।जे उह अठसठि तीरथ नहावै।।

 

     जे उह अठसठि तीरथ नहावे।।
              ।।राग गोंड।।
हिंदुओं ने कई पवित्र शाही स्नान करने के लिए तीर्थ बनाए हुए हैं, शिव लिंगों के नाम पर बारह पत्थरों और कई कई गायों का दान करने, जनता की सुविधा के लिए कुएं और तलाब बनवाने, भूखों के लिए खाने के लिए लंगर लगाने के ढोंग रचे हुए हैं, यही नहीं अपने काल्पनिक अवतारों को मूर्ख बनाने के लिए अनेक प्रकार के धोती तिलक और शंख बजा कर भक्त आदिपुरुष को पाने के नाम पर आडंबर भी करते आ रहे हैं। गुरु रविदास जी महाराज इन सभी आडंबरों का खंडन करते हुए फरमाते हैं:---
जे उह अठसठि तीरथ नहावै।।
जे उह दुआदस सिला पूजावै।।
जे उह कूप तटा देवावै।।
करै निंदा सभ बिरथा जावै।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज धर्म के नाम पर किए जाने वाले आडंबरों और पाखंडों का खंडन करते हुए फरमाते हैं, कि भले ही कोई अठाहट तीर्थों पर शाही स्नान कर ले, भले ही बारह शिवलिंगों की पूजा करके शिव को प्रसन्न करने का ढोंग रचते रहें, भले ही वे लोगों की सुविधाओं के लिए कुएं, बाबड़ी और तालाब बनाएँ, परंतु यदि वे परिपूर्ण सम्पूर्ण, ज्योतिर्ज्ञानी साधु, संतों की निंदा करते हैं, तो उन अज्ञानियों का सब कुछ व्यर्थ ही जाता है।
साध का निंदक कैसे तरै।।
सरपर जानहु नरक ही परै।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज स्पष्ट रूप से फरमाते हैं कि निंदक का कल्याण किस प्रकार हो सकता है? उस के सिर पर पापों का घड़ा भरा हुआ है, इसलिए उसे निश्चित रूप से ही दुख रूपी नरकों की सजा झेलनी पड़ती है। अर्थात जीवन भर आधियों व्याधियों में ही जीना पड़ेगा।
जे उह ग्रहन करै कुलखेति।।
आरपै नारि सिंगार समेति।।
सगली सिम्रिति सर्वनी सुनै।।
करै निंद कवनै नहीं गुनै।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि चाहे निंदा करने वाले मनुष्य मृत्यु को पढ़कर या उस की शिक्षकों को सुनकर उस के अनुसार ग्रहण के दिन कुरुक्षेत्र में जाकर के कितना ही शाही स्नान क्यों ना करें, आभूषणों से सुसज्जित कर के अपनी पत्नी को ब्राह्मण को क्यों ना दान कर दे, चाहे कानों से सभी स्मृतियों की कथाएँ सुने, मगर इतना करने के बावजूद भी यदि कोई सच्चे सुच्चे, गुणवान सन्तों की निंदा करे और किसी की भी अच्छी बात को ना सुने, तो ये सारे आडंबर व्यर्थ ही जाते हैं।
जे उह अनिक प्रसाद करावै।।
भूमिदान सोभा मण्डपि पावै।।
अपना बिगारि बिरांना साढै।।
करै निन्द बहु दुख हाँडै।।३।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि यदि निंदा करने वाला निंदक अनेकों ही यज्ञ कर के देवताओं को अनेक प्रकार के भोग लगाने के लिए प्रसाद अर्पण करें, कितनी ही भूमि दान करें, कितने ही मंदिर बनाए, चाहे अपना कितना ही नुकसान उठा कर दूसरों का भला करे, परंतु परिपूर्ण साधु-संतों की निंदा करने वाला व्यक्ति अनेकों दुखों से (हांडे) गुजरता है अर्थात उसे आजीवन दुख ही दुःख सहन करने पड़ते हैं,जिन से उस का जीवन नरक बन जाता है।
(गुरु रविदास जी की विचारधारा के अनुसार पुनर्जन्म नहीं होता है, इसलिए यहां बहु योनि शब्द उन की विचारधारा के अनुसार मेल नहीं खाता है, इसलिए यह शब्द मनुवादी विचारधारा के लोगों ने मिश्रित किया हुआ लगता है।
निंदा कहा करहु संसारा।।
निंदक का परगटि पहारा।।
निंदक सोधि साधी विचारिआ।।
कहु रविदास पापी नरकि सिधारिआ।।४।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि हे संसार के लोगो! तुम निंदा क्यों करते हो? निंदा करने वाला एक दिन सामने आ ही जाता है, एक दिन उस का भेद खुलकर प्रकट हो ही जाता है। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि हे मूर्ख लोगो ! हम ने बड़ी खोजबीन कर के सोच विचार करने के बाद यही परिणाम निकाला है, कि बुरे कर्म करने वाले और निंदा करने वाले नरकों (दुःखों) को ही प्राप्त होता है अर्थात दुखों में ही जीवन गुजारते हुए मरते हैं।
शब्दार्थ:--- जे-यदि। उह- वह। अठसठि- अठाहसट, अठाहट। तीरथ- तीर्थ। दुआदस- बारह शिवलिंग (सोमनाथ गुजरात के काठियावाड़ में, शैल मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग मद्रास कृष्णा नदी के तट पर, महाकालेश्वर उज्जैन मध्यप्रदेश, ओंकारेश्वर मध्यप्रदेश में नर्वदा नदी के तट पर, केदारनाथ हरिद्वार से 150 किलोमीटर हिमालय पर्वत पर, घुमेश्वर महाराष्ट्र के एलोरा गुफा के पास, विश्वेश्वर नाथ बनारस में, रामेश्वरम त्रिचनापल्ली में, नागेश्वर गुजरात के द्वारकाधाम, बैजनाथ हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में, भीमाशंकर महाराष्ट्र की भीमा नदी के तट पर, त्र्यंबकेश्वर नासिक के समीप, कालेश्वर देहरा जिला कांगड़ा की व्यास नदी के किनारे पर)। पूजावै- पूजा करे। कूप- कुआं। तटा- तालाब। देवावै- दिलाए, बनावे। निन्द- निंदा। सरपर-सिर के ऊपर, निश्चित, अवश्य। नरक- दुख, मुशीबतें।  कुलखेती- कुरुक्षेत्र। अरपै- अर्पण करना, दान देना। सर्वनी- कानों से। ग्रहन- चांद, सूर्य ग्रहण आदि। सगली- सारी। कवनै- किसी की। अनिक- अनेकों। मंडपी-आददुआरा, मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा, शादी विवाह आदि के यज्ञ मंडप। बिगारि- बिगाड़ना। बिरांना- पराया। सांढै- संवारना। हाँढै- चलना, भटकना। पहारा- संसार। सोधि- जांचना, निर्णय करना। बिचारिआ- विचारना। नरकि- दुख पाना। सिधारिआ- जाना।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।

Comments

Popular posts from this blog

गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी दोधारी है।

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।।

।।राम बिन संशय गाँठि न छूटे।।