मुकंद मुकंद जपहु संसार।।
।।मुकंद मुकंद जपुह संसार।।
।।राग गोंड।।
मुकन्द शब्द, मकरंद शब्द का पर्यायवाची है। जिस का तार्किक और लक्ष्यार्थ अनुभव होता है, आदपुरष। शहद, खून, शर्म, हया जिन के बिना शरीर व्यर्थ हो जाता है, बेकार लगता है, शरीर बर्बाद हो जाता है। शरीर की आभा और चमक समाप्त हो जाती है। गुरु रविदास जी महाराज मुकंद शब्द को परिभाषित करते हुए फरमाते हैं, कि मुकंद मुकंद सारा संसार जपता है, जिस से साफ स्पष्ट होता है, कि मुकंद शब्द सर्वश्रेष्ठ, सर्वोपरि, सर्वोच्च और सर्वोत्तम शक्ति के लिए ही प्रयोग किया गया है, जिस के बिना किसी का शरीर कार्य नहीं कर सकता है। जब किसी चीज के बिना शरीर चल ही नहीं सकता है, तो वह बहुत ही सुखी और आनंदमयी जीवन के लिए उपयोगी और आवश्यक हुआ करती है। गुरु रविदास जी महाराज ने यहाँ मुकंद शब्द का, बार-बार प्रयोग किया गया है, इसलिए यह शब्द बहुत ही सर्वोच्च शक्ति के लिए प्रयोग किया गया लगता है, जिसका वजूद खत्म करने के लिए हिंदुओं ने इस शब्द को अपने कल्पित अवतारों के लिए प्रयोग किया है, जबकि ये सभी अवतार अभी-अभी पांच हजार साल पहले माता के गर्भ से पैदा हुए हैं, फिर इस शब्द का इन लोगों द्वारा प्रयोग करना, इस देश के मूल मूलनिवासियों के साथ सरासर अन्याय व धोखा है। भारतवर्ष के मूलनिवासियों के गोल्डन इतिहास को समाप्त करने का एक वहुत बड़ा षडयंत्र रचा गया है, मगर गुरु रविदास जी महाराज ने अपनी वाणी में आज से छः सौ वर्ष पहले मुकंद शब्द की पवित्रता,महत्ता और सर्वोच्चता का चित्रण कर के, भारत के आदिवासियों के इतिहास को निम्नलिखित ढंग से जिंदा किया है।
मुकंद मुकंद जपुह संसार।।
बिनु मुकंद तनु होइ अउहार।।
सोइ मुकंदु मुक्ति का दाता।।
सोइ मुकंदु हमरा पिता माता।।१।।
विश्व में गुरुओं के गुरु, संतों में शिरोमणि संत केवल गुरु रविदास जी महाराज ही हुए हैं। उन की वाणी का अध्ययन करने से अनुभव होता है, कि विश्व में आध्यात्मिक क्षेत्र में उन का कोई भी संत साम्य नहीं रखता है। वे इस शब्द में मुकंद का बार-बार प्रयोग कर के संगत को समझाते हैं कि, हे संसार के लोगो! सारा संसार मुकंद का ही जाप करता है, इस मुकंद के बिना यह शरीर बेकार ही नहीं होता अपितु नष्ट हो जाता है। गुरु रविदास जी महाराज समझाते हैं, कि वही मुकंद मुक्ति का दाता है और वही मुकंद हमारा माता और पिता है। इस का स्पष्ट अर्थ यही निकलता है, कि गुरु जी मुकंद शब्द, आदिपुरुष, ईश्वर, परमात्मा को ही प्रयोग करते हैं और जो शब्द हिंदुओं ने इस के लिए प्रयोग किए हैं, उन का ईश्वर से कोई संबंध नहीं है। गुरु रविदास जी महाराज ने मानव जीवन के सारांश और महत्व की परिभाषा देते हुए बताया है, कि मुकंद ही जीवन का सार है।
जीवत मुकंदे मरत मुकंदे।।
ता के सेवक कोऊ सदा आनंदे।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे मानव! तूँ जीते जी भी मुकंद का ही अंश रहता है और मरते समय भी मुकंद तेरे अंदर रहता है मगर मुकंद का आनंद कोई विरला सेवक हमेशा ले पाता है। इन दो पंक्तियों में गुरु रविदास जी के कहने का तात्पर्य यही नजर आता है, कि जीते जी और मरते समय मुकंद हमेशा साथ रहता है, इसीलिए इस शब्द का अर्थ उन्होंने आदपुरुष के लिए ही किया है, क्योंकि मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार ही सुखी और दुखी रहता है और मरते समय भी मनुष्य की लीला सुख और दुख से ही समाप्त होती है।
मुकंद मुकंद हमारे प्रानँ।।
जपि मुकंद मसतकि निसानं।।
सेव मुकंद करै बैरागी।।
सोई मुकंद दुरबल धनु लाधी।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज मुकंद शब्द की महत्ता, परिपूर्णता सम्पूर्णता और सर्वोच्चता का वर्णन करते हुए फरमाते हैं, कि मुकंद, मुकंद ही हमारे सांस अर्थात जीवन के स्त्रोत हैं। मुकुंद मुकुंद जपने से माथे पर अलौकिक नूर उत्पन्न हो जाता है अर्थात ज्योतिर्ज्ञान जागृत हो जाता हैं। यदि बैरागी आदपुरुष की सेवा के लिए मुकुंद मुकुंद जाप करता है, तो गरीब से गरीब, अति निर्धन व्यक्ति भी मुकंद रूपी धन दौलत से भरपूर हो जाता है।
एकु मुकंदु करै उपकारु।।
हमरा कहा करै संसारू।।
मेटी जाति हुए दरबारि।।
तुहि मुकंद जोग जुग तारि।।३।।
गुरु रविदास जी महाराज मुकुंद की विशेषताओं को समझाते हुए फरमाते हैं, कि मुकंद का जाप करने से सब का उपकार और भलाई हो जाती है। उस का संसारी लोग क्या बिगाड़ सकते हैं? इस से जाति पाति मिट जाती है और राजाओं, महाराजाओं के दरबारी बन जाते हैं। मुकंद ही इसी योग्य है कि, वह इस युग में काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार से बचा कर आदमी का कल्याण करता है अर्थात भवसागर से पार लँघा सकता है।
उपजिउ गिआनु हुआ परगास।।
कर किरपा लीने कीट दास।।
कहु रविदास अबु तृसना चूकी।।
जपि मुकंद सेवा ताहू की।।४।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि मुकंद की कृपा से मेरे अंदर ज्योतिर्ज्ञान उत्पन्न हो गया है, जिस के कारण मेरे मन में प्रकाश हो गया है और मुझ जैसे कीट पतंगे, कीड़े मकोड़े जैसे दास को अपना सेवक बना लिया है। आदपुरुष की सेवा ही मुकंद मुकंद जाप करने से हुई है।अब मेरी सभी सांसारिक, मानसिक तृष्णाओं अर्थात इच्छाओं के विकार मिट चुके हैं।
शब्दार्थ:--- मुकंद-मीठा, शहद, मकरंद, दुखों से मुक्त करने वाला आदपुरष। जपहु-जाप करना। अउहार-बेकार, बर्बाद। जीवत-जीते जी। निसानँ-ज्योतिर्ज्ञान रूपी निशान, प्रमाणिकता का सबूत। दुर्बल-कमजोर। धनु-धन, रुपए।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।
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