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Showing posts from August, 2021

।।नागर जना मेरी जाति बिखिआत चमारं।।

     ।।नागर जना मेरी जाति बिखिआत चमारं।।                  ।।राग मल्हार।। गुरु रविदास जी महाराज ने, यह शब्द मल्हार राग में लिखा है। मल्हार राग ऐसा प्यारा राग है जिस को सुन कर के खूंखार जानवर भी पिघल कर शांत हो जाते हैं अर्थात मल्हार राग शांति का प्रतीक है। जब गुरु रविदास जी महाराज को ब्राह्मण अनेकों यातनाएं दे कर और राजाओं, महाराजाओं और बादशाहों के द्वारा दिला कर बुरी तरह से पराजित हो गए और विवश हो कर गुरु रविदास जी के चरण कमलों पर गिर कर बड़े आदर सम्मान और शांति से ब्राह्मणों के प्रधान और मुखिया उन की शरण में आ कर नतमस्तक हो कर, उन के अनुयायी बन गए, तब गुरु रविदास जी महाराज ने उन को माफ करते हुए "सोहम" शब्द की अनुपम दात देदी। जब ब्राह्मण, वानियें, राजपूत गुरु जी के शिष्य बन गए, तब भी गुरु जी ने, अपनी जाति और वर्ण को बड़े गर्व और स्वाभिमान से लोगों के सामने प्रस्तुत किया था, जिस का वर्णन गुरु महाराज जी निम्नलिखित शब्द में करते हैं :--- नागर जना मेरी जाति बिखिआत चमारं।। हिरदै राम गोविंद गुन सारं।...

।।सतजुग सतू तेता जगी।।

                ।।सतजुग सतु तेता जगी।।                  ।।राग गौड़ी वैरागण।। गुरु रविदास जी महाराज ने हिंदू धर्म ग्रंथों की चीर फाड़ कर के बुरी तरह से तार-तार कर दिया था। ब्राह्मणों ने तेती करोड़ देवी देवताओं का निर्माण कर के उन के बीच विष्णु को सर्वश्रेष्ठ अवतार घोषित किया हुआ है। वह बार-बार भिन्न-भिन्न नामों से जन्म लेता रहता है। ब्राह्मणों ने ही काल विभाजन कर के समय को भी चार भागों में बांट कर के इन का नामकरण सतियुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग रखा हुआ है। ऐसा काल विभाजन विश्व के किसी भी देश में नहीं हुआ है और ना ही विश्व के किसी विद्वान ने इसे मान्यता दी हुई है।ब्राह्मणों ने काल विभाजन कर के तप, तपस्या, भक्ति, साधना के रंग ढंग, विधि विधान भी हर युग में अलग-अलग निर्धारित किये हुए हैं, जिन का कोई तर्कपूर्ण आधार नहीं है। सतियुग : सतियुग में तिलकधारी ब्राह्मण ही शिक्षा ग्रहण करेंगे और पूजा पाठ में कुतर्कपूर्ण कथाएं लोगों को सुना, सुना कर य...

तुझहि सुझन्ता कछु नाहिं।।

        ।। तुझहि सुझँता कछु नाहि।।               ।।राग बसन्त।। गुरु रविदास जी महाराज बहुत बड़े सर्वज्ञान के डिक्टेटर अर्थात तानाशाह बादशाह हुए हैं, उन के सामने सब राजाओं, महाराजाओं, बादशाहों, अमीरों, सामंतों को भी पसीना आता था। गुरु जी की भक्ति की शक्ति को देख कर के ही बाबन राजे-रानियां, महाराजे-महारानियाँ, बादशाह, बेग़में उनकी शिष्य और शिष्याएं बन गए थे। एक दिन चितौड़गढ़ की महारानी झालाबाई ने गुरु रविदास जी की भक्ति की शक्ति की धूम सुनी तो वह गुरु महाराज के दर्शन करने के लिए बावली हो गई और जातीय बंधनों को तोड़कर के गुरु रविदास जी को अपना गुरु धारण करने के लिए मन में ठान लेती है और अपने पति कुंभ सिंह से आग्रह करती है, कि महाराज! मैं गुरु रविदास जी महाराज के दर्शन करना चाहती हूँ। आप भी मेरे साथ काशी चलो, मगर जात घमंडी महाराजा कुंभसिंह ने चमार गुरु के पास जाने के लिए संकोच किया मगर महारानी झालाबाई को महाराजा कुंभसिंह ने जाने की अनुमति देदी।महारानी अपने अहलकारों के साथ काशी चली गई। झालाबाई वहां जा...

