गुरु रविदास जी और वासनामुक्त जीवन।।

।।गुरु रविदास जी और वासनामुक्त जीवन।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, आजीवन आदर्श जीवन जिया और जीने केलिये जीवन मूल्य भी निर्धारित किए, जिसका मुकाबला कोई कवि, लेखक आज तक करता हुआ नजर नहीं आया, कोई इश्क की पूजा करता हुआ मिलता है, कोई मुश्क का ही राग अलापता हुआ नजर आता है, कोई विरला ही साहित्यकार ऐसा हुआ है, जिस किसी ने बहुआयामी सामाजिक जीवन मूल्यों को अपने लेखन का लक्ष्य मानकर लिखा हो, जिन्होंने इन्हीं मूल्यों को दृष्टिगत रखते हुए लिखा है, वे ही आज स्मरणीय हैं, वही पूजनीय है, वही ज्योतिर्लीन होकर भी समाज को सही दिशा की ओर ले जा रहे हैं।आज हम गुरु नानकदेव जी, नामदेव जी, कबीर साहेब, सेन जी, सूरदास जी, जयदेव जी, मलिक मुहम्मद जायसी, कुंभनदास, मीराबाई, सूर्यकांत निराला आदि साहित्यकारों को इसीलिए सम्मानजनक तरीके से याद करते हैं। इन्होंने जाति, धर्म से ऊपर उठकर लेखनी चलाई, सामाजिक बुराइयों पर प्रहार किए और जनजीवन को सुधारने के लिए प्रयास किए। अधिकतर साहित्यकार पहले सामाजिक ऐश्वर्यों का भोग लगाते हुए, ये उस समय धर्म कर्म की ओर उन्मुख होते नजर आते हैं, जब उन्हें पाँव कब्रगाहों की ओर जाते नजर आते हैं मगर गुरु रविदास जी ने जन्म लेते ही अंधों को दृष्टि देकर सामाजिक दुखों का निवारण करना शुरू कर दिया था। जितना साहित्य मिलता है उस में कहीं भी वासना की बू नजर नहीं आती है। उन्होंने चारों ही वर्णों की भुखमरी, लाचारी, व्याभिचारी नजदीक से देखकर उनका निराकरण करने का बीड़ा उठाया और उसी कड़ी में वे कहते हैं:----
                       ।।दोहा।।
सत सन्तोष अरु सदाचार, जीवन को आधार।
रविदास भये देवते, जोउ तिआगो पंच विकार।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, जिस इंसान के जीवन मे सन्तोष और अच्छे अचार विचार होते हैं, जो काम क्रोध मोह, अहंकार लोभ आदि पाँच विकारों को छोड़ कर जीते हैं, वही देवता कहलाते हैं, जब कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश, राम कृष्ण ही नहीं वैदिक ऋषियों में भी ये विशेषताएं देखने को नहीं मिलतीं हैं। देवता केवल हवा में रहने वाले ही नहीं होते हैं बल्कि वे आदमी ही देवता होते हैं, जो आठ प्रकार के अबगुणों और पाँच विकारों से दूर रहते हैं और अपनी सँगत को भी दूर रखते हैं।
                   ।।दोहा।।
जोउ वश राखै इन्द्रियाँ, सुख दुख समझि समान।।
सोउ अमरित पद पाइओ, कहि रविदास बखान।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, जो लोग अपनी पाँचों इन्द्रियों को वश में रखते हैं, खुशी गमी में सम रहते हैं, वही संसार में रह कर श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करते हैं।
बुद्धि अरु बिबेकहिं, जोउ कोउ राखन चाहु पास।।
इन्द्रियाँ संग निरत कोउ, तिह तजि देहु रविदास।।
रविदास इच्छाएं आपुनी, भोजन सेंऊ रख दूर।।
मन बुद्धि रहन्हि सांत, नित घट माहिं रहिवे नूर।।
कूरमे भांति जो रहहिं, मनहि इन्द्रियाँ रविदास।।
सांत रहहि नित आत्मा, बढ़हि आत्म विशवास।।
जोउ कोउ लोरै परम सुख, ताउ राखै मन संतोष।।
रविदास जहां संतोष है, तहाँ ना लागै कछु दोष।।
धन संचय दुख देत है, धन तिआगे सुख होय।।
रविदास सीख गुरुदेव की, धन मति जोरे कोय।।
सच्चा सुख सत धरम माहिं, धन संचय सुख नाहिँ।।
धन संचय दुख खान है, रविदास समुझि मन माहिं।।
रविदास सत इक नाम है, आदि अंत सचु नाम।।
हनन करि सब पाप ताप, सत सुखन की खान।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, सर्वसमाज को गुरु रविदास जी ने, विश्व को मर्यादाओं में रह कर जीना सिखाया है। उन्होंने कहीं भी वासना की दुर्गंध किसी भी छंद-बन्द में आने ही नहीं दी। गुरु जी की समस्त संत मंडली ने, अपने साहित्य में, केवल समाज सुधार, जालिमों की गुलामी से निजात पाने के लिए कलम चलाई और उसी के परिणामस्वरूप, आज भारत के मूलनिवासियों में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर 25, 2020।

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