गुरु रविदास के वंशज ही आध्यात्मिक शक्ति संपन्न हुए हैं।।
।।गुरु रविदास के वंशज ही आध्यात्मिक शक्ति संपन्न हुए हैं।।
गुरु रविदास जी की वंशावली, पर नजर डाली जाए तो ज्ञात होता है कि, यही ऐसा वंश हुआ है, जो आदिकाल से आध्यात्मिक शक्ति संपन्न हुआ है। भारत देश में जब से यूरेशियन आए हैं, तब से कहीं कोई यूरेशियन, ऐसा नजर नहीं आता है जिसमें गुरु रविदास जी के पूर्वजों, वंशजों की तरह आध्यात्मिक शक्ति नजर आती हो, मगर भारत के मनुवादी लोगों ने, जोरासीनी कर के, गुरु जी रविदास जी के वंशजों के मंदिरों पर, हेराफेरी और छलबल से अपना आधिपत्य जमा लिया है। चौरासी सिद्ध, अज्ञात समय से भारत की धरती पर अपनी दिव्य शक्ति के केंद्र बने हुए हैं, जिन के मालिक मनुवादी बन बैठे हैं, ये लोग चार पाँच हजार वर्ष पहले भारत आए थे, फिर ये सभी सिद्धों के पुजारी किस प्रकार बन बैठे हैं, पुजारी तो आदिकाल से ही मन्दिरों के थे, फिर चार पांच हजार वर्ष पहले आने वाले यूरेशियन किस प्रकार, गुरु रविदास जी के पूर्वजों के धर्म स्थलों पर जमे हुए हैं? इस विषय पर वहुत कम चिन्तकों ने, आज तक गहराई से चिंतन किया है। मैं वचपन में अपने कुलदेवता लखमन सिद्ध को मत्था टेकने जब पहली बार गया था तो, मेरे पिता जी ने, वहां के मनुवादी पुजारी के घर से पूर्व ही, सौ मीटर की दूरी पर अपने जूते खोल दिए, तब बिना जूते के ही, उस पुजारी के घर जा कहा, बजीआ जी (मालिक) पाँव पौंदे (पैरों पर गिरना) पुजारी ने जबाब दिया, ओए! भला हो! पिता जी ने कहा, हमने मंदिर में रोट चढ़ाना है, चलो मंदिर में। पुजारी उठा और आगे आगे चल दिया। मंदिर में जा कर, पुजारी ने हमारा रोट चढ़ाया और मेरे पिता जी को वापस कर दिया और खुद जरा भी नहीं खाया। जो सूखा अनाज था वह अपने घर ले गया। मैंने पिता जी से पूछा, पिता जी इस पुजारी ने सूखा अनाज रख लिया मगर हमारा रोट क्यों नहीं रखा? पिता जी ने उत्तर दिया, ये लोग हमारे हाथों का छुआ हुआ नहीं खाते हैं, मैंने फिर पूछा तो फिर गेहूं भी तो हमारी थी, उसे भी हमने छूआ था, उसने वह क्यों रख ली? पिता जी कहा, बेटा, ये हमारा पकाया हुआ नहीं खाते मगर सूखा हुआ ले लेते। मैं भी पिता जी की बातों से संतुष्ट हो गया, कि ये मनुवादी अपनी श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए ही रोटी बेटी का संबध नहीं बनाते है मगर जब इन्हें खाने को कुछ नहीं मिलता था, तब ब्राह्मणवादी लोग कोई छुआछूत नहीं करते हैं, एक बार जब अकाल पड़ गया था,तब ब्राह्मण मेरे दादा जी से, अन्न उधार लेकर खा लेते थे। एक बार अकाल पड़ा हुआ था, मेरे ही गाँव के एक ब्राह्मण ने मेरे दादा जी को कहा कि, हमारा अनाज खत्म हो चुका है, इसलिए दो दिन से खाना नहीं खाया है। दादा जी ने कहा, बजीआ (मालिक) आटा आप के घर पँहुच जाएगा। दादा जी ने दादी को कहा, कि तुम जाओ, दो मन मक्की घराट ले जाओ और आटा पिसा कर बजिए के घर छोड़ आओ। दादी ने, दादा जी के हुक्म की तामील की और दादी ने आटा घराट में पिसा कर सीधे ब्राह्मण के घर पंहुचा दिया, मगर रास्ते में गाँव के ब्राह्मण, दादी को पूछते कि, तूँ क्या देकर आई? दादी ने कहा, बजीआ इन्होंने गेहूं घराट में, पीसने के लिए छोड़ी थी उसी आटे को छोड़ कर आई हूँ।
मैं दादा जी की इस मानवतावादी सोच पर हैरान हुआ कि, मदद भी करो, मगर वह भी डर डर करो, उधर जब ब्राह्मणों को जरूरत हो तो कोई छुआछूत नहीं, जब रोटी बेटी का संबध बनाना हो तो हम अछूत।
एक दिन एक ब्राह्मणी रोती, चिल्लाती हुई हमारे घर आई और कहने लगी, मुझे वहुत बड़ा फोड़ा हुआ है जिससे मैं मरी जा रही हूँ, देखो क्या हैं इस में। मेरे पिता जी ने, मेरी माता जी को कहा, जाओ चमार गठा पीस कर लाओ, माता जी चमार गठा पीस कर लाई और उस ब्राह्मणी के फोड़े पर पेस्ट लगा दिया और उससे कहा कल फिर आना। ब्राह्मणी लेप चढ़ा कर अपने घर चली गई, दूसरे दिन फिर कराहती हुई चली आई और बोली, मैं ने रात बड़ी मुश्किल से काटी बड़ी दरक दरक हो रही है। माता जी ने ब्राह्मणी के फोड़े को देखा और नेहारनू से फोड़े को चीरा लगा दिया, जिससे उस के फोड़े से पस की धार बहने लगी, जैसे जैसे पस निकलती गई, ब्राह्मणी की चीखें बन्द होती गई, तब उस ब्राह्मणी को चमार से कोई करंट नहीं लगा।
