।।दारिद देखि सभु को हसै।।
।।दारिद देखि सभु को हसै।।
।। राग बिलाबल।।
गुरु रविदास जी महाराज इस शब्द में एक शब्द का प्रयोग करते हैं वह है "हमारी" अर्थात गुरुजी अपनी संगत के सुख दुख को अपना सुख दुख समझते हैं और उसके सुख और दुखों का वर्णन करते समय वे "हमारी" शब्द का प्रयोग कर रहे हैं, क्योंकि गुरु रविदास जी उसी शूद्र वर्ग में हुए हैं, जिसकी बात गुरु रविदास जी करते हैं। इसी शुद्र वर्ग के लिए गुरु जी ने आजीवन ब्राह्मणों के अनगिनत अत्याचार और कष्ट सहन किए हैं, गुरु जी खुद तो ईश्वरी शक्ति संपन्न अवतार हुए हैं और जिस जाति में बे अवतरित हुए थे, उस की ब्राह्मण ने दुर्दशा कर रखी थी, जिनके उद्धार के लिए गुरु जी ने अपने आपको भी उन्हीं दलिद्रों, गरीबों और ब्राह्मणों द्वारा कुचले लोगों के लिए दुख सहन किए। गुरु जी ने यह बहुत बड़ी बात कही है, कि हमारी दुर्दशा को देखकर के सभी लोग हंसते फिरते हैं मगर मैं तो आदपुरुष की दया से सब कुछ हासिल करने में सफल हो गया हूं, क्योंकि मैंने मन को एकाग्र करके परमपिता परमेश्वर की भक्ति की है, इसलिए गुरु जी शूद्र वर्ग को संबोधित करते हुए फरमाते हैं कि हे शूद्रो! आपको भी परमपिता परमेश्वर अर्थात आदिपुरुष के चरण कमलों में ध्यान लगाकर उस की भक्ति करनी चाहिए, तभी आप की दरिद्रता मिटेगी।
दारिद देखि सभु को हसै ऐसी दसा हमारी।।
असटदसा सीधि करत लै सभ किरपा तुमारी।।१।।
गुरु रविदास जी शूद्र वर्ग को अपने साथ शामिल करते हुए फरमाते हैं, कि हमारी गरीबी,निर्धनता, लाचारी और दयनीय व्यवस्था को देख कर के सभी हंसते फिरते हैं, परंतु हे परमपिता परमेश्वर अर्थात आदपुरुष! जो लोग आपकी साधना करते हैं, भक्ति करते हैं, उनको आप अपनी कृपा दृष्टि से संपन्न बना देते हैं। नौ निधियों और अठारह सिद्धियों से कृतकृत्य कर देते हैं, अर्थात उन को आप सब कुछ मनवांछित दे देते हैं।
तू जानत मैं किछु नाहिं भव खंडन राम।।
सगल जीअ सरनागति प्रभ पूरन काम।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं, कि सांसारिक दुखों, मुसीबतों का खंडन करने वाले तथा दुखों को मिटाने वाले हे आदपुरुष! आप जानते हैं कि मैं कुछ भी नहीं हूं और मेरी कोई औकात नहीं है मगर हे आदिपुरुष! आप सभी के काम करने वाले हैं, जो भी प्राणी आपकी शरण में आता है उन सभी का आप कल्याण कर देते हो।
जउ तेरी सरनागति तिन नाहिं भारू।।
ऊँच नीच तुम ते तरै आलजु संसार।।२।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि हे आदिपुरुष! जो भी आप की शरण में आते हैं, उनको आप दुखों,कलेशों, ऊंच-नीच के भार से मुक्त कर देते हैं। संसार में जितने भी अपमानित, प्रताड़ित ऊंच-नीच लोग हैं, वे आप का सिमरन कर के भवसागर में तर जाते हैं अर्थात उनका कल्याण हो जाता है।
कहि रविदास अकथ कथा बहु काई कीजै।।
जैसा तू तैस तूही किआ उपमा दीजै।।३।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज आदपुरुष की शक्ति के बारे में फरमाते हैं, कि हे आदपुरुष! आप हमारे ऊपर दया करके हमारे दुखों का जो निवारण करते हैं, उन का हम नहीं वर्णन कर पाते हैं और ना ही कर सकते हैं। आपकी चमत्कारी कथाओं का वर्णन और उपमा की कथा हम किसी को नहीं सुना सकते हैं। आप जैसे हैं, वैसे आप ही हैं अर्थात आप की तरह केवल आप ही हैं और आपकी उपमा किसी से नहीं की जा सकती है।
शब्दार्थ:--- दारिदु-दरिद्र, गरीब, असहाय। असट-अठारह। दसा-दुर्दशा, हालत। कर-हाथ। तलै-हथेली। भव खंडन-सांसारिक दुखों का खंडन करने वाला। पूरन काम-सभी कार्यों को पूर्ण करना। भारू-पांच विकारों का भार, पाप कर्मों का बोझ। आलजु-लज्जा रहित, जलील, अपमानित। अकथ-जिस के बारे में कहा ना जाए। काई-क्या कर लेना।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।
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