गुरु रविदास जी और सेठ करोड़ीमल का वैराग।।
।।गुरु रविदास जी और सेठ करोड़ीमल का वैराग।।
गुरु रविदास जी, अत्याचारियों, मूर्खों, कातिलों, अन्यायियों, पाखंडियों ढोंगियों छलियों, शोषकों का हिरदय परिवर्तन करने के लिए ही, दिन रात प्रयासरत रहे जिसके कारण, उन्हें चाहे कितना भी जलील होना पड़ा, उस की उन्होंने, कभी भी चिंता नहीं की। जब गुरु जी ने, करोड़ीमल के अंतःकरण को झकझोर दिया और झकझोर कर, वहां से तुरन्त आगे चले गए, उस समय की विचित्र मनःस्थिति का चित्रण करते हुए स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 675-676 पर कहते हैं कि:----
।। शब्द ।।
करोड़ीमल शब्दां नूँ सुण के, खियाल डूंगे सोचन लगड़ा दिल ध्यान कर के। गल धसदी धसदी अंदर धस गई, बैठ गई दिल गिआन कर के। आई अकल जां जागणे वाली शाह नूँ साहिब चले गए बिआन कर के। चढ़े टोलण मिले ना किते सतिगुरु हार फ़ार के बैठे अमान कर के।
जब करोड़ीमल, गुरु रविदास जी के शब्दों को सुन कर, गहराई से और ध्यान लगा कर सोचने लगा, गुरु जी की बात उस के अंदर समाती गई और समा ही गई, जिससे उस को गुरु जी के ज्ञान का रंग चढ़ गया, जब उसे जागने वाली अकल आई तब साहिब रविदास जी बोल कर वहां से चले गए। वह गुरु जी को ढूंढने निकल गए मगर साहिबे ज्ञान उन्हें कहीं नहीं मिले और विलाप करते हुए हार फार कर घर बैठ गए सेठ करोड़पति करोड़ीमल विलाप करते हुए कहता है:------
।।शब्द विलाप।।
मेरे पिया नूँ मिला दियो, होया मैं दीवाना। जिह नूँ कहता था दीवाना, सो निकलिया सुजाना, मैं ही निकलिया दीवाना। बूहे हुँदा सी दीदारा। हुण कर गिआ किनारा। जां भेद आया सारा। तां हो गया रवाना। कोई टोल के लिआवो। शरण तिस की लगावो। जनम सुफल करावो। मैं वण गिआ परवाना। मैं मूर्ख का बच्चा। रहि गिआ कचे का कचा। मेरा सतिगुरु सी सचा। कहि ईशर दास बतलाना।।
जब गुरु रविदास जी, करोड़ीमल के लूट के अड्डे से तुरन्त लुप्त हो गए तब, उसे बात समझ आई और ज्ञान हो गया,वह गुरु जी के विरह में विलाप करते हुए रोने लगा और अपने नौकरों को कहता है कि, हे लोगो! तुम मेरे प्रिय को मुझे मिला दो, मैं उस का दीवाना हो गया हूं, जिस को मैं अभी अभी दीवाना कहता था, वही तो सुजाना था। जब मुझे घर पर दर्शन होते थे तब पहचान नहीं सका, अब जब मुझे अकल आई तो वह घर से रवाना हो गया। कोई है तो उन्हें ढूंढ कर ला दो, ताकि उनकी शरण में जा कर जन्म को सफल बना सकूं। मैं तो मूर्ख का बच्चा, अकल का कच्चा ही रह गया, मेरा सतगुरु ही सच्चा था।
।। शब्द आसा।।
।।करोड़ीमल।।
की करना इस धन दौलत माया मालां नूँ। लंगर लगा देवां गरीब कंगालां नूँ। कदे ना कदे पिआरा आऊ सँगती। देखदा रहूं रोज पंगती। शायद मेरा हो जाए मेला इस चालां नूँ। धन ते दौलत किहड़ी संग जाणी ऐ। गुरु ते बगैर जग खेह छाणी ऐ। खाली हाथ जाणा छड धन दुआलां नूँ। सूई तों गिआन होया ना चली नालां नूँ। सब बेकार जब मौत दूत आये कालां नूँ। बेमुख साहिब ते रूप चंडालां नूँ।
करोड़ीमल को जब ज्ञान हो गया तो, वह पागल होकर कहने लगा कि, इस धन दौलत और माल का मैं क्या करूंगा। मैं गरीब कंगालों को लंगर लगा दूंगा। कभी ना कभी वे मेरे प्यारे अवश्य आएंगे। मैं हररोज पंक्तियों को देखता रहूंगा। शायद मेरी इसी चाल से किसी दिन उनसे मेरा मेल हो जाए। धनदौलत कौन सी साथ जाएगी? गुरु के बिंना, मैंने सारी आयु खाक ही छानी है। इन सारी दीवारों को छोड़ कर एक दिन यहाँ से जाना ही तो है। लंगर के बहाने किसी ना किसी दिन भगवान के दर्शन अवश्य ही होंगे।
।। शब्द।।
करोड़ीमल ने सोचिआ दिल अंदर, खोटी कौड़ी भी संग ना जावणी ऐ। सदाबरत नूँ ला दियाँ, रव लेखे गुरु मिलन दी ओट तकावणी ऐ।पत्नी बुद्धा आखिया कर दान पुंन शाहजी गुरु नाम बिन गत ना पावणी ऐ। कहे दास सदाबरत तां लाई दित्ता हथीं अपणी सेवा जो करावणी ऐ।
वैराग में लीन करोड़ीमल शाह ने, मन में सोचा कि, मरने पर एक कौड़ी भी साथ नहीं जाएगी। मैं गरीबों के लिए, सदाव्रत लगा दूंगा, जिस के कारण, उनसे मिलने की, मेरी इच्छा बनी रहेगी। पत्नी बुद्धा ने कहा कि, शाह कुछ दान और पुंन का काम कर ले। करोड़ीमल शाह ने, उसी दिन से सँगत को सदाव्रत लगा दिया, ताकि सतगुरु रविदास जी किसी ना किसी दिन उनके लंगर में आ कर, भोजन खाते हुए मिल जाएंगे।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
सितंबर 29, 2020।
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