तुझहि सुझन्ता कछु नाहिं।।
।। तुझहि सुझँता कछु नाहि।।
।।राग बसन्त।।
गुरु रविदास जी महाराज बहुत बड़े सर्वज्ञान के डिक्टेटर अर्थात तानाशाह बादशाह हुए हैं, उन के सामने सब राजाओं, महाराजाओं, बादशाहों, अमीरों, सामंतों को भी पसीना आता था। गुरु जी की भक्ति की शक्ति को देख कर के ही बाबन राजे-रानियां, महाराजे-महारानियाँ, बादशाह, बेग़में उनकी शिष्य और शिष्याएं बन गए थे। एक दिन चितौड़गढ़ की महारानी झालाबाई ने गुरु रविदास जी की भक्ति की शक्ति की धूम सुनी तो वह गुरु महाराज के दर्शन करने के लिए बावली हो गई और जातीय बंधनों को तोड़कर के गुरु रविदास जी को अपना गुरु धारण करने के लिए मन में ठान लेती है और अपने पति कुंभ सिंह से आग्रह करती है, कि महाराज! मैं गुरु रविदास जी महाराज के दर्शन करना चाहती हूँ। आप भी मेरे साथ काशी चलो, मगर जात घमंडी महाराजा कुंभसिंह ने चमार गुरु के पास जाने के लिए संकोच किया मगर महारानी झालाबाई को महाराजा कुंभसिंह ने जाने की अनुमति देदी।महारानी अपने अहलकारों के साथ काशी चली गई। झालाबाई वहां जा कर के गुरु रविदास जी महाराज को नमन कर के सत्संग सुनने बैठ गई। रानी ने अपने सिर के ऊपर बहुमूल्य सोने, चांदी और हीरे जवाहरातों से जड़े हुए, बेशकीमती सुंदर सुंदर भूषण और बहुमूल्य कपड़े पहने हुए थे, जिन के कारण वह बड़े घमंड से अकड़ती फकड़ती और इतराती हुई दिखाई दे रही थी।बड़ी नजाकत में अंधी हो कर पंडाल में संत्संग सिऊँ रही थी। सतसंग में उस के हिलने डुलने की हरकतों को देख कर के गुरु रविदास जी महाराज ने, महारानी को बुरी तरह से डांटा और फटकारा, उसी दृश्य को इस शब्द में उन्होंने बांधा हुआ है।
तुझहि तुझँता कछु नाहि।।
पहिरावा देखे उभी जाहि।।
गरबवति का नाहिं ठाऊँ।।
तेरी गरदनि उपरि लवै काऊ।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज महारानी झालाबाई को डांटते और फटकारते हुए फरमाते हैं, कि हे रानी! तुझे कुछ (सूझता) दिखाई नहीं दे रहा है कि तुम ने जो यह फूहड़ पहरावा (परिधान) पहन रखा है, जिस को देख कर के सभी का मन सतसंग में भटक (उभ) रहा है। गुरु रविदास जी महाराज आगे फिर उसे डांटते हुए कहते हैं, यहां मेरे सत्संग में अहंकारियों, घमंडियों के लिए कोई जगह नहीं है। हे महारानी! तेरी गर्दन के ऊपर बैठ कर कॉल अर्थात मृत्यु तेरे कर्मो का हिसाब किताब ले (लवै) रहा है।
तू कांई गरबहि बावली।।
जैसे भादउ खुंब राजु।।
तूं तिस ते खरी उतावली।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज महारानी झालाबाई को पूछते हुए फरमाते हैं, कि हे महारानी! अपने पहरावे के कारण इतनी पागल हो कर के इतना घमंड क्यों कर रही है? तुझे यह ज्ञात नहीं है कि यह शरीर भादों महीने में उतपन्न होने वाली खुंभ की तरह है, जो सुबह जन्म लेती है और शाम को मर जाती है। गुरु रविदास जी महाराज, बेचैन महारानी झालाबाई को समझाते हुए कहते हैं, कि तेरा तो अपने घमंड और अहंकार के कारण, खुंभ से भी पहले ही नाश होने वाला है।
