गुरु रविदास जी और करोड़ीमल का पुनर्मिलन।।

।गुरु रविदास जी और करोड़ीमल का पुनर्मिलन।
गुरु रविदास जी महाराज के विरह में करोड़ीमल अत्यंत दुखी रहने लगा और सिर मार मार कर, पटक पटक कर विलाप करता रहता था कि, मैं ने आजीवन लोगों को लूटा घसूटा, करोड़ों अरबों की धन दौलत इकठ्ठी की, मगर आज तक मुझे रास्ता दिखाने वाला सच्चा गुरु कोई नहीं मिला है, जब मिला तो पहचाना नहीं। होश आने पर सारा धन गरीबों को दान करने लग पड़ा ताकि किसी दिन गुरु रविदास जी महाराज लंगर खाने के लिए अवश्य आएंगे और यहाँ पंक्ति में अवश्य बैठेंगे, ऐसा चिन्तन करते हुए जब, धनदौलत का सारा खजाना खाली हो गया और केवल अंतिम सँगत की पंक्ति को भोजन बांटा जा रहा था, तब अचानक, गुरु रविदास जी भी अंतिम पंक्ति में आ कर बैठ गए, करोड़ीमल ने जब अंतिम पंक्ति को देखा तो, दौड़ता हुआ गया और गुरु रविदास जी के चरणकमलों पर गिर कर कहता है:----
                      ।। शब्द।।
हथ जोड़ के खड़ा लखपति किरोड़ीमल खावो भोजन गुरां दी पिआरी सँगते। तुम हैं खावत हम हैं ख़िलावत, हम हैं नौकर भंडारी सँगते। सतगुरु सागर मिल जाई, मैं मछली आयु जाई गुजारी सँगते। आज भीड़ लगी सी बेअंत, आ गए हैं सतिगुरु अवितारी सँगते।
करोड़पति करोड़ीमल ने ज्यों ही गुरु रविदास जी महाराज को देखा त्यों ही, वह हाथ जोड़ कर लँगर के बीच खड़ा हो कर, सँगत से कहने लगा, गुरु रविदास जी की प्यारी सँगत जी, आप जी भर कर भोजन कर लो, हम गुरुओं के नौकर हैं और हम सब आप को उन की तरफ से लँगर की सेवा कर रहे हैं।मैंने मछली की तरह तड़फ तड़फ कर आयु बिताई है, ताकि भवसागर में सतगुरु रविदास जी मिल जाएं। आज अनंत भीड़ के बीच मेरे प्यारे अवतारी सतगुरु रविदास जी आ गए हैं। गुरु जी को देखकर करोड़ीमल उन के पास आ कर कहने लगा।
                  ।।शव्द।।
विच भीड़ दे देख लई सूरत गुर की लखपति नजदीक आई साहिबां। दंदी घा फड़ के गल्ल पाई पल्ला शीश कदमा उत्ते रखाई साहिबां।मै भुलिया बख्शी दे ओगुणा नूँ मेरी कीतियां भुलां बख्शाई साहिबां।
जब भीड़ के बीच, करोड़पति करोड़ीमल ने, गुरु साहिबां को देखा तो उनके पास आ गया और गुराँ को गले में सरोपा डाल कर, जोरदार जफ्फी डाल कर उनके चरणों पर शीश निवा दिया।हे साहिब! मेरे किये गुनाहों को माफ कर दो,  मैं भूला हुआ हूँ, मेरे अबगुणों को बख्श दो। मुझे मालूम नहीं था कि, आप परिपूर्ण, सर्वज्ञ हो, इस लिये ही मैंने जो कुछ कह दिया था, वह सारा नासमझी के कारण ही कह गया था।
             ।।बेनती करोड़ीमल।।
मैं हूँ भुलिया जगत विहार अंदर मगरूरी चढ़ गई धन परिवार वाली।जदों देखिआ समझ के दूर ताईं बेड़ी झूठी है, डूबणे वाली।तारन वास्ते गुरु मल्लाह बैठे होर झूठी प्रीत है संसार वाली।गुरु सोच के पड़ा हूँ शरण तेरी होर कार ना करन अधार वाली।