।। बिन देखे उपजै नहीं आसा।।

     ।।बिन देखे उपजै नहीं आसा।।             ।।राग भैरों।। गुरु रविदास जी महाराज परिपूर्ण संपूर्ण गुरुओं के गुरु संतों में शिरोमणि संत हुए हैं।वे उच्च स्तर के विचारक, चिंतक, आलोचक, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक हुए हैं, उनका दृष्टिकोण संकीर्ण ना हो कर विश्वव्यापी था, इसीलिए गुरु जी ने "बेगमपुरा शहर को नांऊँ" की खोज की थी, यही नहीं वे एक सफल समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपने दृढ़ विश्वास और निडर आत्मा से क्रूर, दुष्ट, अज्ञानी और छुआछूत के समर्थक ब्राह्मणों का मुकाबला किया है, जिस में वे हर कदम कदम पर जीत हासिल करते हुए आगे बढ़ते ही गए थे और छुआछूत के समर्थक हारते गए थे। गुरु जी का दृष्टिकोण मनोवैज्ञानिक था वे हर चीज को आलोचनात्मक दृष्टि से परखते और समझते थे। पुरानी आडंबरपूर्ण मान्यताओं को रद्द कर के तर्कपूर्ण नए सिद्धांतों का सृजन किया करते थे, इसीलिए उन्होंने समाजवाद का नया सिद्धांत खोज कर कहा कि:--- "ऐसा चाहूँ राज में जहां मिले सबन को अन्न, छोट बड़ सभ सम वसै तां रविदास रहे प्रसन्न"।। गुरु महाराज ने इस शब्द में सारे ब्र...

।। खट करमु कुल संजुगतु है।।

     ।। खट करमु कुल संजुगतु है।।             ।।राग केदारा।। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि अगर कोई पूजा पाठ करते समय पत्थर के देवताओं को भगवान मान कर उनकी पूजा करता है और छः प्रकार के कर्मों का ढोंग रच कर आदिपुरुष को मूर्ख बनाता है, छः प्रकार के कर्म कर के लोगों को भक्ति का नाटक कर के दिखाता है मगर जब उसके हृदय में भगवान के प्रति पूरी श्रद्धा नहीं होती है, पूरी भक्ति भावना नहीं होती है, तो उस का जीवन नर्क बन जाता है, उस की भक्ति, पूजा किसी काम नहीं आती है। इसीलिए गुरु रविदास जी महाराज ने इस शब्द में फरमाया है कि:--- खट कर्म कुल संजुगतु है, हरि भगति हिरदै नाहि।। चरणारविन्द न कथा भावै, सुपच तुलि समानि।।१।। गुरु रविदास जी महाराज अपनी कलम रूपी तलवार से हिंदुओं के आडंबरों और पाखंडों का कत्ल करते हुए फरमाते हैं, कि आप छः प्रकार के कर्म, विद्या पढ़ते हो पढ़ाते हो, यज्ञ करते और कराते हो, दान लेते और देते हो, इन कामों में पारंगत हो, यज्ञ करते हो और दूसरों से भी यज्ञ करवा कर दान लेते और देते हैं परंतु आप के मन में प्...

