।।जिह कुल साधु वैसनो होइ।।

 

        ।।जिह कुल साधु वैसनो होइ।।
      .      ।।राग बिलाबल।।
गुरु रविदास जी महाराज सृष्टि के रचयिता आदपुरुष से चले आ रहे आदवंश के सूर्यवंशी नागवंश में जन्में साधु सन्तों के आदर्श जीवन के बारे में फरमाते हैं, कि उन के समय में भारत में कोई वर्ण व्यवस्था, जातिपाति नहीं थी। किसी को भी भक्ति करने से रोका नहीं जाता था। किसी को भी ब्राह्मण, राजपूत और वाणियाँ नहीं कहा जाता था। कोई भी ऊँच नीच नहीं थी। किसी को भी चंडाल, म्लेच्छ नहीं कहा जाता था, जो आदपुरष की प्रेमाभक्ति करते थे, वही परिपूर्ण सत्पुरुष साधु और संत कहलाते थे। गुरु रविदास जी ने कभी भी हिंदुओं के कल्पित देवी देवताओं को मान्यता नहीं दी है मगर फिर भी उन की वाणी में ब्राह्मणों ने हिंदूवाद का मिश्रण कर दिया है, जिसे पाठकों को पहचानना होगा।
जिह कुल साधु वैसनो होइ।।
बरन अबरन रँकु नहीं ईशरू।।
बिमलु बासु जानिए जगि सोइ।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, जिस वंश में सदविचारों वाले परिपूर्ण ज्योतिर्ज्ञानी, गुरु सन्त, महात्मा अवतार लेते हैं, वे वर्ण-अवर्ण का रचमात्र भी विचार नहीं करते हैं। वे सारे संसार को ही निर्मल, पवित्र लोगों का निवास गृह (बासु ) समझते हैं।
ब्रह्मण बैस सूद अउर खत्री,
डोम चंडाल मलेछ मन सोइ।।
होइ पुनीत भगवंत भजन ते,
आपु तारि तारे कुल दोइ।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि चाहे मलिन मन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, सूद, खत्री, डोम, चांडाल और मलेच्छ का ही मन हो, यदि पवित्र मन से वे पांच विकारों, आठ अबगुणों को त्याग कर, आदपुरुष का भजन करते हैं, तो वे स्वयं भी सांसारिक दुखों से मुक्ति पा जाते हैं और दूसरों का भी कल्याण कर देते हैं अर्थात ऐसे परिपूर्ण संत अपने कुल का कल्याण करते ही हैं मगर दूसरों के कुलों को दुखों से मुक्त कर देते हैं, उन का कल्याण कर देते हैं
धंनि सु गाऊँ धंनि सु ठाऊँ,
धंनि पुनीत कुटुंभ सभ लोइ।।
जिनि पिआ सार रसु तजे आन रस,
होइ रस मगन डारे विखु खोइ।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि वे गांव और स्थान और पवित्र परिवार धन्य हैं, जिन में परिपूर्ण ज्योतिर्ज्ञानी संत, महात्मा जन्म लेते हैं, जिन्होंने सांसारिक रसों के आनंद को त्याग कर, परमपिता परमेश्वर आदपुरुष के रहस्य को पाया है, जिन्होंने भक्ति रस में लीन होकर के सभी प्रकार के विषैले रसों अर्थात काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार आदि को छोड़ दिया है।
पंडित सूर छत्रपति राज,
भगत बराबरी अउरू न कोइ।।
जैसे पुरैन पात रहै जल समीप,
भनि रविदास जनमैं जगि उइ।।३।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि चाहे कोई कितना ही बड़ा विद्वान हो, वीर चक्रवर्ती छत्रपति सम्राट हो क्यों ना हो, वह परिपूर्ण गुरु, संत के बराबर नहीं होता है। परिपूर्ण संत उसी प्रकार सांसारिक माया, काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार आदि विशेष कारणों से निरपेक्ष रहते हैं, जिस प्रकार जल के बीच कमल और कमलिनी रह कर निर्जल होकर रहते हैं, अर्थात पानी की बूंद तक अपने तन पर ठहरने नहीं देते मगर वे जल के बिना जिंदा भी नहीं रह सकते जिस प्रकार कमल, कमलिनियों की पत्तियों को जल छू तक हीं पाता उसी प्रकार गुरुओं, पीरों और संतो को भोग विलास आदि बुराईयां अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकते हैं। धन्य है वो परिपूर्ण पीर, संत, महात्मा जो संसार में आ कर मायाजाल से दूर रह कर के आदपुरुष के चरणों में मगन रहते हैं अर्थात परिपूर्ण शांत आदपुरुष के चरणामृत में रह कर ही जीवित रह सकते हैं।
शब्दार्थ:--- साधु-भला, गुणवान ज्योतिर्ज्ञानी।बैस-क्षत्रिय जिन का गोत्र भारद्वाज; सूर्यवँशी क्षत्रिय; नागवंश के क्षत्रिय। बरन-वर्ण, जाति। अबरन-अवर्ण। रँकु-कंगाल, गरीब। ईशर-अमीर, धनाढय। बिमल-स्वच्छ, पवित्र। बास-सुगंध। सोइ-वही, शोभा। डोम-मरासी। चंडार-चंडाल। मलेश-मलेच्छ। सार-निचोड़, श्रेष्ठ। आन-अन्य। मगन-तल्लीन, मुग्ध। डारे-छोड़ना, त्यागना। बिख-विष, विकार रूपी जहर। खोइ-गंवा देना। सूर-वीर, बहादुर। छत्रपति-छत्र धारण कर के चलने वाला सम्राट। अउर-अन्य, दूसरा। पुरैन पात-कमल, कमलिनी की पत्तियां। समीप-नजदीक। भनि-कहना। उइ-वही संत।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।।।

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