।। बिन देखे उपजै नहीं आसा।।

 

   ।।बिन देखे उपजै नहीं आसा।।
            ।।राग भैरों।।
गुरु रविदास जी महाराज परिपूर्ण संपूर्ण गुरुओं के गुरु संतों में शिरोमणि संत हुए हैं।वे उच्च स्तर के विचारक, चिंतक, आलोचक, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक हुए हैं, उनका दृष्टिकोण संकीर्ण ना हो कर विश्वव्यापी था, इसीलिए गुरु जी ने "बेगमपुरा शहर को नांऊँ" की खोज की थी, यही नहीं वे एक सफल समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपने दृढ़ विश्वास और निडर आत्मा से क्रूर, दुष्ट, अज्ञानी और छुआछूत के समर्थक ब्राह्मणों का मुकाबला किया है, जिस में वे हर कदम कदम पर जीत हासिल करते हुए आगे बढ़ते ही गए थे और छुआछूत के समर्थक हारते गए थे। गुरु जी का दृष्टिकोण मनोवैज्ञानिक था वे हर चीज को आलोचनात्मक दृष्टि से परखते और समझते थे। पुरानी आडंबरपूर्ण मान्यताओं को रद्द कर के तर्कपूर्ण नए सिद्धांतों का सृजन किया करते थे, इसीलिए उन्होंने समाजवाद का नया सिद्धांत खोज कर कहा कि:---
"ऐसा चाहूँ राज में जहां मिले सबन को अन्न,
छोट बड़ सभ सम वसै तां रविदास रहे प्रसन्न"।।
गुरु महाराज ने इस शब्द में सारे ब्राह्मणवाद को हिला कर के रख दिया था। सकल राजाओं, महाराजाओं और बादशाहों  के अस्तित्व को भी ग्रहण लगा दिया था, क्योंकि गुरु रविदास जी महाराज ने लोकतंत्र की स्थापना के लिए समाजवाद को जन्म दे दिया था, जिस से राजे महाराजे और बादशाह भी भयभीत हो उठे थे। गुरु जी के इस मानवीय सिद्धांत से सारे संसार  में समाजवाद की गूंज, गूंजने लगी थी। इसी कारण चीन, क्यूबा, लाओस, वियतनाम, रूस आदि देशों में समाजवाद आ गया। इन देशों के खूनी क्रांतिकारियों ने शोषक सामंतवादियों की सरकारों को खत्म करके समाजवाद की स्थापना तो कर दी मगर गुरुजी का जो सिद्धांत था, उस से हट कर के, इन कम्युनिस्टों ने शासन शुरू किया हुआ है। उन्होंने अमीरों, जागीरदारों के धन दौलत और धरती को छीन कर गरीबों  में बांटना शुरू कर दिया, जिस से अमीर गरीबों की लड़ाई शुरू हो गई मगर गुरु रविदास महाराज का सिद्धांत यह सिखाता है कि, किसी का कुछ छीन कर के, किसी को देना उचित नहीं है। वे गरीबी दूर करने के लिए नए नियम, संसाधन और तरीके इजाद करने की वकालत करते थे। गुरु जी ने धार्मिक क्षेत्र में भी क्रांति ला दी थी। पूजा पाठ कर के मूल निवासियों को सत्संग दे कर के ब्राह्मणों के किले में आग लगा दी थी। वे निर्जीव पत्थरों की पूजा करते हैं, मगर गुरु रविदास महाराज फरमाते हैं, कि ईश्वर का अस्तित्व है, इसीलिए वे कहते हैं, कि किसी को देखे बिना उस के प्रति कोई आशा उतपन्न हीं हो सकती है।
बिन देखे उपजै नहीं आसा।।
जउ दीसै सो होइ बिनासा।।
बरन सहित जो जापै नामु।।
सउ जोगी केवल निहकामु।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज तर्कशील आलोचक और समीक्षक हुए हैं, वे प्रयोगात्मक क्रिया कर के परिणाम निकाल कर के ही विश्वास करते थे, इसी लिए जब ब्राह्मण भगवान को पत्थरों में देखते हैं, जिस से वे समझते थे कि पत्थर पूजा से भगवान नहीं मिलते हैं और ना ही उन के दर्शन होते हैं, वे फरमाते हैं कि किसी चीज को देखे बिना मन में उसे पाने की इच्छा पैदा नहीं होती है, इसी तरह आदपुरुष को देखे बिना मन में उसे प्राप्त करने की इच्छा ही पैदा नहीं होती है। गुरु जी फरमाते हैं, कि धरती के ऊपर जो कुछ भी दिखाई देता है, वह सारा नष्ट होने वाला है अर्थात नष्ट हो जाता है। योगियों की परिभाषा देते हुए गुरु जी फरमाते हैं, कि जो व्यक्ति जातिवादी ऊंच-नीच और वर्ण व्यवस्था और छुआछूत होते हुए भी, आदपुरुष का ध्यान लगाता है, उस को पाने के लिए साधना और तपस्या करता है, वही योगी निष्काम योगी होता है अर्थात उस के मन में तनिक भी काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार नहीं होता है।
परचै रामु रवै जउ कोई।।