सुख सागर सुरितरु चिंतामणि।।

           ।।सुख सागर सुरितरु चिंतामणि।।                  ।।राग मारू।। गुरु रविदास जी महाराज ने, इस शब्द को सोरठ और मारू राग में लिखा है, जिस के कारण रागों के स्वभावानुसार शब्दों के अर्थ भी बदल गए हैं, इसीलिए मारू राग में इस शब्द का अर्थ और प्रवचन सोरठ राग से भिन्न हो गया है। सोरठ राग में गुरु रविदास जी महाराज ने, हिन्दू ब्राह्मणों को संबोधित करते हुए समझाया है, कि वे स्वर्ग के कल्पित वृक्ष चिंतामणि, कामधेनु, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि चार पदार्थों, नौ निधियों और अठारह सिद्धियां, हिंदुओं के देवताओं के हाथ में नहीं है। सकल सृष्टि और प्राणी आद पुरुष के वश में है। आप के सभी देवताओं को भी आदपुरुष ने जन्म दिया है। उसी ने ही धरती पर सभी जीवों, वनस्पतियों का सृजन किया है।आदपुरुष ने यह स्पष्ट आदेश दिया है, कि जो कुछ भी चौतीस अक्षरों में अर्थात देवनागरी लिपि में लिखा गया है, वह केवल संस्कृत भाषा में लिखे गए धार्मिक ग्रंथ और साहित्य है, इन सभी को त्याग कर केवल ईश्वर का ही सिमरन ...

।।ऐसी लाल तुझ बिन कउन करे।।

      ।।ऐसी लाल तुझ बिन कउन करै।।                   ।।राग मारू।। गुरु रविदास जी महाराज ने अपने जीवन काल में भारत में शांति स्थापित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया था मगर ब्राह्मणों ने, कदम कदम पर रोड़े अटकाए इसीलिए उन्होंने खूनी क्रांति का आह्वान किया था, जो जो कार्य उन्होंने किए हैं, उनका सीधा संबंध खूनी क्रांति से था। उस समय धोती, तिलक और शंख बजाने का तात्पर्य था खून। क्योंकि भारतवर्ष के गुलाम मूलनिवासियों को कोई किसी किस्म की पूजा, पाठ और तपस्या करने का अधिकार नहीं था, इसीलिए मूलनिवासी भक्ति नहीं कर सकते थे। मनुस्मृतियों के अनुसार ही शासन चलता था, जिस का विरोध विश्व के इतिहास में पहली बार गुरु रविदास जी महाराज ने ही किया था।गुलामी, छुआछूत और वर्ण व्यवस्था के खिलाफ केवल उन्होंने ही सर्प्रथम आवाज उठाई थी और उस को समाप्त करने के लिए वे स्वयं रणभूमि में आ गए थे, इसीलिए उन्होंने चार वर्ष की आयु में धोती, तिलक लगा कर शंख बजाया था। यही नहीं पूजा पाठ करके भी ब्राह्मणों के तंबू में आग ल...

।।पढ़िए गुनिए नामु सभु सुनीए।।

  ।।।पढ़िए गुनिए नामु सभु सुनीए।।          ।।राग रामकली वाणी।। गुरु रविदास जी महाराज विद्या, शिक्षा, पढ़ने, लिखने और विद्वान बनने के महत्व को समझाते हुए फरमाते हैं, कि काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार और माया इतने शक्तिशाली हैं, कि मनुष्य इन का सामना नहीं कर पाता है। इन पांच विकारों से नाता तभी टूट सकता है, जब मनुष्य के मन में ज्ञान की ज्योति अर्थात ज्योतिर्ज्ञान का नेत्र खुल जाए, इसीलिए शिक्षा अर्जित करना मनुष्य के लिए बहुत जरूरी है। गुरु रविदास जी महाराज इस शब्द में स्पष्ट करते हैं, कि विकारों से मुक्ति तभी मिल सकती है, जब मनुष्य सिमरन कर के आदपुरूष से अटूट संबंध जोड़ता है। पढ़िए गुनिए नांऊँ सभु सुनीए।। अनभउ भाऊ न दरसै।। लोहा कंचनु हिरन होइ कैसे।। जउ पारसहि ना परसै।।१।। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि धोती, तिलक, लगाकर और शंख, घण्टे, घड़ियालों को बजा बजा कर, धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने, सुनने और उन की व्याख्या कर के बड़े बड़े व्याख्यान देने से आदपुरुष की प्राप्ति नहीं हो जाती है, मन से छली, कपटी, पाखंडी, ढोंगी, व्यभिचारी और अत्याचारी होते ...

