गुरु रविदास और जीवनदास।।
।।गुरु रविदास और जीवनदास।।
गुरु रविदास जी अभी चार कु वर्ष के हुए थे कि, उनकी आध्यात्मिकता के चर्चे कांशी शहर में चारों ओर फैलने शुरू हो गए। धोती तिलक ने ही ब्राह्मण समाज में हाहाकार मचा रखी थी। जब दहिना शंख बजाया तब तो मानो ब्राह्मणवाद के क़िले में ही दावानल भड़क उठी हो। जीवनदास के मन में बालक रविदास के प्रति श्रद्धा तो बहुत हो गई थी मगर कहीं थोड़ा बहुत मन में खोट होगा। एक दिन वह समीप की नदी पर नहाने गया हुआ था। जब वह वापस आती बार, पहाड़ी की चढ़ाई पर चढ़ने लगा तो अचानक घटना घटी:-----
।।शलोक।।
कालू माजरे तउ थोड़ी दूर हाजीपुर पिंड जाण। धारू नाना गुर रविदास दा सवर्ण घड़े आधाण। धारू दा पुत दिआला तिस। का जीवनदास। जनम चौदह सौ चौबी बिकर्मी रिहा गुरां दे पास।।जीवन खिलावै गुरां नूँ नेहचा लई एह धार। दृढ़ जकीना खड़ाऊँणे तउ रविदास गुरु अवतार।।
गुरु रविदास जी के मामे, गाँव हाजीपुर में थे, जो चमार माजरे से थोड़ी ही दूरी पर है।वहां नाना धारू जी ने, उनके लिए सोने के कंगन बनवाए हुए थे, जिन्हें लाने केलिये उनके बेटे दियाला का सपुत्र जीवनदास, वहां गया हुआ था। जीवनदास का जन्म बिकर्मी सम्मत चौदह सौ चौबीस को हुआ था, वह हमेशा गुरु रविदास जी के साथ ही उनका सेवक बन कर रहता था। खिलौने के करिश्में से, उसे गुरु रविदास के ऊपर दृढ़ विश्वास हो गया था।
।।त्रिभंगी छंद।।
इक दिन जीवन गया सी वण नूँ। बैठा अगे भारी सप खलार फण नूँ।।देख के जीवन नठे बाहो दाह जी।पै गया पहाड़ वाले उचे राह जी।। सप ने मगरे छालां सी मारीआं। नठा जांदा जीवन मारे किलकारियां।।उची पहाड़ी वल जीवन चढ़ा है।मोहरे देखे बबर शेर खड़ा है।।जीवन चुका बैठा आस जीणे ते।छड दे, ना देखे ऐह स्वास पीणे ते।। सुखना कई सुखे राम राम पुकारिआ। किसे ने इक ना सुनी, पुकार पुकार वहुत थक हारिआ।। उड़क रविदास वल गया चित जी। होर तां इत्थे नहीं कोई मित जी। तूँ ही मैंनू रख रविदास पिआरिआ।। नाले नठे नाले भजे पेश नहीं जांदीआं।। जद देखे उचे जी पहाड़ ते।बैठे रविदास बाहों फड़ के चाहड़ ते।। जीवन गुरां दी शरण गए लग जी। शेर तां सरप दोनों जांदे भज जी।। इस विध जीवन दी जान सी बचारिया। घर जा के जीवन ने अपनी कथा सी परचारिआ।।
स्वामी ईशरदास जी महाराज फरमाते है कि, एक दिन जीवनदास जंगल को गया हुआ था। रास्ते में एक बड़ा सांप फन को खड़ा करके बैठा हुआ था, जिसे देख कर वह पहाड़ी की ओर भागने लगा, जब वह पहाड़ी चढ़ने लगा तो ऊपर शेर खड़ा था जिसे देख कर वह अपने देवताओँ को याद करके बचाने की फरियाद करने लगा मगर किसी भी देवता ने एक नहीं सुनी अंत में गुरु रविदास जी के करिश्में याद आए और उन्हें याद करने लगा याद करते ही रविदास जी सामने खड़े नजर आ गए, और वे मुझे बाजू से पकड़ कर ऊपर चढ़ा रहे हैं, सांप शेर दोनो ही भाग गए।
।।शव्द मेघ।।
जीवन टेक के चरणां ते मथा आखदा धंन बाबा कलां तेरीआं।। जे मैं याद ना तैनूं करदा मुशकलां ना हल हुंदिआं मेरीआं। अज देखिआ बराट रूप धारिआ ढाई सौ हथ बाहाँ तेरीआँ। मैं तां वेखिआ छोटे तौं बडा हो गया कैलाश उते लाइआँ फेरीआं।। मैनूं रखिआ दोहां दे कोलों आ के शेर सप राह घेरिआं।। सारे छड के सेवांगा मैं तैंनूँ चुरासीआँ कट मेरीआं।। साडा सतिगुर अज तौं वण गया तन मन धन टेरीआं।। कौमा रुलदीआं दाता जी बचा लै हुण तूं क्यों लाईआं देरीआं।।
घर पहुँचते ही जीवनदास ने गुरु रविदास जी के चरणों कमलों पर शीश रखते हुए कहा, धन बाबा तेरियां कलां तूँ ही जानता है। अगर आज मैं आपको याद नहीं करता तो मेरी मुश्किल हल नहीं हो सकती। आज आपका विराट स्वरूप देख कर, मैं हैरान हो गया हूँ। आपने मुझे बचा लिया है, अब मुझे अपने चरणों में लगा लो, मैं सदा आप के चरणों में रह कर आपकी सेवा करूंगा। तब से लेकर जीवनदास औऱ रैदास जी गुरु रविदास जी महाराज के साथ, उनकी सेवा में सदा साथ ही रहे चाहे गुरु रविदास जी कन्याकुमारी गए, श्री लंका गए, कश्मीर गए, ईरान, इराक गए, वे हमेशा उनके अंगरक्षक औऱ सेवादार बन कर ही रहे।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर13, 2020।
Comments
Post a Comment