।।जब हम होते तब तू नाही।।
।।जब हम होते तब तू नाही।।
।।राग सोरठ।।
गुरु रविदास जी महाराज विश्व में अकेले ऐसे संत महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने अपने विचार हर क्षेत्र में व्यक्त किए हुए हैं। गुरु जी ने सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक मनोविज्ञान, ज्ञान विज्ञान, अर्थशास्त्र, तर्कशास्त्र, जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, आदि विषयों पर बड़ी गंभीरता से चिंतन करके तीव्र विहंगम दृष्टि से देख कर, परख कर नए सिद्धांतों का सृजन किया हुआ है। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि:---
ऐसा चाहूं राज में जहां मिले सबन को अन्न।
छोट बड़ सभ सम वसै तां रविदास रहे प्रसन्न।। इन पंक्तियों में गुरु जी ने विश्व के लिए वास्तविक समाजवाद का सिद्धांत ढूंढ निकाला है, जिसका अनुकरण कर के कार्ल मार्क्स ने समाजवाद के बड़े-बड़े ग्रंथ लिख डाले हैं और उनका अनुकरण करके आज कम्युनिस्ट विचारधारा के लोग कई वर्षों से शासन कर रहे हैं। गुरु रविदास महाराज ने, प्रस्तुत शब्द में भौतिक विज्ञान की व्याख्या भी की हुई है, जिस प्रकार शीशा (प्रिजम) देखने में सफेद लगता है मगर जब उसको चमकते सूर्य के सामने रखा जाता है, तो शीशे से सात रंग निकलते हुए नजर आते हैं, यही सिद्धांत गुरु जी ने प्रस्तुत शब्द में आत्मा और परमात्मा के बारे में सिद्ध किया हैं, जिस प्रकार काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार से ग्रस्त आत्माएं सतरंगी किरणों की तरह अलग अलग नजर आती हैं, परंतु जब यही आत्मा काम, क्रोध, मोह, लोभ, माया और अहंकार से मुक्त हो कर के सत्य के मार्ग पर चल कर इमानदारी से अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करती है, किसी की आत्मा को दुखी नहीं करती है, हमेशा सच बोलती है और प्रतिदिन हरि को याद करने के लिए "सोहम- सोहम" का जाप करती है, तब यही आत्मा परमात्मा में विलीन होकर के एक हो जाती है अर्थात तूँ और मैं का भेद समाप्त हो जाता है।
जब हम होते तब तू नाही,
अब तू है मैं नाही।।
अनल अगम जैसे लहरि मई उदधि,
जल केवल जल मांही।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि हे आद पुरुष जब मैं सांसारिक बंधनों में बंध कर काम, क्रोध, मोह,माया, लोभ और अहंकार के कारण संदेहों और भ्रमों के बीच उलझा हुआ था, तब आप मुझ से बहुत दूर रहते थे, आप मुझे नजर नहीं आते थे, परंतु जब से मैंने सामाजिक बंधनों को तोड़कर केवल आपका दामन थामा है और काम, क्रोध, मोह, लोभ अहंकार और माया से किनारा कर लिया है, तब से मेरा अहम समाप्त हो गया है और मैं की भावना भी समाप्त हो गई है। यह तभी संभव हो सका है जब आपने मुझे दर्शन दिए हैं, इसीलिए गुरु जी फरमाते हैं, कि जब हम नजर आते थे तब आप दिखाई नहीं देते थे, अब आप मुझे दिखाई दे रहे हैं, तो मैं ओझल हो गया हूं अर्थात मेरी आत्मा आपकी आत्मा में छुप गई है और मैं भी किसी को नजर नहीं आ रहा हूं, जिस प्रकार हवाओं के झोंकों के चपेड़ों से गहरे सागर में लहरें उठती हुई नजर आती हैं मगर तुरंत वे पानी में विलीन हो जाती है, लहरों के भ्रम के कारण ही वे पानी नजर नहीं आती थीं मगर जब वे पानी में विलय हो गईं तभी ज्ञात हुआ कि वे तो पानी ही थीं, यही दशा मेरी और आप की ज्ञात होती थी मगर आप के मिलन के बाद ये संदेह मिट गए हैं।
माधवे क्या कहिए भ्रम ऐसा,
जैसा मानिए होइ न तैसा।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज तर्क देते हुए फरमाते हैं कि, हे आदपुरष! वायु के तीव्र वेग से सागर में अथाह लहरें उठती हुई नजर आती हैं, मगर बाद में वे सभी पानी में मिल कर पानी ही बन जाती हैं, इसलिए हे माधव! यह संसार लहरों की तरह एक भ्रम ही ऐसा है, जिस के बारे में क्या कहा जाए? हम इस को जिस प्रकार का समझते हैं और देखते हैं, वह वैसा होता नहीं है, इसलिए हम वास्तविकता को समझने में असमर्थ हैं।
