गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।।
।।गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।।
।।भाग एक।।
गुरु रविदास जी महाराज, ने अपने सारे सामाजिक दायित्वों को पूरे मान मर्यादा में रह कर निभाया। कहीं कोई जीवन चरित्र पर उंगली ना उठा सके, उसी ढंग से सारे कार्य कलापों को समय समय पर किया, अपने माता-पिता के सदा आज्ञाकारी रहे और उनके साथ संयुक्त परिवार में जीवन यापन किया, जब गुरु रविदास जी सत्रह वर्ष के हो गए तब बाबा कालू जी ने अपने सन्तोषदास जी से सलाह मशबरा करके, सगाई और शादी एक ही दिन में करना सुनिश्चित कर लिया, जिसे गुरु रविदास जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। स्वामी ईशर दास जी ने गुरु रविदास महाराज के पवित्र पाणि ग्रहण का वर्णन अपनी कलम से बड़े सुंदर ढंग से किया है:----
।।शलोक।।
चौदह सौ पचास बिकर्मी सँग्रांद जेठ की आई। श्री गुरु रविदास की इस दिन होई सगाई।। मिर्जापुर सुजाने की सुंदर सुता सुभागण तिस का नाम। तिस सँग शादी गुरां दी, सँगतां मिल आइयाँ शाम।।
गुरु रविदास जी शादी सत्रह साल की आयु में, गाँव मिर्जापुर के सुजान नामक व्यक्ति की लड़की सुभागन के साथ हुई थी। शादी के समय स्त्रियों ने घोड़ियां गाईं थी, जिस का एक उदारहण निम्नलिखित है:----
।।घोड़ियाँ।।
तूँ तां सिमरे सचे पैहले राम नूँ। गावण आ नारियाँ सब शाम नूँ। बलिहारै गुरु हे।।तेरे सोहरड़े धागा आई गया।सभनी रल्ल के साहा रखाई लिया।बलिहारै गुरु हे।।मल्ल बटणा तेरे लाउंदियाँ।तेल बटणे दे गीतां नूँ गाउँदियाँ।बलिहारै गुरु हे।। हथ कंगना मुंडे दे बन्ह (बॉन्ध) लिआ।जोड़ा जामा मामे ने मन्न लिआ।बलिहारै गुरु हे।।हथ मेंहदी मुंडे दे लाई लई।भाईचारे नूँ सारे बंडाई (बांट) लई।बलिहारै गुरु हे।।सेहरा पंजवाँ मुंडे दे लाई लिआ।तेरी भावस सुरमा पाई लिआ। बलिहारै गुरु हे।। पखा भैण तेरी ने झुलाया वीरा।फिर इंजड़ा नामक (खिलौना) भैंणा ने फड़ाया वीरा।बलिहारै गुरु हे।।गावो घोड़ी मुंडे दी गाई लवो।सारे शगन मुंडे दे मनाई लवो।बलिहारै गुरु हे।।
स्त्रियां एक महीना पहले ही गुरु रविदास जी के घर आ कर शाम को घोड़ियां गातीं थी, वे सभी पहले आदिपुरुष का नाम लेती थीं, उसके बाद, वे कहती है कि, गुरु जी के सुसराल से, हाथ में कंगन बांधने के लिए, शगुन का धागा आ गया। नारियां गुरु जी को तेल से तैयार बटना मल मल कर गीत गाती हैं।
।।बटणा ।।
।।शवद जिला।।
नी सखियो लाऊ बटणा अज बटणे दा दिन आया।गुरु का वाक वासना बटणा गिआन के साथ नुहाया।। सुरत की थाली जौऊ की जिंदगी बुध तेलिआं तेल मलाया।।सतिसँग फ़टड़ी हेठ रखा के नोउ निद्धियाँ झुरमुट पाया।।रवि सुहागन के मंगल गाए सुरत सुहागन शवद सुनाया।।विराग विवेक संगी जँज चढ़ावे शवद विआमण आया।। ईशरदास भने निज शुकर गुजारो हरि के काज सुधाया।।
स्त्रियां आपस मे कहती हैं, नी सहेलियो आज बटना लगाने का दिन है, आओ, आकर मिलकर, दूल्हे को बटना लगाओ,
।।मेहंदी शबद पहाड़ी।।
नी रंग मैंहँदीए चंदन दा बूटा सदावे।हर शादी में मौली मेंहदी तूँ पहिलां ही कंम आवे।रंग रँगीली दस्ती लगदी तूँ शोभा चौगुनी पावे।।बूटा छुटेरा रंग चंगेरा तेरे गीत घरों घर गावे।।ऐसा हरि ने बूटा बणाया तूँ सब दे जी भावे।।तेरे बाझों रुस रुस जांदे जिस दे तूँ ना आवे।।मेंहदी दे रंग पत है रविया रगड़े ते चढ़ जावे।।तियूँ हरि का रंग हरतन वसदा सतिगुर जाहर करावे।। ईशरदास प्रणवै नाम दी मेंहदी क्यों ना रंग चढ़ावे।।