।जे उह अठसठि तीरथ नहावै।।

       जे उह अठसठि तीरथ नहावे।।               ।।राग गोंड।। हिंदुओं ने कई पवित्र शाही स्नान करने के लिए तीर्थ बनाए हुए हैं, शिव लिंगों के नाम पर बारह पत्थरों और कई कई गायों का दान करने, जनता की सुविधा के लिए कुएं और तलाब बनवाने, भूखों के लिए खाने के लिए लंगर लगाने के ढोंग रचे हुए हैं, यही नहीं अपने काल्पनिक अवतारों को मूर्ख बनाने के लिए अनेक प्रकार के धोती तिलक और शंख बजा कर भक्त आदिपुरुष को पाने के नाम पर आडंबर भी करते आ रहे हैं। गुरु रविदास जी महाराज इन सभी आडंबरों का खंडन करते हुए फरमाते हैं:--- जे उह अठसठि तीरथ नहावै।। जे उह दुआदस सिला पूजावै।। जे उह कूप तटा देवावै।। करै निंदा सभ बिरथा जावै।।१।। गुरु रविदास जी महाराज धर्म के नाम पर किए जाने वाले आडंबरों और पाखंडों का खंडन करते हुए फरमाते हैं, कि भले ही कोई अठाहट तीर्थों पर शाही स्नान कर ले, भले ही बारह शिवलिंगों की पूजा करके शिव को प्रसन्न करने का ढोंग रचते रहें, भले ही वे लोगों की सुविधाओं के लिए कुएं, बाबड़ी और तालाब बनाएँ, परंतु यदि वे ...

मुकंद मुकंद जपहु संसार।।

         ।।मुकंद मुकंद जपुह संसार।।                   ।।राग गोंड।। मुकन्द शब्द, मकरंद शब्द का पर्यायवाची है। जिस का तार्किक और लक्ष्यार्थ अनुभव होता है, आदपुरष। शहद, खून, शर्म, हया जिन के बिना शरीर व्यर्थ हो जाता है, बेकार लगता है, शरीर बर्बाद हो जाता है। शरीर की आभा और चमक समाप्त हो जाती है। गुरु रविदास जी महाराज मुकंद शब्द को परिभाषित करते हुए फरमाते हैं, कि मुकंद मुकंद सारा संसार जपता है, जिस से साफ स्पष्ट होता है, कि मुकंद शब्द सर्वश्रेष्ठ, सर्वोपरि, सर्वोच्च और सर्वोत्तम शक्ति के लिए ही प्रयोग किया गया है, जिस के बिना किसी का शरीर कार्य नहीं कर सकता है। जब किसी चीज के बिना शरीर चल ही नहीं सकता है, तो वह बहुत ही सुखी और आनंदमयी जीवन के लिए उपयोगी और आवश्यक हुआ करती है। गुरु रविदास जी महाराज ने यहाँ मुकंद शब्द का, बार-बार प्रयोग किया गया है, इसलिए यह शब्द बहुत ही सर्वोच्च शक्ति के लिए प्रयोग किया गया लगता है, जिसका वजूद खत्म करने के लिए हिंदुओं ने इस शब्द को अपने ...

