो। सत्पुरुषों के चरणकमलों की सेवा करो, उनकी सेवा करने से मानसिक सुख शांति मिलेगी। सतगुरु ने आपको जो ज्ञान दिया है, उससे समझौता करो, उस पर अमल करो, "सोहम" का सिमरन करने से ही, दसवें दरवाजे का किबाड़ खुलेगा। भगवान के मिलने का रास्ता, शून्य में जा कर मन को एकाग्र करना से ही मिलता है, वहां पल पल अनहद ध्वनि निरन्तर होती रहती है, अनेक वाद्य यंत्र बजते रहते है, उस अगम देश में जा कर सुन लो। "सोहम" शब्द का ध्यान लगा कर, भंवर गुफा को अपना निवास बना लो। ज्यों ही बन्द पड़ी सचखंड की खिड़की खुल जाएगी, त्यों ही, वहां से सतनाम की धनदौलत ले आओ। शून्य में ही अकाल पुरुष बैठता है, उसके लिए वहां तख्त बनाओ। सुख आनंद और ऐश्वर्य से जीने के लिए सोने के लिए विस्तर बनाओ, जिस पर बैठ कर शब्द और सुरत दोनो की शादी करवा लो। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, रहस्यमय आदिपुरुष को पा कर जन्म मरण के बंधनों से मुक्त हो जाओ।
रामसिंह आदिवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर 18,2020।

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