नरपति एकु सिंघासनि सोईआ,
सपने भईआ भिखारी।।
अछत राज बिछुरत दुखु पाईआ,
सो गति भई हमारी।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि एक दिन राजा जनक सिहासन पर ही सो गया था और वह दिवास्वपन देख रहा था, कि किसी राजा ने, उस के राज्य पर आक्रमण कर दिया है और उसे अपना बंदी बना कर भिखारी बना दिया है, जिस के कारण राजा जनक राजपाठ के वियोग में बड़ा दुखी हो गया और विशाल राजपाठ के खो जाने पर दुख भोगने लगा, यही स्थिति मनुष्य जाति की है, मनुष्य भी सांसारिक बन्धनों में जकड़ कर के भ्रमों और संदेहों के बीच पढ़ कर, उलझ कर रह जाता है। आप से बिछड़ कर मनुष्य की हालत भी उस राजा की तरह ही हो जाती है, जो केवल स्वप्न में ही अपना राजपाठ खोकर भिखारी बनने पर दुखी हो रहा था और जब उस का स्वपन खत्म हुआ तो वह अपने आप को सिहासन पर देख कर परेशान हो गया। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि आप से बिछड़ कर के मनुष्य जाति का भी हाल राजा जनक की तरह ही होता है।
राजु भुईअंग प्रसंग जैसे हहि,
अब कछु मरमु जनाइआ।।
अनिक कटक जैसे भूलि परे,
अब करते करनु न आईआ।।३।।
गुरु रविदास जी महाराज मनुष्य जाति को संसारिक बंधनों से मुक्त करवाने के लिए सांप और रस्सी, सोने और सोने से बने कंगनों का प्रसंग बताते हुए समझाते हैं, कि जिस प्रकार हम रस्सी को सांप मान कर दुखी होते हैं, इसी तरह सोने से बनाए गए कंगन और आभूषणों के भ्रम का आभास करते हैं। हम कड़ें, कंगन आदि गहनों को भिन्न-भिन्न नामों से पुकार कर भ्रम में पड़े रहते हैं, मगर होते सभी सोना ही हैं, इस प्रकार परमात्मा भी सोने की तरह केवल एक ही है मगर उसके अंश जीव हैं, वे भी भ्रम के कारण ही अपने आप को परमात्मा से अलग मानते हैं, इसलिए आत्मा और परमात्मा के बीच कोई भी अंतर नहीं है, जिस प्रकार अनेकों आभूषणों और सोने में अंतर नहीं होता है अर्थात दोनों एक ही हैं। गुरु जी फरमाते हैं कि अब कुछ रहस्य का बोध हुआ है।
सरवे एकु अनेकै सुआमी सभ घट भोगवै सोई।।
कहि रविदास हाथ पै नेरै सहजे होइ सु होइ।।४।।१।।
जब गुरु रविदास जी महाराज को आदपुरष के अलौकिक दर्शन हो गए, तो उस विचित्र अवस्था का वर्णन करते हुए वे फरमाते हैं, कि देखने में तो जीव अनेक लगते हैं, परंतु सभी के बीच वही परमपिता परमेश्वर ही होता हैं। जब मनुष्य के भ्रम दूर हो जाते हैं तो उसे सभी प्रकार की भोग विलास की वस्तुओं का प्रयोग करते हुए स्वत: आदपुरष ही दृष्टिगोचर होते हैं। गुरु जी फरमाते हैं, कि आदपुरुष एक हाथ से भी समीप है और जो उन को सरल लगता है, उसी के अनुसार ही वह सब कुछ करता है, उसी की इच्छा से सब कुछ होता है।
इस शब्द में गुरु रविदास जी महाराज ने प्रभ से मिलन के बाद की स्थिति का वर्णन किया है, कि जब उन के अलौकिक दर्शन हो जाते हैं, तो मेरा और तेरा संबंध खत्म हो जाता है और दोनों ही एकाकार हो जाते हैं।
शब्दार्थ:--- अनल-वायु, हवा। अगम-अथाह, जहां जाना कठिन हो, भेद पाना मुश्किल हो। लहरि-तरंग, लहर, मन में उठने वाली उमंगें। मइ-बीच, मध्य। उदधि-सागर, समुन्द्र। नरपति-महाराजा। सिंघासनि-सिंहासन। अछत राज-विशाल साम्राज्य। बिछुरत-बिछुड़ना। राजु-रसी रज्जू। भुईअंग-सांप। प्रसंग-सन्दर्भ, हवाला, किसी की टिप्पणी। मरमु-भेद, रहस्य। कहनु-कहना, कथन। जनाइआ-समझाया। अनिक-अनेकों। कटक-कंगन, कड़ा। घट-मन, शरीर। भोगवै-विलासिता की वस्तुओं का भोग करना। पै- पर, से। नेरै-नजदीक, समीप। सहजे-सरलतापूर्वक, आसानी से।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
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