।।चित, सिमरनु करउ ने अविलोकनो।।
।।चित सिमरनु करउ ने अविलोकनो।।
।।राग धनासरी।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि चित और हृदय पल पल, क्षण क्षण अपना अपना काम करते रहते हैं। चित विचार करता रहता है मन विचार को समझ कर, परख कर उस को स्वीकार कर लेता है और हिर्दय अर्थात दिल भावनात्मक रूप से निर्णय ले कर चित और मन की विचारधारा को आलोचनात्मक दृष्टि से परख कर उसे अपने अंदर जज्ब कर लेता है, इसी संयुक्त निर्णय को हमारी बुद्धि स्वीकार कर के उस पर काम करना शुरू कर देती हैं। आंख, कान, नाक, जीवा, चमड़ी और अंतःकरण के सहयोग से मन अपना काम शुरू करते हैं और सभी फल प्राप्ति की ओर अग्रसर होते हैं। चित, मन, हृदय और चमड़ी अपने बौद्धिक विचारों को किस प्रकार कार्य रूप देते हैं, उस का चित्रण इस शब्द में बड़े ही मार्मिक ढंग से किया गया है:---
चित सिमरनु करउ नैन अविलोकनो,
सरवन वाणी सुजसु पूरि राखउ।।
मनु सु मधुकरु करउ चरण हिरदै धरउ,
रसनु अमिरत राम नाम भाखउ।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज, परमपिता परमेश्वर अर्थात आदपुरुष के समक्ष प्रार्थना करते हैं, कि हे आदिपुरुष! मेरा मन रूपी भ्रमरा आप का हर पल पल सिमरन करता रहे, मेरी आंखें निरंतर आप के दर्शन करती रहें, मेरे कान आप की श्रेष्ठ और पवित्र, यशस्वी वाणी को सुन कर तृप्त रहे, मेरी जिव्हा अमृत रूपी मीठे रस (नाम) का पान (भाखउ) उठते, बैठते, सोते समय करती ही रहे अर्थात सोहम सोहम जाप हर समय उच्चारण करती रहे, हमेशा आप के चरण कमलों में मेरा हृदय टिका रहे।
मेरी प्रीत गोविंद सिऊँ जिनि घटै।।
मैं तउ मोलि महंगी लई जीअ सटै।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज ने अत्याचारी ब्राह्मणों राजाओं, महाराजाओं और बादशाहों द्वारा दी गई अनेकों यातनाओं को सहन करने के बदले (सटै) परमपिता परमेश्वर के दर्शन कर के उन की प्रीत प्राप्त की थी, जो बड़ी महंगी पड़ी थी, उन्हीं कठिन, दारुण क्षणों को याद करते हुए, गुरु रविदास जी महाराज बड़े बेचैन व्याकुल हो कर के आदपुरुष के समक्ष प्रार्थना करते हैं, कि हे आदपुरुष! मेरा पवित्र प्रेम हमेशा आपके साथ समरस हो कर के बना रहे। यह प्रेम कहीं तिनके के बराबर भी कम ना हो, हे मेरे आद पुरुष! मुझे तो यह संताप संतप्त कर रहा है कि, कहीं मेरा और आपका संबंध रँच मात्र भी कम (घटै) ना हो जाए, इस की चिंता मेरे मन को खाए जा रही है, इसलिए हे मेरे आदि पुरुष! मुझ पर कृपा दृष्टि बनाए रख कर मेरे प्रेम की, प्रीत की रक्षा करना।
साध सँगत बिंना भाऊ नहीं उपजै,
भाव बिनु भगति नहीं होइ तेरी।।
कहै रविदास इक बेनती हरि सिऊँ,
पैज राखहु राजा राम मेरी।।२।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज परमपिता परमेश्वर अर्थात आदपुरुष के समक्ष अरजोई करते हैं, कि हे आदपुरुष! साध संगत के बिना आप के प्रेम की उत्पत्ति मन में नहीं होती है, ना ही हो सकती है और ना ही साध संगत के बिना ज्योतिर्ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है, इसीलिए गुरु रविदास जी प्रार्थना करते हैं कि हे आदपुरुष! मुझे अपने प्रेम और ज्ञान की बख्शिश कर के मेरी इज्जत बनाए रखना।
शब्दार्थ :--- चित-मन, चिंतन करना।अविलोकनो-देखना। सरवन-सुनना। सुजसु-सुप्रसिद्ध, बहुत सम्मान। पूरी राखउ-पूरा भरा हुआ रखना।। मनु-मन। हिरदा-हिरदय, शरीर। धरउ-धारण करना। रसनु-रस लेने वाली जीभ। भाखउ-बोलना, कहना, खाना। जिनि-कहीं। घटै-कम। सटै-बदले में। भाउ-प्रेम, प्यार, प्रीत। पैज-इज्जत, मॉन, लज्जा। राजा राम- परमपिता परमेश्वर अर्थात आदिपुरुष।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अगस्त 16, 2021।
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