राखी वाले दिन ही, सिद्धों की पूजा के नाम पर, हमारे लोगों को भीख मांगने के लिए विवश किया हुआ है। अछूत भी खुशी खुशी इन दस दिनों तक सिद्धों की स्तुति में घर घर जा कर, सिद्धों की स्तुति में मंडलियां गाते हैं, जिस के बदले में मनुवादी उन्हें भीख देते हैं, कपड़े, टललू पैसे देकर, उन्हें जिंदा रहने के लिए पेट भरने के लिए अनाज भी देते रहते ताकि भिखारी बन कर इन का मोराल गिरा रहे और हमारे दास बन कर बेगारें भी करते रहें। एक बार जब मेरे गाँव के दादे, चाचे, ताये एक गाँव में अपने ही सिद्ध की स्तुति में भक्ति गीत गा रहे थे तो एक राजपूत ने मेरे दादा को कहा कि, चेला जी आज लखमन सिद्ध को बुलाओ अन्यथा हम आप को कुछ नहीं देंगे। दादा ने कहा, आप ही बुला लो, आप ही तो बड़े लोग हैं। राजपूत ने कहा, हमारे कहने से नहीं आता है, हमने कई बार प्रयास किये। दादा जी बोले बजीआ, जब लखमन सिद्ध जी आएंगे तब डरना मत। दादा जी की मंडली ने बाबा लखमन सिद्ध की स्तुति में, भक्ति गीत गाना शुरू किया, मंडली ने बड़े पूजा भाव से लखमन सिद्ध की रचना गाई, गाते गाते ही सिद्ध भयानक नाग का रूप धारण करके,पीछे पीछे कई छोटे छोटे सांपों की जमात लेकर प्रांगण से गुजरने लगे, राजपूतों के होश उड़ने लगे मगर दादा जी ने कहा, कि कोई कुछ नहीं बोलेंगे, लखमन देव धीरे धीरे दर्शन देकर चले गए। ईस दृश्य को देख कर सभी दंग रह गए, जिस देवता के वे लोग पुजारी थे वे उस सिद्ध को बुला नहीं सके, जिस सिद्ध के नाम पर वे ठगी करके खाते हैं, उसे वे देख तक नही सकते मगर जो उनके साक्षात्कार कर लेते, फिर वे अछूत, ऐसा क्यों? ऐसा इसलिये कि, अछूत ही दैवी शक्तिसंपन्न होते है, सत्य, ईमानदारी अछूतों में ही मिलती है, योग्यता अछूतों में ही मिलती है।
उपरोक्त सभी कथाओं से साफ ज्ञात होता है कि, पहले भी भूख लगने पर हमीं इन के काम आते थे, फोड़ा के दर्द की बीमारी के लिए इलाज कराने के लिए हमीं याद आते थे, फिर साक्षात देवताओं के दर्शन करने के लिए, अछूत ही काम आते है मगर मगरमच्छ तो मनुवादी ही बने हुए हैं, जब गंगा में पत्थर तैराने थे, तो गुरु रविदास, जब पत्थर की मूर्ति को नदी में नहलाना था, तो गुरु रविदास, जब खून का एक जैसा लाल रंग देखना था, तो गुरु रविदास, जब उलटी गंगा बहती देखनी थी, तो भी गुरु रविदास, मगर जब महाऋषि चेतनानंद, को मरवाना था तो दुर्योधन, जब एकलव्य को मरवाना था तो गुरु द्रोणाचार्य, जब कंस को मरबाना था, तो अछूत कृष्ण यादव जब महाऋषि शंबूक जी और सम्राट रावण को मरवाना था, तो हमारा ही सूर्यवंशी राम, जब अंवेदकर को मरवाना था, तो ब्राह्मण पत्नी, जब साहिब कांशीराम को मरवाना था, तब भी घात की नीति से अछूतों को ही प्रयोग किया गया।
उपरोक्त अछूत महाऋषियों की साधना का फल ब्राह्मणवाद ही उठाता आया है, सच्ची शक्तियों का भय दिखा कर, भोलीभाली साध सँगत को लूटने के, काम मन्दिरों में बैठे पुजारी करते हैं, जबकि उनके पास कोई दैवीय शक्ति कभी प्रकट नहीं होती है। जो देवता दैवीय शक्ति संपन्न हुए हैं, जिनके मंदिर बने हुए है, उन के वंशजों को मन्दिरों में प्रवेश बन्द हो गए हैं, चौथे पौड़े का भगवान सम्राट शिव ही शक्तिसंपन्न हुए हैं मगर उनके मन्दिरों पर कब्जा मनुवाद का है, केवल भगवान श्री सिद्ध चानो और उनकी पत्नी लोना चमारी उर्फ कामाख्या, और गुरु रविदास जी के मंदिर ऐसे हैं जहां पर अछूतों का अधिपत्य नजर आता है, वह भी इसलिए कि, इन्होंने अपने नाम के साथ चमार शब्द लगाया हुआ है, अन्यथा ये भी विष्णु के ही अबतार घोषित किये गए होते और हमारा इतिहास दफन हो गया होता।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर 24, 2020।
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