गुरु रविदास और आत्मा की परमात्मा से दूरी।।
।। गुरु रविदास और आत्मा की परमात्मा से दूरी।
गुरु रविदास जी महाराज ने अपनी भक्ति की शक्ति से आत्मा और परमात्मा के अंतर, रहस्य और दूरी को जान लिया था। आत्मा परमात्मा की दूरी धरती और आकाश, धरती और सूर्य, धरती और चांद की दूरी के समान है, जिसका अनुमान केवल सच्चे साधकों को ही होता है, जो आज की डेट में, एक भी नहीं मिलता है। साधु सन्त केवल अपने पूर्वज गुरुओं, पीरों के डेरों का निर्माण करके, उनके नाम से अपने पेट और परिवार का पालन करते जा रहे हैं, कुछ उनके ड्रामों का लाभ उठाने वाले, उनकी टांगों की मालिस करके, केवल अपना उल्लू सीधा करते जा रहे। कुछ गुरुओं के मंदिरों में तो ब्राह्मण ही, पुजारी बन कर, गुरु जी का झूठा यशोगान करते हुए, चमारों की गुप्तचरी का काम करके, भेड़ की खाल पहन कर भेड़िये बने हुए हैं और पूरी सी आई डी ब्राह्मणवाद को देते आ रहे, कुछ तो चमार साधु सन्त ब्राह्मणवाद के दुमछुल्ले बनकर उनसे धन ऐंठ कर, गुरु रविदास जी के समाज को धोखा देते आ रहे हैं, मगर गुरू जी की टेढ़ी आंख उन पर पूरी नजर बनाए हुए है, ज्यों ही उनका बुरा समय आता जाएगा, उनका भांडा फूटता जाएगा और उनका सर्वनाश भी होता ही जाए गा। अकेले गुरु रविदास जी ने शूद्रों की डूबी हुई नैया की पतवार अपने हाथों में लेकर, डूबती हुई नैया किनारे लगाई थी, जिस के बारे में गुरु जी फरमाते हैं:---
।।शव्द राग सोरठ।।
जब हम होते तबहिं तूँ नाहिं।
अब तूं है, तो मैं नाहिं।।
अघम अगम ज्यों लहरि महाउद्धि,
जल केवल जल माहिं।।
माधवे किआ कहीए भ्रमुहि ऐसा,
जैसा मानिए होइ ना तैसा।।रहाउ।।
नरपति एकु सिंघासनी सोईया,
सुपने भईया भिखारी।।
अछत राजु बिछुरत दुखु पाईया,
सोउ गति भइया हमारी।।
राउ भुइंग प्रसंग जैसे होहि,
अब कछु मरमु जनाईया।।
अनिक कटिक जैसे भूलि परे,
अब कहते कहनू ना आईया।।
सरवे एकहू अनेके सुआमी,
सभ घट भोगवै सोई।।
कहि रविदास हाथ पैर नै,
सहजे होइ सु होइ।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि,जब हम होते थे, तब आप नहीं होते थे, अर्थात जब तक हम आप को जानने केलिए संघर्ष नहीं करते थे, साधना नहीं करते, एकाग्रता से ध्यान नहीं लगाते, सोहम सोहम जाप करके श्वास को नाभि से दसवें द्वार तक नहीं ले जाते, तब तक आप के दीदार नहीं होते थे, जैसे कि मीराबाई को उपदेश देते हुए गुरु रविदास जी उसे समझाते हैं:----
।।शब्द।।
आह लै कूंजी शव्द दी मीरां,खोल बजर कबाड़े नूँ। उलटि गंगा चलादे,नाभों चढ़ा दे दसवें द्वारे नूँ।।शव्द सूरत एक जूझ करके ।अगाड़ी मुरत गुर की धरके।तूँ तां बेख लै मध बड़ के।सरव जोत नजारे नूँ।।इड़ा पिंगला सुखमना नाड़ी।तोड़ सन्ध तिन्हां दी भारी। नाल शव्द दे करके यारी।
लटाके छड दे सारे नूँ।।मुसलसी आलम हुतल छोड़। सुन्न महासुन्न सुरत को जोड़।आलम हुतल वल चल दौड़। सच खण्ड कर लै दीदारे नूँ आगे धुन बांसुरी दी आई।तिस धुन में तूँ सुरत लगाई।
अलख अगम अनामी जाई। पा लै मरतबे भारी नूँ।।रविदास सुरत चढ़ावे। जैहरों अमरत मीरां अघावे। जीवत मरन अलोप हो जावे। झूठे छड संसार नूँ।।
स्वामी ईशरदास जी महाराज, के शब्दों में गुरु रविदास जी फरमाते है कि, हे मीरां ! शव्द रूपी चाबी लेकर अपने हिरदय, मन के बजर कपाट को खोलने केलिए, नाभि से श्वास को चढ़ा कर दसवें दरबाजे तक ले जा, शव्द और सुरत को एक जोड़ा बनाकर, आगे गुरु की मूर्ति रखकर, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की पक्की दीवार को तोड़कर, शव्द के साथ दोस्ती करके, संसार के सारे धन दौलत को त्याग दे। सुन-महासुन में अपना ध्यान एकाग्र करके सचखंड के दीदार कर ले। उसके आगे तुझे बांसुरी की आवाज सुनाई देगी, उसी अनूठी धुन में अपनी सुरती को लगाकर अनामी, अदृश्य, अगोचर आदिपुरुष के दर्शन कर ले। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, ये सुनकर मीराबाई, सुरती को ऊपर चढ़ाकर जहर को भी पी लेती है, जो अमृत बन जाता है और असत्य संसार से विरक्त होकर, मीरा जीते जी मर कर लुप्त नहीं होती है अर्थात विश्व में अमर हो जाती है।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, जब कोई जीते जी मरता है, तभी अजर अमर आत्मा और परमात्मा के बीच की दूरी समाप्त होती है और तभी जीव की आत्मा, परमात्मा में समरस और विलीन होकर, एकेश्वर बन जाती है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
सितंबर 23, 2020।
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