गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।।

        ।।गुरु रविदास जी का पाणिग्रहण।।
                  ।।भाग पाँच।।
गुरु रविदास जी महाराज की शुभ बारात वापस मिर्जापुर से अपने गाँव चमार माजरे वापस पहुँच गई। बुआ रतनी और माता दियारी ने बड़े चाब के साथ नव दंपति की, दरबाजे पर आरती उतारी और सहेलियों के साथ गीत गाती हुई वे दूल्हे और दुल्हन, को गृह प्रवेश करवाया। परिवार और सभी सगे संबधियों ने अपने सारे सामाजिक दायित्वों को पूरी मान मर्यादा में रह कर ही पूर्ण किया और अपने दायित्वों को निष्ठा से निभाया ताकि कहीं कोई जीवन चरित्र पर उंगली ना उठा सके, उसी ढंग से सारे कार्य कलापों को समय समय पर किया गया, गुरु रविदास जी हमेशा ही अपने पूज्य मातापिता के सदा आज्ञाकारी रहे और उनके साथ संयुक्त परिवार में ही जीवन यापन किया, स्वामी ईशरदास जी ने गुरु रविदास जी के पवित्र पाणिग्रहण का वर्णन अपनी कलम से बड़े ही सुंदर ढंग से किया है:----
                  ।।शलोक।।
,चौदह सौ पचास बिकर्मी सँग्रांद जेठ की आई।श्री गुरु रविदास जी की इस दिन होई सगाई।। मिर्जापुर सुजाने की सुता सुभागण, तिस का नाम। तिस सँग शादी शुदा गुरु जी मंह, साठ शवद पढ़े आम।। शवद वाणी करदियाँ वेदां लइयाँ कराए। मुड़ कर मिर्जापुर ते कालू चमार माजरे आए। दियारी संतोखी भानी जी घुरबिनी मेलणा नाल। सुभागण खड़ी टोलियों पढ़न शवद ना कढं गाल।। कर अरदासां बंड मठिआई मेल गेल सब गिआ। लगी सलामी सतिगुर नूँ ऊपर सखाँ रखियाँ।। सुभागण गुर की आगिआ बीच रैंहन्दी सी दिनरात। पतिव्रत धर्म बिच पके मन, कभी बोले ना कड़बी बात।।घर बिच कम कार दी सुचि, आए गए दी सेवादार। सब नूँ मीठी बोली बोले जो सुणे  कहिण बलिहार।। गुर से नाम नूँ लई के, रोज समाधी लामण। बेग़मपुरे शहर नूँ छिन आमण छिन जामण।। जदों साहिब जी घर नहीं आउंण सेवकां नाम जपावै।आप तो तरी ते और वी तारे सुभागण धंन कहावे।। संत दास ते संत कौर दो फल होई। सो भी नाम जप जप के पवित्र पात्र दोई होय। 
भारत के t aakaमूलनिवासी सगाई उसी दिन करते थे जिस दिन, शादी होती थी ताकि बेकार का धन बर्बाद ना हो सके, इसी नियमानुसार, गुरु जी की शादी और सगाई एक ही दिन हुई थी। आदधर्म के भी नियम यही हैं, जिस का इतिहास आज तक मिलता है। गुरु जी की सगाई चौदह सौ पचास बिकर्मी सम्मत को हुई थी, जिस दिन जेष्ठ महीने की संग्राण्द थी। गुरु रविदास जी की शादी मिर्जापुर के सुजान की कन्या सुभागन के संग हुई, जिस में गुरु रविदास जी ने स्वयं ही साठ शब्द पढ़े और गा कर, अपना ही आनंद कारज पढ़ा था।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर 20, 2020।

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