।।जिह कुल साधु वैसनो होइ।।

          ।।जिह कुल साधु वैसनो होइ।।       .      ।।राग बिलाबल।। गुरु रविदास जी महाराज सृष्टि के रचयिता आदपुरुष से चले आ रहे आदवंश के सूर्यवंशी नागवंश में जन्में साधु सन्तों के आदर्श जीवन के बारे में फरमाते हैं, कि उन के समय में भारत में कोई वर्ण व्यवस्था, जातिपाति नहीं थी। किसी को भी भक्ति करने से रोका नहीं जाता था। किसी को भी ब्राह्मण, राजपूत और वाणियाँ नहीं कहा जाता था। कोई भी ऊँच नीच नहीं थी। किसी को भी चंडाल, म्लेच्छ नहीं कहा जाता था, जो आदपुरष की प्रेमाभक्ति करते थे, वही परिपूर्ण सत्पुरुष साधु और संत कहलाते थे। गुरु रविदास जी ने कभी भी हिंदुओं के कल्पित देवी देवताओं को मान्यता नहीं दी है मगर फिर भी उन की वाणी में ब्राह्मणों ने हिंदूवाद का मिश्रण कर दिया है, जिसे पाठकों को पहचानना होगा। जिह कुल साधु वैसनो होइ।। बरन अबरन रँकु नहीं ईशरू।। बिमलु बासु जानिए जगि सोइ।।१।।रहाउ।। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, जिस वंश में सदविचारों वाले परिपूर्ण ज्योतिर्ज्ञानी, गुरु सन्त, महात्मा अवतार लेत...

।।दारिद देखि सभु को हसै।।

              ।।दारिद देखि सभु को हसै।।                  ।। राग बिलाबल।। गुरु रविदास जी महाराज इस शब्द में एक शब्द का प्रयोग करते हैं वह है "हमारी" अर्थात गुरुजी अपनी संगत के सुख दुख को अपना सुख दुख समझते हैं और उसके सुख और दुखों का वर्णन करते समय वे "हमारी" शब्द का प्रयोग कर रहे हैं, क्योंकि गुरु रविदास जी उसी शूद्र वर्ग में हुए हैं, जिसकी बात गुरु रविदास जी करते हैं। इसी शुद्र वर्ग के लिए गुरु जी ने आजीवन ब्राह्मणों के अनगिनत अत्याचार और कष्ट सहन किए हैं, गुरु जी खुद तो ईश्वरी शक्ति संपन्न अवतार हुए हैं और जिस जाति में बे अवतरित हुए थे, उस की ब्राह्मण ने दुर्दशा कर रखी थी, जिनके उद्धार के लिए गुरु जी ने अपने आपको भी उन्हीं दलिद्रों, गरीबों और ब्राह्मणों द्वारा कुचले लोगों के लिए दुख सहन किए। गुरु जी ने यह बहुत बड़ी बात कही है, कि हमारी दुर्दशा को देखकर के सभी लोग हंसते फिरते हैं मगर मैं तो आदपुरुष की दया से सब कुछ हासिल करने में सफल हो गया हूं, ...

।।ऊंचे मन्दर साल रसोई।।

          ।।ऊँचे मन्दर साल रसोई।।               ।। राग सूही।। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार के वशीभूत हो कर के जब मनुष्य बड़े-बड़े महल बना लेता है, उस के बीच सुंदर-सुंदर पत्नियों को भी सजा सँवार सँवार कर रखता है, अहंकार में डूब कर जीवन के रंगों में मस्त रहता है और जब अंत में मौत आ जाती है, तब परिवार के लोग कहते हैं कि देर हो रही है, देर हो रही है, मुर्दे को जलाने के लिए ले जाओ। मृतक मनुष्य के इस आखिरी अंजाम को देख कर के गुरु रविदास जी महाराज इस शब्द में मनुष्य की दुर्दशा का चित्रण करते हुए फरमाते हैं, कि सांसारिक संबंध और रिश्ते मनुष्य के वास्तविक साथी नहीं होते हैं, मनुष्य का असली साथी ईश्वरीय प्रेम और उसकी भक्ति ही है। ऊँचे मन्दर साल रसोई।। इस घरी फुनि रहनु न होई।।१।। गुरु रविदास जी महाराज नश्वर शरीर के बारे में फरमाते हैं, कि हे संसार की चकाचोंध में खोए हुए मनुष्य! तू जिन बड़े-बड़े आलीशान महलों को बनाता है, सजा सँवार कर  उन के बीच अत...

