।।चमरठा गाँठी न जानई।।

 

     ।।चमरठा गाँठी ना जनई।।
               ।।राग सोरठ।।
जो लोग गुरु रविदास जी महाराज को जूते बनाने वाले, जूते मरम्मत करने वाले चमार के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत करते आए हैं, उन को गुरुजी अपनी कलम से लिख कर के स्पष्ट कर रहे हैं, कि हे भाई! मैं जाति का चमार अवश्य हूं, परंतु मैंने चमड़े का काम कभी नहीं किया और और ना ही यह काम मुझे आता है, ना ही पुराने जूते मुरम्मत किए हैं और ना ही नए और पुराने जूते बनाना मुझे आते हैं, मगर कुछ अंध भक्तों ने गुरु जी के इस शब्द के कई अर्थ और अनर्थ निकाले हुए हैं, वास्तव में गुरुजी ने अपनी वाणी में  लिख कर ब्राह्मणों के भावी दुष्प्रचार का अनुभव कर के, एहसास कर लिया था, कि ये ब्राह्मण लोग मेरे अवसान के बाद, मुझे चर्मकार के रूप में समाज में प्रस्तुत करेंगे, इसीलिए उन्होंने अपने इस सत्य को लेखनीबद्ध कर के अपनी भावी पीढ़ियों के लिए अपने व्यवसाय की पूरी जानकारी दी हुई है। गुरु रविदास जी महाराज इस शब्द में लिखते हैं कि:---
चमरठा गाँठि न जनई।।
लोगु गठावैं पनही।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि हम चमड़े का काम करना नहीं जानते हैं और ना ही कभी चमड़े के जूतों को गांठा है अर्थात जूतों की मुरम्मत कभी भी नहीं की है, मगर हमारे सेवक रैदास और जगजीवन दास जी जूतों की मरम्मत अवश्य करते हैं, जो लोग जूते गठवाते हैं, उन से हम मजदूरी भी नहीं लेते हैं, मगर हम ने कभी जूते नहीं गांठे हैं।
आर नाहिं जिह तोपिऊ।।
नाहिं राँबी ठाऊँ रोपिऊ।।१।।
गुरु रविदास महाराज अपने व्यवसाय के प्रति स्पष्ट करते हुए फरमाते हैं, कि मेरे पास फटे हुए जूतों को टांके लगाने वाली कुंडी नहीं है, जिस से फटे पुराने जूते को पुन: सिलाई की जाती है और टांके लगाए जाते हैं। हमारे पास कोई चमड़े को काटने वाली रंबी भी नहीं है, जिससे टेढ़े-मेढ़े उबड़ खाबड़, चमड़े को छील कर सीधा किया जाता है। ऐसा भी कोई स्थान नहीं है, जहां पर हम बैठ कर जूतों के ऊपर टाकी चढ़ाने का काम करता हूं।
लोगु गाँठी गाँठी खरा बिगूचा।।
हँऊँ बिनु गांठे जाई पहुंचा।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज अपनी अध्यात्मिक शक्ति का वर्णन करते हुए फरमाते हैं, कि धन सम्पन्न और अच्छे अच्छे श्रेष्ठ कुलों में जन्म ले कर के जिन लोगों ने गांठने का काम किया है, वे उस जगह पर नहीं पहुंच सके हैं, जिस जगह पर मैं दूसरों से जूते गठवाने वाला बिना जूते गांठे ही पहुंच गया हूं।
रविदास जपै राम नामा।।
मोहि जम सिऊँ नहीं कामा।।३।।७।। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि मैं तो राम नाम अर्थात आदपुरुष को प्राप्त करने के लिए केवल सोहम सोहम जाप करता हूं और इसी भक्ति के कारण मेरे समीप कोई यमदूत नहीं आ पाता है और ना ही मुझे यमदूतो से कोई, किसी प्रकार का सरोकार है अर्थात मुझे उनसे कोई संबंध नहीं पड़ता है।
शब्दार्थ:--- चमरठा-चमड़ा। गाँठी-मुरम्मत करना। जनई-जानता हूँ। गठावै-मुरम्मत करवाते। पनही-जूते, पांव में पहनने वाली पनहियाँ। आर-जूतों में टांके लगवाने वाली कुंडी। तोपिऊ-टांके लगाना। राँबी-चमड़े काटने वाला औजार। ठाऊँ-जगह, स्थान। रोपिऊ-एक टुकड़ा दूसरी फ़टी हुई जगह रोपना अर्थात फ़टी हुई जगह पर कुंडी धागे से लगाना। खरा-अच्छा। बिगूचा-पथभ्रष्ट होना, भटकना। पहुंचा-पहुंच जाना। मोहि-मुझे। जम-यम। कामा-काम, कार्य, कोई मतलब नहीं, संबंध।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।

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