गुरु जी को मेहंदी लगाती हुई नारियां गाती हैं, कि, हे सहेलियों लाल रंग लगाने वाली मेहंदी का बूटा चन्दन का ही पेड़ लगता है।ये मेंहदी और मौली (कंगन बांधने की लाल रंग की डोर) सब से पहले काम आते हैं। ये रंग रँगीली जब हाथों में लगती है, तो बड़ी शोभा देती है। इस का बूटा छोटा सा होता है मगर इसके गीत घर घर मे गाए जाते हैं। जिसे ये नहीं दी जाती है, वे सभी रूठ जाते हैं। इस के पत्तों में लाल रंग छुपा होता है, जो रगड़ने से हाथों में चढ़ जाता है, वैसे ही ईश्वर का रंग होता है, जो प्रत्येक शरीर में छुपा रहंता है, जिसे केवल सच्चा गुरु ही प्रकट करता है। स्वामी ईशरदास महाराज फरमाते हैं कि, ऐसे ही नाम की मेंहदी होती है फिर क्यों नहीं आत्मा में ईश्वरीय रंग चढ़े।
।।शवद पड़साई।।
तेरी पत रख लऐ भगवान कपड़े पाऊंण वालिआ।तूँ लाड़ा जँज उतारे।पाके कपड़े नूँ सँवारे।तेरे बैठे कोल पिआरे।सेहरे लाऊन वालिआ। पाके कपड़े सेहरे लाई।भावस सुरमा पावन आई।हूण कर लउ जँज चढ़ाई।पडसाही करवाऊंण वालिआ।।
नारियां, गुरु जी की इज्जत रखने के लिए, ईश्वर से प्रार्थना कर रही हैं कि, हे कपड़े पहनने वाले दूल्हे आप की इज्जत भगवान रख ले, कपड़े और सेहरा (मुकुट,) पहनाने वाले सभी लोग आप के पास बैठे हुए हैं। आप की भाबी ने आंखों में सुरमा डाल दिया है, अब बारात लेकर, सुसराल के लिए, प्रस्थान कर दो।
।।शवद मिलनी।।
तुसीं मिलनी करो करो अज दोई कुड़म मिल मिल के।।हथ रुपिया देवो तुसीं दोवें गोडी निम निम के।।मिलनियाँ दोवें करो करो कुड़म मामे दियाँ गिन गिन के।।
गुरु रविदास जी की बारात गाँव मिर्जापुर पहुँचते ही, उनके पिता सन्तोषदास जी की मिलनी हुई, दोनों कुड़म(समधी) झुक झुक कर मिलनी करते है, एक दूसरे के सिर पर दो दो रुपयों के उआरन्डे करते हैं।
।।शवद।।
मेला मिलनी दा, मिलनी दा, मेल लवो महाराज।। निरधन सरधने के जी ठाकर सभ दे सारे काज।।नरसी बांगर काज सुधारे भगतां दी रख लई लाज।। मीरां वांगूं लाज रखाई दो दिन टली आँ आज।।जो कुझ मिलनियाँ होइआँ साजनो सारा एहो दाज।।
नारियां सुरीली लय में, गाती हुई कहती हैं कि, आज मिलनी की मेला लगा हुआ है। हे महाराज! भगवान, आप सभी अमीरों और गरीबों के कारज संवारते हैं।नरसी की तरह भगतों की इज्जत रख लेते हैं, नारियां गुरु जी को सुनाती हुई कहती हैं, जितनी मिलनियाँ हुई हैं, महाराज, यही लड़की वालों का दहेज है।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर 16 , 2020।
नोट:---कृपया सभी साध संगत जी इन्हीं नियमो के अनुसार अपने घरों में शादी विवाह करें क्योंकि आजकल दो दो बार शादियां हो रही, पहली अर्द्ध शादी रिंग सेरिमनी के दिन, उस दिन भी दोनों तरफ से रिश्तेदारों को बुलाकर खर्चे में डाला जा रहा, फिर दूसरी बार बुलाकर रिश्तेदारों को खर्चे में डाला जा रहा, एक बार जयमाला करते समय शादी की रश्म हो रही, दूसरी दूल्हे दुल्हन को वेद में बैठाकर शादी की जा रही तीसरी लड़की बालों की पूरी की पूरी बारात लड़के वालों के घर जा रही है, जो आदिधर्म के रीति रिवाजों के खिलाफ है दूसरा व्यर्थ का खर्च हो रहा है। इन्हीं रश्मों से विवाह किए जाएं ताकि वहुजन समाज में प्रकृति और सत्य को आधार मानकर ये कार्य संपन्न हों।
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