।।जो दिन आवहि सो दिन जाही।।

    ।।जो दिन आवहि सो दिन जाहीं।।                ।। राग सूही।। गुरु रविदास जी महाराज मनुष्य के जीवन की अटल सच्चाई का स्पष्ट शब्दों में वर्णन करते हुए फरमाते हैं, कि हे मनुष्य! जो दिन आ रहा है, वह बीतता जा रहा है, यहां पर कोई भी स्थाई रूप से नहीं रह सकता है, एक दिन इस संसार को छोड़कर के यहाँ से प्रस्थान करना ही पड़ेगा। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे मनुष्य! तेरी मंजिल बहुत दूर है अर्थात आप को बहुत दूर जाना है, सिर के ऊपर हर समय मौत खड़ी है, ना जाने कम मृत्यु हो जाए, इसलिए सांसारिक मोह माया को त्याग कर, आदपुरष को भी स्मरण किया कर। जो दिनु आवहि सो दिनु जावहि।। करना कूच रहन थिरु नाहिं।। संगू चलत है हम भी चलना।। दूरी गवनु सिर उपरि मरना।।१।। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि ये अटल सच्चाई है, कि जो दिन आता है, वह बीत कर समाप्त होता जाता है और हमेशा होता ही रहेगा, अर्थात जब सूर्य निकलता है, तो उसने शाम के समय अस्त होना ही है। इसी तरह जो मनुष्य जन्म लेता है, उसे मरना ही पड़ता है। क्योंकि यह संसार नश...

।।जब हम होते तब तू नाही।।

           ।।जब हम होते तब तू नाही।।                  ।।राग सोरठ।। गुरु रविदास जी महाराज विश्व में अकेले ऐसे संत महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने अपने विचार हर क्षेत्र में व्यक्त किए हुए हैं। गुरु जी ने सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक मनोविज्ञान, ज्ञान विज्ञान, अर्थशास्त्र, तर्कशास्त्र, जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, आदि विषयों पर बड़ी गंभीरता से चिंतन करके तीव्र विहंगम दृष्टि से देख कर, परख कर नए सिद्धांतों का सृजन किया हुआ है। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि:--- ऐसा चाहूं राज में जहां मिले सबन को अन्न। छोट बड़ सभ सम वसै तां रविदास रहे प्रसन्न।। इन पंक्तियों में गुरु जी ने विश्व के लिए वास्तविक समाजवाद का सिद्धांत ढूंढ निकाला है, जिसका अनुकरण कर के कार्ल मार्क्स ने समाजवाद के बड़े-बड़े ग्रंथ लिख डाले हैं और उनका अनुकरण करके आज कम्युनिस्ट विचारधारा के लोग कई वर्षों से शासन कर रहे हैं। गुरु रविदास महाराज ने, प्रस्तुत शब्द में भौतिक विज्ञान की व्याख्या ...

।।चित, सिमरनु करउ ने अविलोकनो।।

      ।।चित सिमरनु करउ ने अविलोकनो।।                    ।।राग धनासरी।। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि चित और हृदय पल पल, क्षण क्षण अपना अपना काम करते रहते हैं। चित विचार करता रहता है मन विचार को समझ कर, परख कर उस को स्वीकार कर लेता है और हिर्दय अर्थात दिल भावनात्मक रूप से निर्णय ले कर चित और मन  की विचारधारा को आलोचनात्मक दृष्टि से परख कर उसे अपने अंदर जज्ब कर लेता है, इसी संयुक्त निर्णय को हमारी बुद्धि स्वीकार कर के उस पर काम करना शुरू कर देती हैं। आंख, कान, नाक, जीवा, चमड़ी और अंतःकरण के सहयोग से मन अपना काम शुरू करते हैं और सभी फल प्राप्ति की ओर अग्रसर होते हैं। चित, मन, हृदय और चमड़ी अपने बौद्धिक विचारों को किस प्रकार कार्य रूप देते हैं, उस का चित्रण इस शब्द में बड़े ही मार्मिक ढंग से किया गया है:--- चित सिमरनु करउ नैन अविलोकनो, सरवन वाणी सुजसु पूरि राखउ।। मनु सु मधुकरु करउ चरण हिरदै धरउ, रसनु अमिरत राम नाम भाखउ।।१।। गुरु रविदास जी महाराज, परमपिता परमेश्वर अ...