पारसु परसै दुविधा न होई।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि जो साधक जिस प्रकार लोहे को पारस धातु के साथ स्पर्श करने से सोना बन जाता है, वैसे ही साधक आदपुरुष का जब सिमरन करता है, तब उस का आदिपुरुष के साथ परिचय हो जाता है अर्थात साधक आदपुरुष के साथ साक्षात्कार कर लेता है अर्थात साधक रूपी लोहा जब पारस रूपी आदपुरुष के साथ स्पर्श करता है, तो वह साधक भी परमात्मा ही बन जाता है अर्थात जीव और परमेश्वर में कोई अंतर नजर नहीं आता है।
सउ मुनि मन की दुविधा खाइ।।
बिनु दुआरे तरै लोक समाइ।।
मन का सुभाउ सभ कोई करै।।
करता होइ सु अनभै रहै।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज मुनि की परिभाषा देते हुए फरमाते हैं, कि परिपूर्ण मुनि वह होता है, जो अपने श्रद्धालुओं की दुविधाओं, शंकाओं और  संदेहों को समाप्त कर देता है। इसी प्रकार मुनि संसार में निराकार, निर्गुण, अदृश्य, अगोचर परम पिता परमेश्वर के साथ समरस हो जाता है। गुरु रविदास महाराज फरमाते हैं, कि सभी लोग मन के स्वभाव और अपनी इच्छा के अनुसार तो सब काम करते हैं मगर जो परम पिता परमेश्वर अर्थात आदिपुरूष की तरह कर्म करने वाला कर्ता बन जाता है, वह निडर होकर के रहता है अर्थात सिमरन करने वाला व्यक्ति निर्भय हो जाता है।
फल कारन फूली बनराइ।।
फलु लागा तब फूल बिलाइ।।
गिआनै कारन करम अभिआसु।।
गिआनु भईआ तह करमह  नासु।।३।।
गुरु रविदास जी सर्वोच्च मनोविज्ञानी हुए हैं, वे फरमाते हैं, कि फल लगने के लिए ही जंगलों में पेड़ों के ऊपर फल फूल आते हैं, मगर जब फूल मर जाते हैं अर्थात सूख जाते हैं, तब उन के स्थान पर फल लगते हैं, इसी तरह साधक की काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार से विकृत सभी इच्छाएँ और विकार नष्ट हो जाते हैं, तभी उस को परमपिता परमेश्वर के दर्शन होते हैं और वह फल रूपी आदपुरुष को प्राप्त कर लेता है। गुरु जी फरमाते हैं, कि ज्ञान हासिल करने के लिए साधक निरंतर साधना और अभ्यास करता रहता है। वह अपने मन के विकारों को मिटाने के लिए निरंतर "सोहम सोहम" शब्द का जाप करता ही रहता है। जिस के कारण उस साधक को आध्यात्मिक ज्ञान हो जाता है और उस के बुरे कर्मों का नाश हो जाता है।
घिरत कारन दधि मथै सईआन ।।
जीवत मुकत सदा निरबान।।
कहि रविदास परम वैराग ।।
हिरदै रामु की न जपिसि अभाग।।४।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते, हैं कि बुद्धिमान लोग घी प्राप्त करने के लिए दही को मधानी के साथ बिलोड़ते हैं और निरर्थक बेकार पदार्थ को बाहर फेंक देते हैं, इसी तरह साधक भी निरंतर अभ्यास कर के परमपिता परमेश्वर को प्राप्त करता है और अपनी लस्सी रूपी बुराइयों को त्याग देता है। ऐसे साधक जीते जी ही बन्धनों से मुक्त हो कर दुखों से छुटकारा प्राप्त कर लेते हैं। गुरु रविदास जी महाराज भटके हुए दुर्भाग्यशाली साधकों को संबोधित करते हुए फरमाते हैं, कि हे भूले भटके साधकों! तुम अपने हृदय में निवास करने वाले राम के नाम का जाप क्यों नहीं करते हो? अर्थात आदिपुरुष प्राप्ति के लिए सिमरन क्यों नहीं करते हो? आदपुरुष परम बैराग से ही मिलते हैं अर्थात उन के दर्शन वैराग्य धारण करने से होते हैं।
शब्दार्थ:--- आसा-इच्छा, उडीक, तांघ।बिनासा-बिध्वंश, सर्वनाश। बरन-नियमानुस सैद्धान्तिक। निहकामु-निष्काम, निर्लेप, इच्छा रहित। परचै-परिचय, आपस में एक दूसरे के साथ विचार विमर्श करना। रवै-ध्वनि करना, जपना, सिमरन करना। परसै-स्पर्श करना, छूना। दुविधा-दो प्रकार के विचार, मन में सोचना कि क्या करूं या ना करूँ। भ्रम-शक, शंका, संदेह, बहम। खाई-खाना। बिनु-बिंना। दुआरे-दुआर। समाई-मिल जाना, समरस होंना, विलीन होना। करता-काम करने वाला यहाँ आदिपुरुष। अनभै-निडर, निर्भय, जिसे भय ना हो। बनराइ-वनस्पति, वनों में उतपन्न होने वाले पेड़ पौधे। गिआनै-ज्ञान संबधी। अभिआस-सीखने के लिए बार बार प्रयास करना। करमह-कर्मो का। दधि-दही। मथै-विलोड़ना, छोलना। निरबान-मुक्त, इच्छाओं से रहित। बैराग-साधना के लिए घर बार सब कुछ त्यागना, सांसारिक बन्धनों से मुक्त होना।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।

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