।। खट करमु कुल संजुगतु है।।

 

   ।। खट करमु कुल संजुगतु है।।
            ।।राग केदारा।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि अगर कोई पूजा पाठ करते समय पत्थर के देवताओं को भगवान मान कर उनकी पूजा करता है और छः प्रकार के कर्मों का ढोंग रच कर आदिपुरुष को मूर्ख बनाता है, छः प्रकार के कर्म कर के लोगों को भक्ति का नाटक कर के दिखाता है मगर जब उसके हृदय में भगवान के प्रति पूरी श्रद्धा नहीं होती है, पूरी भक्ति भावना नहीं होती है, तो उस का जीवन नर्क बन जाता है, उस की भक्ति, पूजा किसी काम नहीं आती है। इसीलिए गुरु रविदास जी महाराज ने इस शब्द में फरमाया है कि:---
खट कर्म कुल संजुगतु है,
हरि भगति हिरदै नाहि।।
चरणारविन्द न कथा भावै,
सुपच तुलि समानि।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज अपनी कलम रूपी तलवार से हिंदुओं के आडंबरों और पाखंडों का कत्ल करते हुए फरमाते हैं, कि आप छः प्रकार के कर्म, विद्या पढ़ते हो पढ़ाते हो, यज्ञ करते और कराते हो, दान लेते और देते हो, इन कामों में पारंगत हो, यज्ञ करते हो और दूसरों से भी यज्ञ करवा कर दान लेते और देते हैं परंतु आप के मन में प्रभु के प्रति कोई प्रेम नहीं होता है। ईश्वर को प्राप्त करने की कोई इच्छा नहीं होती है, उस की कोई भी कथा नहीं सुनते हो, जब आदपुरुष के प्रति आप के हृदय में भक्ति भाव ही नहीं है, तब तो ब्राह्मण चांडाल के समान हैं।
रे चित चेति चेत अचेत,
काहे न बाल्मीकहि देख।।
किसु जाति ते किह पदहि अमिरिउ,
राम भगति बिसेख।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज भटके हुए मन (चित) को संबोधित करते हुए फरमाते हैं, कि हे मन! तू दिल में कुछ सोच विचार कर, होश और बेहोश की स्थिति में, सोते जागते सोहम सोहम क्यों नहीं जपता है? महाऋषि वाल्मिकी जी को क्यों नहीं देखता, वे किस जाति के थे और आदिपुरुष की विशेष भगति कर के किस प्रकार सर्वोच्च पद पर पहुंच कर, अमर हो गए थे।
सुआनसतरू अजातु सभ तों,
प्रभ लावै हेतु।।
लोगु बपुरा किआ सराहै,
तीन लोक परवेस।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि कुत्तों का बैरी अर्थात कुत्तों को मार कर खाने वाला चंडाल जाति का सब से प्यारा तब हो गया था, जब प्यार से आदपुरुष ने उसे अपनी छाती से लगा कर प्यार किया था। दुनिया के लोग उस बेचारे का क्या सम्मान कर सकते हैं? ईश्वर के प्रेमी की सराहना अनजान लोग क्या कर सकते हैं? उस की प्रशंसा तो तीनों लोगों में होती है।
अजामलु पिंगुला लुभतू कुंचर,
गए हरि के पास।।
ऐसे दुरमति निस्तरे,
तू किउं न तरहि रविदास।।3।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि निकृष्ट से निकृष्टतम काम करने वाले अजामल पापी, पिंगला, शिकारी और हाथी आदिपुरुष का सिमरन करने के बाद मुक्ति को प्राप्त हो गए थे अर्थात ईश्वर ने उन के दुख, पाप माफ कर दिए थे और ये पापी उन के पास चले गए थे। गुरु रविदास जी महाराज आत्म संबोधन करते हुए फरमाते हैं, कि जब ये बुरी बुद्धि वाले जीव तर गए, तो फिर, हे रविदास! आप क्यों नहीं तरेंगे? अर्थात तुझे आदिपुरुष क्यों नहीं मिलेंगे।
शब्दार्थ:--- खट करम-हिन्दुओं के छः कर्म शिक्षा पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, कराना, दांन देना लेना। संजुगत-संयोगवश, सहित,परिपक्व। चरणारविन्द-चरण कमल, आदपुरुष। सुपच चंडाल-जो मरे मांस को खाए, कुत्तों आदि को पका कर खाने वाला। तुलि-समान, बराबर। समानि- समान। रे-दूसरे दर्जे का। चित-मन। चेति-याद करना। चेत-महसूस करना, चेतना। अचेत-सुन्न, सुप्तावस्था, जिस में चेतना नहीं। चेत अचेत-जागृत और सुप्तावस्था। अमिरिउ-अमर हो जाना। बिसेख-विशेष, खास।सुआनासुर-कुत्ते का दुश्मन। अजातु-मरे हुए जीव का मांस भक्षक।बपुरा-असहाय, बेचारा। दुरमति-कुटिल बुद्धि, बुरी बुद्धि वाला।लुभतू-शिकारी। कुंचर-हाथी।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।

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