।।हम सरि दींन दईआल न।।

         ।।हम सरि दीन दइआल न।।              ।।राग धनासरी।। गुरु रविदास जी महाराज सृष्टि के रचयिता आदपुरुष से बातें करते हुए फरमाते हैं कि, हे आदपुरष! आप अति विनम्र, दयालु, क्षमाशील और परोपकारी हैं, जब कभी कोई आप से क्षमा याचना करता है, तो आप भोले भाले जीवों को क्षमा कर देते हैं और आप, साधना करने वाले को दर्शन देकर के अपने ज्योतिर्ज्ञान से विभूषित कर के ज्योतिर्ज्ञानी बना देते हैं, इसलिए गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि यह जनम आप के निमित अर्पित है। हम सरि दीन दइआल न तुम सरि, अब पतिआरू किआ कीजै।। बचनी तोर मोर मनु माने, जन कउ पूरनु दीजै।।१।। मैंने पिछले शब्दों की व्याख्या करते हुए लिखा है कि, गुरु रविदास जी महाराज परिपूर्ण, संपूर्ण और ज्योतिर्ज्ञानी गुरु हुए हैं। सन्तों में सर्वश्रेष्ठ सन्त हुए हैं, इसीलिए उन्हें संत शिरोमणि कहा गया है। गुरु जी जब पीड़ित, दीन-दुखियों के दुख दर्द का पक्ष आदपुरुष के पास रखते हुए अपने आप को भी दीन दुखियों में ही शामिल करते हुए फरमाते हैं, कि हे आदपुरष! हम...

।।चमरठा गाँठी न जानई।।

       ।।चमरठा गाँठी ना जनई।।                ।।राग सोरठ।। जो लोग गुरु रविदास जी महाराज को जूते बनाने वाले, जूते मरम्मत करने वाले चमार के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत करते आए हैं, उन को गुरुजी अपनी कलम से लिख कर के स्पष्ट कर रहे हैं, कि हे भाई! मैं जाति का चमार अवश्य हूं, परंतु मैंने चमड़े का काम कभी नहीं किया और और ना ही यह काम मुझे आता है, ना ही पुराने जूते मुरम्मत किए हैं और ना ही नए और पुराने जूते बनाना मुझे आते हैं, मगर कुछ अंध भक्तों ने गुरु जी के इस शब्द के कई अर्थ और अनर्थ निकाले हुए हैं, वास्तव में गुरुजी ने अपनी वाणी में  लिख कर ब्राह्मणों के भावी दुष्प्रचार का अनुभव कर के, एहसास कर लिया था, कि ये ब्राह्मण लोग मेरे अवसान के बाद, मुझे चर्मकार के रूप में समाज में प्रस्तुत करेंगे, इसीलिए उन्होंने अपने इस सत्य को लेखनीबद्ध कर के अपनी भावी पीढ़ियों के लिए अपने व्यवसाय की पूरी जानकारी दी हुई है। गुरु रविदास जी महाराज इस शब्द में लिखते हैं कि:--- चमरठा गाँठि न जनई।। लोगु गठावैं पनही...

