गुरु रवि जी का उपदेश और करोड़ीमल का क्रोध।

।।गुरु रविदास का उपदेश और करोड़ीमल का क्रोध।
गुरु रविदास जी महाराज ने, शोषक करोड़ीमल को सुधारने के लिए, तीखे प्रहार किए, दिल को छूने वाले शब्द वाण छोड़े, दिल को चीरने वाले खंजर मारे मगर करोड़ीमल, सुन कर बिगड़ता ही गया और अपनी मूढ़ता, मूर्खता और अहंकार से ग्रस्त हो कर, गुरु रविदास जी के उपदेश को समझ नहीं सका और गुरु जी को कहता है, कि तूँ कौन होता हमें सोने और जागने का उपदेश देने वाला? गुरु जी मूर्खों की बुरी बात का कभी बुरा नहीं मानते थे, वे तो अपनी शब्दों की तीखीं धार वाली खंजर से, अल्सर का ऑपरेशन करते ही जाते थे। गुरु जी ने उसे कहा:----
                      ।। दोहा।।
जाग करोड़ी जाग तूँ, अब जागण दा वेला जो। वक्त वेला बीत जाऊ हो जाऊ वहुड़ कवेला जो। दुबारा किहा जाग शाह तूँ जाग क्रोध चढ़ जाई। बीच क्रोध दे आई के शाह ने नोकरां नूँ फ़रमाई।
गुरु रविदास जी के शब्द वाणों से जख्मी हो कर शाह करोड़ीमल पागल हो गया, क्योंकि आज तक कोई भी माई का लाल उसे ऐसे कड़बे शव्द नहीं कह सका था। गुस्से की आग में धधकता हुआ करोड़ीमल अपने नौकरों को कहता है:---
                    ।। शब्द।। 
कहे कड़क के शाह जी नौकरां नूँ धक्के मार के दूर कराओ एथों। कैसा पागल गल्ल साडे ऐह आई पिया छेती नाल बूहे तों कढाओ ऐथों। मैं जागदा सुतियाँ ऐ गलां पागलां वांग सुनाओ ऐथों। आप पागल ते सानूं बनाई पागल धक्के दे के झिड़को हटाओ ऐथों।
गुस्से में तंदूर की तरह लाल हो कर, करोड़ीमल शाह नौकरों को कहता है, इस साधु को धक्के मार कर दूर भगा दो, ये कैसा पागल हमारे गले पड़ गया है, इसे जल्दी से दरवाजे से भगा दो। मैं तो जागता हूँ मगर पागलों की तरह मुझे सोया हुआ बता रहा है। आप तो पागल है ही मगर हमें भी पागल बना रहा है, इसे डांट कर, धक्के मार कर यहाँ से हटा दो। आज्ञा का पालन करते हुए नौकर गुरु जी को कहता है:-----
                    ।। प्रसंग नौकर।।
अरे चल रे चल! वहां से दूर हो जा। अगर किआ वार्तालाप कर रहा है? आंखों से दूर हो!
करोड़ीमल का मूर्ख नौकर अपने मूर्ख आका का हुकम तामील करते हुए कहता है, चल रे! चल! बाबा यहां से दूर चल, क्या बेकार की बातें कर रहा है? हमारी आंखों से दूर हो जा।
                ।। स्वामी जी। शब्द।।
मूर्ख पागल आखदे अनामी बन्दियाँ नूँ। सददे कुराईऐ कई बिगड़े बतांवदे ने परख ना अधियां नूँ। अगनी जलाऊंदे, कई सूली ते चढाऊंदे, कई कैदां बीच फंदियां नूँ। कई चँमा नूँ लहाउंदे जिन्दे गोरां विच पांऊँदे डोबन जल तरंदियाँ नूँ।झिड़कां मार मार घरां चों निकालन लफ़्ज़ बोलदे गंदियां नूँ।
                   ।। गुरु रविदास जी।।
मैं सची बात बतला रहा हूँ!
