जउ तुम गिरिवर तउ हम चकोरा।।
।। जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा।।
।।राग सोरठ।।
गुरु रविदास जी महाराज प्रस्तुत शब्द में आत्मा और परमात्मा के बीच जो गूढ़ रहस्य है, उसकी व्याख्या करते हुए फरमाते हैं, कि आत्मा "हम" और परमात्मा "तुम" है, जिसे "सोहम" कहते हैं। ये तुम और हम के बीच जो गूढ़ रहस्य है, उस को खोल कर समझाते हैं, कि दोनों का आपस में अटूट मणिकांचन योग हैं अर्थात दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। सतगुरु कबीर साहब भी फरमाते हैं कि:---
"जल में कुंभ है कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी"
कबीर साहब के कहने का तात्पर्य है, कि पानी के बीच घड़ा है और घड़े के बीच पानी है अर्थात पानी अंदर भी है और बाहर भी है और जब घड़ा टूट जाता है तो फिर पानी समंदर ही बन जाता है अर्थात आत्मा रूपी पानी पुनः जल में समा कर सागर ही कहलाता है। इसी तरह परमपिता परमेश्वर अर्थात आदपुरष भी जीव के अंदर भी है और बाहर भी है। इस पंक्ति में कबीर साहिब ने रहस्यवाद के सिद्धांत को परिपक्व कर के गुरु रविदास जी के सिद्धांत को ही दृढ़ किया है। इस से स्पष्ट होता है कि, गुरु रविदास जी महाराज बहुत बड़े रहस्यवादी हुए हैं, जिस का प्रमाण इस शब्द में मिलता है।
जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा।।
जउ तुम चंद तउ हम भए है चकोरा।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज आदपुरष को संबोधित करते हुए फरमाते हैं, कि हे आदपुरुष! यदि आप पर्वतों में सर्वश्रेष्ठ पर्वत हो, तो मैं भी उस में विचरण करने वाला सुंदर मोर हूं, यदि आप नीले अकाश में चमकने वाले चांद हो, तो मैं आप को एक टक नजर से निहारने वाला चकोर हूं। गुरु जी के फरमान का तात्पर्य है कि, आत्मा तो हर पल परमात्मा को चकोर की तरह निहारने वाली है, जिस के बिना आत्मा को धरती पर ही नर्क मिलता है, जो आत्मा चकोर की तरह एक टक निहारती रहती है, उसे कोई भी आधि व्याधि, मुशीबत और दुःख, दुखी नहीं करते हैं।
माधवे तुम न तोरहु तउ हम नहीं तोरहि।।
तुम सिऊँ तोरि कबन सिऊँ ज़ोरहि।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज अपने मन की व्यथा को व्यक्त करते हुए आद पुरुष से कहते हैं, कि हे आदपुरुष! आप मेरे साथ कभी भी प्रेम को मत तोड़ना, मैं तो कभी भी तोड़ ही नहीं सकता हूं और अगर मैं आपके साथ प्रेम करना छोड़ दूं अर्थात प्रेम तोड़ लूं तो फिर मैं किस के साथ प्रेम करूंगा अर्थात आप के अतिरिक्त विश्व में कोई भी ऐसा नहीं है, जिस के साथ में प्रेम कर सकूं।
तुम दीवरा तउ हम बाती।।
जउ तुम तीरथ तउ हम जाती।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज अपना और परमात्मा के बीच जो संबंध है, उसका चित्रण करते हुए फरमाते हैं, कि अगर आप दीपक हो तो मैं उस के बीच जल कर प्रकाश करने वाली बात्ती हूं, यदि आप पवित्र तीर्थ स्थान हो, तो उस के बीच पवित्र स्नान करने वाला तीर्थयात्री भी मैं ही हूं, जो आप जैसे पवित्र सरोवर के बीच नहा कर के अपने शरीर को स्वच्छ, प्रांजल, उज्जवल और पवित्र बना लेता हूं, इसीलिए मैं आपके प्रेम को तोड़कर आपसे दूर नहीं रह सकता हूं।
साची प्रीति हम तुम सिऊँ जोरी।।
तुम सिऊँ जोरी अवर संगी तोरी।।३।।
गुरु रविदास जी महाराज आदपुरुष के आगे अपनी मनःस्थिति को स्पष्ट करते हुए फरमाते हैं, कि हे आद पुरुष! मैंने तो आप के साथ सच्ची सच्ची प्रीत लगाई हुई है अर्थात मैं आपके साथ सच्चा प्रेम करता हूं। आप के प्रेम के कारण ही मैं, संसार में काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और माया से मुक्त हो गया हूं। मैंने इन बुराइयों से अपने आपको बिल्कुल ही अलग कर लिया है और सांसारिक बंधनों को तोड़ दिया है, अब मैंने आप के साथ ही प्रीत जोड़ी हुई है और दूसरों के साथ तोड़ ली है।
जह जह जाऊ तहां तेरी सेवा।
तुम सो ठाकुरु अउर न देवा।।४।।
गुरु रविदास जी महाराज आदपुरुष के समक्ष आत्मसमर्पण करते हुए फरमाते हैं, कि मैं जहां जहां, जिधर, जिधर जाऊंगा वहां पर जा कर मैं आपकी ही सेवा करूंगा। तुम्हारे जैसा संसार में कोई और परमपिता परमेश्वर नहीं है, ना ही कोई देवता है, जिस की मैं सेवा कर सकूं और भक्ति कर सकूं, जिस के साथ मैं प्रेम कर सकूं अर्थात आप की तरह संसार में कोई भी प्रेम करने के लायक नहीं है।
तुमरे भजन कटहि जम फांसा।।
भगति होत गावै रविदासा।।५।।५।।
गुरु रविदास जी महाराज आदपुरुष की स्तुति करते हुए फरमाते हैं, कि हे आदपुरुष! आप की भक्ति करने से काल कराल यमदूतों के फंदे स्वत: ही कट जाते हैं अर्थात मानव मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। हे परमपिता परमेश्वर! आप के सच्चे प्रेम को देखते हुए मैं रविदास आप की भक्ति में लीन हूं, इसलिए मेरी अंतरात्मा के बीच प्रेमा भक्ति का संचार करते रहें ताकि मेरे मन में किसी दूसरे के प्रति प्रेम के भाव जागृत ही ना हो सकें।
शब्दार्थ:--- गिरिवर-श्रेष्ठ पर्वत। तउ-तब। भए-हुए। तोरहु-तोड़ना। तोरहि-तोड़ूंगा।सिऊँ-की अपेक्षा। जाती-जाने वाला, यातरू। अवर संगी-अन्य साथी। सो-जैसा। अउर-और, कोई दूसरा। कटहि-कट जाना। फांसा-फंदा, फांसी की रस्सी।
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