।।जल की भीति पवन का थंबा।।

       ।।जल की भीति पवन का थंबा।।                ।।राग सोरठ।। गुरु रविदास जी महाराज की आयु 151 वर्ष हुई है, वर्तमान युग में इतनी लंबी आयु किसी की नहीं सुनी गई है, इस लंबे समय में गुरु जी ने विज्ञान की हर विधा के ऊपर चिंतन कर के कई वैज्ञानिक सिद्धांतों का सृजन की हुआ है, जैसा अभी तक कोई भी वैज्ञानिक नहीं कर सका है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पानी की उत्पत्ति दो तत्वों ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के मिश्रण से  हुई है मगर गुरु रविदास जी महाराज आक्सीजन को अमृत और हाइड्रोजन को जहर मानते हैं, अमृत और जहर के मिश्रण से पानी और खून की उतपत्ति की हुई है। सृष्टि के जीव जगत के लिए जहां ऑक्सीजन जीवनदायिनी और चमत्कारी तत्व है, वहीं हाइड्रोजन मृत्यु का सामान भी है अर्थात यमराज है। जहां आक्सीजन सृष्टि की रचयिता है, वहां हाइड्रोजन दक्षिण दिशा में बसने वाले मृत्यु का देवता यमराज है। गुरु रविदास जी के वैज्ञानिक सिद्धांत को कोई आम व्यक्ति ना तो समझ सका है और ना ही इस की व्याख्या कर सका है। इसी पानी के कारण ही जी...

जउ तुम गिरिवर तउ हम चकोरा।।

     ।। जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा।।          ।।राग सोरठ।। गुरु रविदास जी महाराज प्रस्तुत शब्द में आत्मा और परमात्मा के बीच जो गूढ़ रहस्य है, उसकी व्याख्या करते हुए फरमाते हैं, कि आत्मा "हम" और परमात्मा "तुम" है, जिसे "सोहम" कहते हैं। ये तुम और हम के बीच जो गूढ़ रहस्य है, उस को खोल कर समझाते हैं, कि दोनों का आपस में अटूट मणिकांचन योग हैं अर्थात दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। सतगुरु कबीर साहब भी फरमाते हैं कि:--- "जल में कुंभ है कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी" कबीर साहब के कहने का तात्पर्य है, कि पानी के बीच घड़ा है और घड़े के बीच पानी है अर्थात पानी अंदर भी है और बाहर भी है और जब घड़ा टूट जाता है तो फिर पानी समंदर ही बन जाता है अर्थात आत्मा रूपी पानी पुनः जल में समा कर सागर ही कहलाता है। इसी तरह परमपिता परमेश्वर अर्थात आदपुरष भी जीव के अंदर भी है और बाहर भी है। इस पंक्ति में कबीर साहिब ने रहस्यवाद के सिद्धांत को परिपक्व कर के गुरु रविदास जी के सिद्धांत को ही दृढ़ किया है। इस से स्पष्ट होता है कि, गुरु रविदास जी महाराज बहुत बड़े रहस्यव...

।।सुख सागर सुरतरु चिंतामणि।।

    ।।सुख सागर सुरतरु चिंतामणि।।              ।।राग सोरठ।। ब्राह्मणों ने ऐसे ऐसे अविष्कार किये हुए हैं, कि जिन को सुन कर आदमी तो क्या आदपुरष भी सकते में पड़ जाते होंगे, क्योंकि इन लोगों ने चार चार मुखड़ों वाले आदमियों का खोज की हुई है, कोई शेषनाग की भी रचना की हुई है, जो अपने सारथी को पूर्ण संरक्षण देकर उस की रक्षा करता है। कोई बंदर के मुंह की तरह वानर रूप में ईजाद किया गया है, इसी तरह कई पेड़ भी ऐसे ही खोज डाले हैं, जिन को देव तरु कहा जाता है और कई ऐसी मणियाँ हैं, जो चिंताओं को नष्ट कर देती है, ऐसी देवियाँ भी है जो चिंताओं को खत्म कर देती है मगर उसके  बावजूद भी लोग सुखी नहीं रहते हैं, इन्हीं अलौकिक शक्तियों का पोस्टमार्टम कर के गुरु रविदास जी महाराज ने इस शब्द में फरमाया है:--- सुख सागर सुरतरु चिंतामणि। कामधेनु बसि जा के।। चारि पदारथ असतट दसा सिधि। नव निधि करतल ता के ।।१।। गुरु रविदास जी महाराज परमपिता परमेश्वर आदपुरुष की सर्वोच्चता का वर्णन करते हुए फरमाते हैं, कि हे ब्राह्मण! जिस सुख के सागर अर्थात आदपुरु...