करोड़ीमल, अपनी मूर्खता पर पश्चाताप करता हुआ, गुरु रविदास जी के सामने कहता है,कि हे मेरे मालिक! मैं संसार के कार विहार में और धंन परिवार में डूब गया था, जिससे मुझ में मगरूरी अर्थात घमंड छा गया था, जब मैंने, दूर तक देखा, सोचा समझा, तब ज्ञात हुआ कि,मेरे जीवन की नैया झूठी है, जो इस भवसागर में डूबने वाली है। इस नौका को तैरा कर किनारे पर लगाने वाले, आप गुरु ही तो बैठे हुए हैं, बाकी संसार का प्रेम तो झूठा है। हे मेरे सतगुरु! मैं सोच विचार कर ही, आप की शरण में गिरा हूँ, और कोई भी कार्य करने वाला नहीं है, जिस का कोई आधार हो।
                ।।शब्द तारन वाला।।
मेरे सतगुरु मिल गए मैं तां गिआ तर जी। दरशन गुरां वाला कर के नहाता सचे सर जी। जिहनूँ ढूँढदा सां मिल गिआ पिआरा सतगुरु मिले हेड़ी नूँ आ चल कर जी। हिरनी दे संकट गज ग्रही छुड़ा लिआ बांझ मछली पाणी जिवें जांदी मर जी। जिवें पपीहे नूँ मिल गई स्वांत बूंद जो, तिवें मिले रविदास आई रूप हर जी।
गुरु रविदास जी के दर्शन कर के करोड़पति करोड़ीमल, सँगत को कहने लगा, मुझे तो सतगुरु मिल गए हैं, अब मैं भवसागर में तर गया हूँ। गुरु जी के दर्शन कर के, में सत्य के तालाब में तर गया हूँ।जिस प्यारे को तलाश रहा था, वह आज मुझे उसी तरह मिल गया, जिस प्रकार जंगल मेँ गुरु रविदास जी शिकारी को मिले थे।हिरनी के दुख और हाथी को ग्रह से छुड़ा लिया था, पानी के बिना मछली मर जाती है, स्वाति नक्षत्र की बूंद ना मिलने से पपीहे मर जाते हैं, वैसे ही मुझे भी बचाने के लिए, मुझे मेरे हर हर महादेव गुरु रविदास जी मिल गए।
               ।। शब्द।।
मैनूं सुत्ते नों जाऊंण वाला आया सतिगुरु। मैं जनम से सोया था पड़ा दबा सुपने हटाऊँण वाला आया सतिगुरु। मोह ममता को चीकड़ मध डूबा होया हूँ कीच चों कढाऊँण वाला आया सतिगुरु। वेखा कुड़म कबीला परवार झूठड़ा अगे नरक चों बचाऊंण वाला आया सतगुर। करो अर्ज मंजूर मेरे कटो फन्दना सचे मारग लगाऊंण वाला आया सतिगुरु।
करोड़पति करोड़ीमल खुशी में झूमता हुआ कहता है कि, मुझे सोय हुए को जगाने वाला आ गया है। मैं जन्म से ही अज्ञानता की गहरी नींद में सोया पड़ा था, मुझे मेरे सपने से जगाने वाला सतगुरु आ गया है। मैं सांसारिक मोह ममता के दलदल में, कीचड़ में फंसा हुआ था, मुझे इस कीचड़ से निकालने वाला सतगुरु आ गया है। मैं ने देख लिया है कि, सारे कुड़म, कबीले और परिवार सभी झूठ हैं, आगे मिलने वाले नरक से बचाने वाला सतगुर आ गया है। हे मेरे सतगुरु हजूर! मेरी इल्तजा स्वीकार कर लो, मुझे अच्छे रास्ते पर ले जाने वाला और बन्धनों को काटने वाला सतगुरु आ गया है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
सितंबर 30, 2020।

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