।।हम सरि दींन दईआल न।।

 

       ।।हम सरि दीन दइआल न।।
             ।।राग धनासरी।।
गुरु रविदास जी महाराज सृष्टि के रचयिता आदपुरुष से बातें करते हुए फरमाते हैं कि, हे आदपुरष! आप अति विनम्र, दयालु, क्षमाशील और परोपकारी हैं, जब कभी कोई आप से क्षमा याचना करता है, तो आप भोले भाले जीवों को क्षमा कर देते हैं और आप, साधना करने वाले को दर्शन देकर के अपने ज्योतिर्ज्ञान से विभूषित कर के ज्योतिर्ज्ञानी बना देते हैं, इसलिए गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि यह जनम आप के निमित अर्पित है।
हम सरि दीन दइआल न तुम सरि,
अब पतिआरू किआ कीजै।।
बचनी तोर मोर मनु माने,
जन कउ पूरनु दीजै।।१।।
मैंने पिछले शब्दों की व्याख्या करते हुए लिखा है कि, गुरु रविदास जी महाराज परिपूर्ण, संपूर्ण और ज्योतिर्ज्ञानी गुरु हुए हैं। सन्तों में सर्वश्रेष्ठ सन्त हुए हैं, इसीलिए उन्हें संत शिरोमणि कहा गया है। गुरु जी जब पीड़ित, दीन-दुखियों के दुख दर्द का पक्ष आदपुरुष के पास रखते हुए अपने आप को भी दीन दुखियों में ही शामिल करते हुए फरमाते हैं, कि हे आदपुरष! हमारे समान धरती पर कोई भी असहाय, बेसहारा, दीन दुखी नहीं है और तुम दुखियों पर दया करने वाले के समान धरती के ऊपर कोई दयालु भी नहीं है, इसलिए मेरी जांच पड़ताल करने अर्थात परख करने की क्या जरूरत है? हे परम पिता परमेश्वर! मेरे मन में आप के सिवाय कोई नहीं है और मैंने आप का ज्योतिर्ज्ञान स्वीकार कर लिया है। आप के अध्यात्मिक विचार मेरे मन को बहुत ही अच्छे लगते हैं, इसलिए मुझे ज्योतिर्ज्ञान से परिपूर्ण (पूरनु) कर दो।
हंऊँ बलि बलि जाऊं रमईआ कारने।।
कारन कवन अबोल।। १।। रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे परम पिता परमेश्वर अर्थात आदिपुरुष! मैं आप पर बलिहार जाता हूँ, मगर आप मुझ से बातें क्यों नहीं करते? आपकी कृपा से मुझे ज्योतिर्ज्ञान प्राप्त हो गया है, गुरु रविदास जी महाराज चाहते हैं कि आदपुरूप अपने प्राण प्रिय सच्चे सुच्चे सेवकों और भक्तों को दर्शन दे कर बातें करें।
बहुत जनम बिछड़े थे माधव
इहु जनमु तुमारे लेखे।।
कहि रविदास आस लगि जीवउ,
चिर भईउ दर्शनु देखे।।२।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि हे प्रिय माधव! हम इस जन्म में आ कर के काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार और मोहनी माया के जाल में उलझ कर आप से बिछुड़ गए हैं अर्थात आप को भूल चुके हैं। अब बाकी का जीवन आप के निमित्त अर्पण कर दिया है। आप की कृपा से मुझ में ज्ञान की ज्योति उत्पन्न हो चुकी है, भले ही बहुत देर हो चुकी है, जिस के कारण आप के दर्शन नहीं हुए हैं मगर अब केवल आपके दर्शन की आशा में ही आप की भक्ति में लीन हूँ।
शब्दार्थ:--- सरि-समान, आप जैसा, बराबर। दीनु-असहाय, असमर्थ। पतिआरू-समझाना परखना। बचनी-विचार। पूरनु-पूर्ण ज्योतिर्ज्ञान। बलि बलि-बलिहार, कुर्बान। कारने-कारन।  अबोल-ना बोलना, अपशब्द। बिछुरे-बिछुड़े, जुदा हुए। लेखे-निमित्त। आस-आशा, उमीद। चिर-बड़ी देर। भईउ- हो गई/गया है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।

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