सोते होय को जगा रहा हूँ।
गुरु रविदास जी करोड़ीमल को कहते हैं, कि करोड़ीमल मैं सच्ची बात कह रहा हूँ। तूँ सोया हुआ है, इसीलिए तुझे जगा रहा हूँ।
                   ।।करोड़ीमल।।
वाह जी! वाह! आप की बड़ी बात अजीब है।
जो जागदा है, उसको जागणे की ताकीद है।।
मूर्ख करोड़ीमल, गुरु जी को उतर देते हुए कहता है कि वाह! भई आप भी बड़ी अजीब बातें कर रहे हो! जो जाग रहा है, उसे जागने की नसीहत दे रहे हो।
           ।।गुरु रविदास जी का वाक।।
होता जे जागता! तो कभी ना कहता जाग तूँ।
सोते होये को कहना पड़ा मगरूर शाहा जाग तूँ।
गुरु रविदास जी धृष्ट करोड़ीमल को समझाते हुए फिर कहते हैं, करोड़ीमल यदि तूँ जागता होता तो हम क्यों कहते , तूँ सोया हुआ है, इसीलिए कह रहा हूँ कि, जाग जा।
                    ।।नौकर वाक।।
अच्छा तूँ जाह! जाह! 
साडे कंन ना खाह!
मूर्ख नौकर भी, गुरु जी को पहचान नहीं सका कि, गुरु जी क्या फरमा रहे हैं?मूर्ख वह भी बदतमीज हो कर गुरु जी को कहता है, अच्छा यहां से चला जा, हमारे कान मत खाओ।
                     ।। बुद्धा शब्द।।
बुद्धा आख़िआ अपने पति तांईं गल सुनी ना उस दी दिल ला के ते। भेद गल दा बिच कोई होवणा सी वेख लैंवदें गल आजमा के ते। किहड़े वेदां दे मन्त्र दसदा सी करोड़ीमल कहे बुद्धा नूँ सुणा के ते। जाग भाई, जाग भाई गल की ऐ करो अपने कंम गल भुला के ते।
करोड़ीमल की पत्नी कुछ बुद्धि की मालिक थी, उसने अपने पति को कहा, आप ने उन साधु महात्मा की बात दिल लगा कर क्यों नहीं सुनी। उसकी बातों का कोई तो रहस्य होगा, अगर आजमा कर देख ही लेते। करोड़ीमल ने पत्नी को कहा, वह कौन से वेदों के मन्त्र पढ़ रहा था? बार बार कह रहा था कि, जाग भाई, जाग भाई, मैं क्या अपने काम को छोड़ कर उसकी बातों को सुनने लगता? करोड़ीमल ने गुरु जी की बात को अनसुना कर के नौकर करमू को कहा कि, क्या कल वाला सामान उसकी जगह पर लगा दिया है करमू ने कहा, हां लागा दिया है। गुरु जी दूसरे दरवाजे से फिर उसे कहते हैं:----
                   ।शब्द।।
करोड़ीमल तूँ सुतिया जागदा ना, अजे बकत है, जाग लै जाग लै तूँ। सभनी आखिया इस नूँ दियो धक्के पुनरप आखदा आई के जाग लै तूँ। बुद्धा आखदी मूर्खो गल सुण लओ जो कुझ आखदा जाग लै, जाग लै तूँ। करोड़ीमल ने आखिया दस खां तूँ किहड़ी गल आखदा जाग लै तूँ।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, करोड़ीमल तूँ अभी सोया हुआ ही है, अभी भी समय है जागने का। जब दूसरे दरवाजे पर भी खड़े होकर, गुरु जी यही कहा, तब भी मूर्ख कहने लगे कि, ये दुबारा यही कह रहा है कि, जाग जा, इसे धक्के मार कर, यहाँ से निकाल दो। करोड़ीमल की पत्नी बुद्धा कहती है, जो ये साधु कह रहा है, उसे सुन तो लो, क्या कह रहा है? ऐसा सुन कर करोड़ीमल कहने लगा, हे खां! बता तूँ क्या कह रहा है? करोड़ीमल के कहने पर गुरु जी कहते हैं कि:-----
                     ।। शब्द सूही।।
जो दिन आवे सो दिन जाही। करना कूच रहिण थिर नाहीं। संग चलत है हम भी चलना। दूरि गवन सिर उपरि मरना। किया तूँ सोया जागिआ ना है, जीवन जग सच कहि जाना।। रहाउ।।
गुरु रविदास जी, ऐसा कह कर तुरंत वहां से चले गए मगर उनके शब्द मगरूर शाह करोड़ीमल के अन्तःकरणों में प्रतिध्वनि उस की मनस्थिति को डांवांडोल करने लगे। गुरु जी की बातें उस के मन में घर करती, करती, घर कर ही गईं।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
सितंबर 28, 2020।
      


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