जैसे कुरंक नहीं पाइउ भेदु।।
तनि सुगंध ढूंढै प्रदेसु।।
अप तन का जो करे विचारु।।
तिस नहीं जम कंकरू करे खुआरु।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज हिरण की मूर्खता का वर्णन करते हुए, रानी झालाबाई को समझाते हैं, कि हे रानी! हिरन की नाभि से ही सुगंध आती रहती है मगर वह मूर्खों की तरह सोचता है कि, सुगंध उस के मुंह से आगे की तरफ से ही आ रही है और इसलिए उस सुगंध को पाने के लिए जंगल में दौड़ता फिरता है, जब कि सुगन्ध उस की नाभि से ही आती है मगर वह अज्ञानी इस रहस्य को नहीं जान पाता है। गुरु रविदास जी महाराज महारानी को बताते हैं, कि जो अपने शरीर का विचार करता है, शरीर में ही परमात्मा को ढूंढता है, उसे यमराज के दूत परेशान नहीं करते हैं।
पुत्र कलत्र का करहि अहंकारु।।
ठाकरू लेखा मगनहारू,
फ़ेड़े का दुखु सहै जीऊ।।
पाछे किसहि पुकारहि पीऊ पीऊ।।३।।
गुरु रविदास जी महाराज विशाल सत्संग में बैठी हुई रानी सहित संगत को समझाते हुए फरमाते हैं, कि पुत्र और पत्नी का अहंकार क्यों करते हो? जब मौत आती है तो ठाकुर जीवन के कर्मों (फ़ेड़े) का सारा लेखा हिसाब मांगता है, फिर जो दुष्कर्म, छल-कपट सहन किए होते हैं, उन जब का दंड मिलता है, जिस का दुख मन को सहन करना पड़ता है, परंतु पीछे से प्रिय, प्रिय किस को पुकारते हो? अर्थात उस समय प्रिय अर्थात परमपिता परमेश्वर भी किसी का साथ नहीं देता है और जीव को अपने कर्मों का दंड भुगतना ही पड़ता है। ठाकुर अच्छे कर्मों का फल अच्छा ही देता है और बुरे कर्मों का दंड भी कठोर ही देता है, तब वह किसी के ऊपर जरा भी दया नहीं करता है, चाहे कोई कितना ही विनम्र हो कर के अपने गुनाहों को माफ करने का आग्रह करता रहे।
साधु की जउ लेहि उट।।
तेरे मिटिह पाप सभ कोटि कोट।।
कहि रविदास जउ जपै नामु।।
तिसु जाति न जनमु न जोनी कामु।।४।।१।।
गुरु रविदास महाराज, सतसंग में बैठी झालाबाई और सँगत को मार्मिक उपदेश देते हुए, फरमाते हैं, कि जो परिपूर्ण ज्योतिर्ज्ञानी साधु की शरण में चला जाता है, उन पापियों के करोड़ों, करोड़ों पाप समाप्त हो जाते हैं अर्थात गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि जो आदिपुरुष के नाम का सिमरन करता है, उस को जातिपाति और योनि से कोई मतलब नहीं होता है। परमपिता परमेश्वर जाति-पाति, धर्म-कर्म, ऊंच-नीच को नहीं जानते हैं और कर्मानुसार सभी को फल देते हैं।
शब्दार्थ:--- ऊभी जाहि-अकड़ फक्कड़ कर, बन ठन कर, सज धज कर बैठने से सँगत परेशान हो रही है। गरबवति-अहंकारी औरत। लवै काऊ-काल चक्कर लगा रहा है। काई-क्यों। खरी-अच्छी, बहुत। उताबली-बेचैनी अनुभव करने वाली, जल्दबाजी।
कुरंक-हिरन। जम कंकरू-यमदूत। कलत्र-पत्नी।फ़ेड़े का-बुरे कर्मो का। पीऊ-प्रेमी, प्यारा। साधु- दरवेश, संत। कोटि-करोड़ों।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।
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